वात्सल्य की इस तलाश में
एक उम्र के बाद
फिर इसे पाने में
एक उम्र गुज़र जाती है
कभी हम नहीं होते
तो कभी वह छाँव गुज़र जाती है
भाग्यशाली हूँ मैं कि
आज भी मेरे सर पर इनका साया है
प्रार्थना है बस यही
स्वस्थ एवं खुश रहे
वह सदा
जिन्होंने हम पर
वात्सल्य की इस तलाश में
एक उम्र के बाद
फिर इसे पाने में
एक उम्र गुज़र जाती है
कभी हम नहीं होते
तो कभी वह छाँव गुज़र जाती है
भाग्यशाली हूँ मैं कि
आज भी मेरे सर पर इनका साया है
प्रार्थना है बस यही
स्वस्थ एवं खुश रहे
वह सदा
जिन्होंने हम पर
यह प्रतियोगिता का मेला है
मंज़िले सामने है
हौंसले बुलंद है
पथ बड़ा कटीला है
पर जरा संभल के भईया
यह प्रतियोगिता का मेला है
किसी के पैर में है जूता
किसी के पैर में है चप्पल
तो कोई बिना ही इस सभी के
चल पड़ा अकेला है पर
जीतता वही है यहाँ
जिसकी जेब में धेला है
हुनर की नहीं है
यहाँ बिसात कोई
सब धन का ही झमेला है
पार कर जो यह कांटो का पथ
जो मंज़िल अपनी पा गए
जानते हैं वह सहज
कितनों को उन्होने
गर्त में ढकेला है
यह प्रतियोगिता का मेला है .....
पल्लवी
दो जोड़ी आँखों के बीच
नये प्रस्फुटन का आगमन
खुशियों के सपनों का
मीठा समंदर
परवरिश कि सख्त
किन्तु कोमल दीवारों
के बीच
नन्हे परिंदो की उड़ान
और फल पकने से पहले ही
अचानक
उस मीठे समंदर का,
खारा हो जाना
इससे बड़ी पीड़ा
कि पराकाष्ठा ओर
कोई हो सकती है क्या
यूँ तो दर्द
कि कोई परिभाषा
नहीं होती
मगर
एक फूल के
खिलने से पहले ही
उसका बिखर जाना,
सपनीली आँखों
में उन्ही सपनों कि किरचोँ
का शूल बन
उन्हीं आँखों में
चुभ जाना
एक असहनीय पीड़ा
को जन्म देता है
क्यूंकि दर्द, कैसा भी हो
दर्द ही रहता है.
है ना...!
पल्लवी
बिकुल खरपतवार की तरह होती हैं औरतें
जरा प्यार भर जल मिला नहीं,अकेला खड़ा
वो देखा करता है रहा
आँखों में लिए चंद प्रश्न
कोई आकर क्यों पूछता नहीं
उसका मर्म
उसने वहाँ खड़े होकर
जन्म से मृत्यु तक का सफर देखा
सोखा है अंश ईश्वर की शक्ति
तो वहीं देखा है उसने बल भक्ति का
वो कहता है
कहीं ना कहीं हूँ मील का पत्थर मैं भी
कि यह उपलब्धि है मेरे समय काल की
यूँ तो एक पत्थर ही हूँ मैं
हाँ उस जगह का पत्थर
जिससे होती है पहचान भगवान की.....
बेशक बदलते वक़्त के साथ खुद को बदलते हम
समय की कदम ताल से, ताल मिलाते हम
इस अनचाही सी कोशिश में, खुद को झोंकते हम
इस वक़्त की आपाधापी में, यह नहीं जानते हम
थोड़ी कुछ पाने कि चाह में कितनों को खोते हम....
बचपन छूटा आयी जवानी, कुछ दोस्त बने, कुछ दिलजानी
फिर आया मौसम कुछ बनने का, सपनों को पूरा करने का,
कुछ के हिस्से आयी नौकरी, कुछ के हिस्से आयी चाकरी
कुछ ने किए बस सपने पूरे, कुछ ने किया बस अपनों को पूरा
बस इस सब आपाधापी में, कुछ रिश्ते पीछे छूट गए
वो बाजू वाले काका से, वो छज्जे वाली मौसी से
नातों के पापड़ सब सूख गए
बरनी जो ना हिलायी रिश्तों की बरसों, कब संबंध सारे टूट गए
जीवन की इस आपाधापी में कुछ रिश्ते पुराने छूट गए, कुछ टूट गए
मर मर के जिये जिन रिश्तों को, वो वक़्त आने पर टूट गए
खून पसीना डाल डाल के जिन नन्हें पौधों को सींचा था
वही पौधे जब खुद झाड़ बने, पंथी को सहारा देना भूल गए
कुछ ऐसा नाता टूटा रुचियों से, जीवन का सुर ही टूट गया
के दिल से दिल के जो रिश्ते थे,चंद अल्फ़ाज़ों से टूट गए
जीवन की इस आपाधापी में कुछ रिश्ते पुराने छूट गए कुछ टूट गए .....
अटकन चटकन का ले काफ़िला, कब आगे हम चल निकले थे
कब भटकन की राह पर बढ़ गए
पता ही नहीं चला ...
कुछ साथ है, कुछ साथ थे, कुछ दोस्त पुराने कब पीछे छूटे
पता ही नहीं चला ...
नए जोश में हटकर चलने, आशाओं के दीप जालने
कब हम जा के हवा से भिड़ गए
पता ही नहीं चला...
इस चलने में, गिर गिर पड़ने और संभलने
युग कितने ही बीत गए कुछ
पता ही नहीं चला...
इसी उधेड़ बुन के चलने में, कुछ उलझने सुलझाने में
कब बच्चे से बड़े हो गए
पता ही नहीं चला...
कुछ दोस्त पुराने, नए जमाने संग ताल बैठाने
कभी ताल मिलाने कब अटके, कब निकल गए
पता ही नहीं चला...
आँख खुली जब हम ने जाना, हम भी चलना सीख गए
इस सपने से जगने में हाय, कितने सावन बीत गए
पता ही नहीं चला...
अब भी प्यार देर नहीं है, समझ सको तो समझो इशारे
हम में तुम में प्राण वही है
पता ही नहीं चला... पल्लवी

कभी- कभी कुछ तस्वीरें ले तो ली जाती हैं खेल-खेल में
लेकिन बाद में उन्हें देखने पर बहुत कुछ समझ में आता है
जैसे कि यह तस्वीर,
इस तस्वीर को देखकर मन में यह विचार आया
कि जैसे माँ प्रकृति ने आशाओं और उम्मीदों से भरा यह सिक्का
मेरे हाथ पर रखते हुए धीरे से मुझसे कहा था उस रोज़
कि लो बेटा मेरी ओर से तुमको यह एक छोटी सी भेंट
इसे सदा अपने पास संभाल कर, संजो कर रखना
और
जब भी किसी और को इसकी जरूरत हो
तब उसे यह देने में क्षण भर की भी देरी ना करना
आज कल बहुत जरूरत है ना इसकी सभी को,
हर किसी के मन में एक उदासियों और अंधकार से भरा एक कोना है
जो घर कर गया है सभी के मन में
जिसके कारण जीना तो चाहते हैं लोग,
किन्तु सहज रूप से जी नहीं पा रहे हैं
जीवन एक दिखावा बनकर रह गया
हर कोई उस पार जाना चाहता तो है
पर किसी के पास मांझी नहीं है,
तो किसी के पास पतवार नहीं है,
यूं भी बेटा इस भवसागर से पार जाना आसान नहीं है
लेकिन शायद यह सिक्का उस अंधेरे कोने में हल्की सी ही सही
पर आशा की एक छोटी सी रोशनी भर दे
जिसकी जगमगाहट स्वयं की नाव और स्वयं की पतवार
बनाकर उस भवसागर में बढ़ने का हौंसला दे दे
इसलिए रखो इससे अपने पास और बाँटते चलो हर बार
यह कभी न खत्म होने वाली दौलत है
जो सिर्फ अमीरों को जागीर नहीं, बल्कि गरीबों का सहारा है
एक ऐसा सहारा जिसकी जरूरत आज के समय में सभी को है
इसलिए तुम जरा भी फिक्र मत करो
बस खुले और साफ मन से बांटो
फिर देखना, एक दिन यह दुनिया वापस उतनी ही खूबसूरत होगी
जितनी कि हम आज केवल किताबों में पढ़ा और
चित्रों में देखा करते हैं।