Friday, 21 June 2013

क्या यही प्यार है ?


तुम, तुम प्यार की बात कर रहे हो 
सुनो तुम्हारे मुंह से यह प्यार व्यार की बातें अच्छी नहीं लगती (जानेमन)  
तुम जानते भी हो प्यार होता क्या है ? 
प्यार ज़िंदगी में केवल एक बार होता है दोस्त 
बारबार नहीं,   
तो भला फिर तुम्हें 
प्यार करने का हक़ ही कहाँ रह जाता है
प्यार करने वाले कभी दो नावों में सवार नहीं होते 
प्यार तो वो करते हैं जो अपनी जुबान के पक्के होते है 
तुम्हारी तरह फरेबी और मतलबी नहीं 
एक बे पेंदी के लोटे की तरह 
कि जब मन किया प्यार का दामन थम लिया 
और जब जी चाह ऐसे भुला दिया जैसे जानते ही नहीं ...
मगर प्यार, प्यार तो कोई मजबूरी नहीं है, 
प्यार तो ईश्वर की पूजा है, खुदा की इबादत है, 
ज़िंदगी का मक़सद है, आत्मा की शांति है 
पर फिर भी कभी तुमने अपनी ज़िंदगी और प्यार में से कभी  
अपने प्यार को नहीं चुना, एक पल के लिए भी नहीं,
जैसे वो प्यार नहीं पाप हो तुम्हारा  
जबकि, मैंने तो तुम्हें सदा अपने दिल की गहराइयों से चाहा, 
तुमसे प्यार किया, यहाँ तक के सब कुछ 
अपना मैंने तुम पर वार दिया न सिर्फ अपना तन,मन,धन 
अपितु अपने लिए अपने परिवार का प्यार, उनका विश्वास
सब कुछ, सिर्फ तुम्हारा साथ पाने के लिए 
मैंने उन सबको भूला दिया जिनकी वजह से आज मैं हूँ
मेरा वजूद है,      
पर बदले में तुमने मुझे क्या दिया 
विश्वास घात, दर्द, दूरियाँ, तन्हाइयाँ, 
पराया होने का एहसास 
माना कि प्यार में कोई शर्त नहीं होती (जाने तमन्ना) 
यह भी माना कि प्यार में, प्यार के बदले प्यार ही मिले 
यह भी ज़रूरी नहीं
मगर यह सब तभी तक ठीक और सही लगता है ना 
जब प्यार एक तरफा हो मगर हमारे बीच तो ऐसा नहीं था 
फिर तुम्ही कहो क्या यही प्यार है...    

Wednesday, 19 June 2013

गंगा की व्यथा ....


मेरा नाम है गंगा
हाँ हूँ, मैं ही हूँ गंगा
वो गंगा
जिसे तुम ने
अपने सर माथे लगाया
बच्चों को मेरा नाम
लेले कर नहलाया,
जो कुछ भी मिला सकते थे
तुम, तुम ने मेरे आँचल
में वो सब कुछ मिलाया

न सोचा एक बार भी
मेरे लिए कि गंदगी
से मुझे भी हो सकती है
तकलीफ़, असहनिए पीड़ा
यह कहाँ का इंसाफ है
पाप तुम करो
और सज़ा मैं भुगतूँ ?
लेकिन फिर भी
मैं चुप रही...

मैंने आज तक कभी
कुछ न कहा
तुमने पूजा पाठ
और भक्ति के आडंबर
के नाम पर मुझे पल-पल छला
मैं चुप रही....
तुमने बीमारी से भरे शवों को
मुझ में घोला
मैं तब भी चुप रही...

यहाँ तक के तुम ने
मेरे जीवन, मेरे प्रवाह तक को
मुझ पर बांध बना-बना कर रोका
मैं तब भी चुप रही
कई बार मैंने तुम्हें
अपने संकेत दिये
कई बार चाह कि
तुम मेरी चुप्पी को समझो

मेरी पीड़ा को
स्वयं महसूस करो
चंद लोगों ने
शायद समझा भी मुझे
इसलिए गंगा सफाई अभियान भी चलाया
मगर हाये रह मंहगाई
उन चंद लोगों को भी
अमानुषता रही है खाई

मैं शिव के सर चढ़ कर बैठी
लेकिन एक दिन
उनके गले लग कर क्या रोली
तुम से सहा नहीं गया

अब जब फूटा है
मेरा कहर तो सहो,
सहना ही होगा तुमको
आज भुगतनी ही होगी
तुम्हें भी वही पीड़ा
जो आज तक तुम
मुझे देते आए हो

माना कि मैं माँ हूँ
मगर इसका अर्थ, यह तो नहीं
कि तुम अपने कुकर्मों से
मेरा अस्तित्व ,
मेरा वजूद ही मिटा डालो
मत भूलो अगर मैं एक माँ होने के नाते
तुम्हें जन्म दे सकती हूँ
तुम्हारे पापो को
अपने आँचल से धो सकती हूँ

तो मैं ही तुम्हें
पल भर में
घर से बेघर भी कर सकती हूँ
हाँ हूँ मैं गंगा,
जो गर चाहूँ तो
भगवान को भी
अपने जल से पवित्र कर दूँ
और जो ना चाहूँ
तो हज़ारो ज़िंदगियों को

पल भर में यूं ही मसल के खाक कर दूँ
अब भी कह रही हूँ मैं
चेंत सको तो चेंत जाओ
माँ के अंचाल में यूं जहर ना मिलाओ....           

Tuesday, 11 June 2013

फूल गुलाब का ....


"फूल गुलाब का लाखों में हजारों में 
चेहरा जनाब का" 

कितना आसान होता है ना, किसी को गुलाब कह देना
निर्मल, कोमल, खुशबू से लबरेज़ महकता हुआ गुलाब
किसी के होंटों गुलाब, तो किसी के गालों पर गुलाब
और हो भी क्यूँ ना
आखिर यूं हीं थोड़ी न फूलों का राजा कहलाता है गुलाब
मगर किसी को गुलाब की उपमा से नवाज़्ते वक्त
हम कभी क्यूँ नहीं सोच पाते
उसकी सुंदरता और उसकी कोमलता के पीछे छिपे
उसके दर्द को, उन काँटों की चुभन को
जिसके बीच दिन रात रहकर भी
तिल तिल कर बढ़ती है एक कोमल कली
और बनती है एक खूबसूरत गुलाब
जिसे देखने के बाद हर मन मचल ही जाता है उसे पाने के लिए
इन दिनों मेरे घर में भी खिल रहे हैं, अनगिनत गुलाब
मगर कल उन्हें पाने की चाह में
मैंने महसूस की उसके काँटों की चुभन
तब यह ख्याल आया कि
हर मुस्कुराहट के पीछे एक दर्द छिपा होता है
चहरे और स्वभाव से जो इंसान खुश मिजाज दिखाई दे
अक्सर वही इंसान अंतस से बेहद दुखी होता है
अर्थात जो आँखें देखती है वो हमेशा सच नहीं होता
यूं तो समंदर किनारे भी बहुत शोर होता है
लेकिन समंदर की ख़ामोशी भी अक्सर हमें सुनाई नहीं देती...
जैसे यह है तो एक कविता मगर कविता सी सुनाई नहीं देती :-)

खैर छोड़िए जनाब जो मन में आया और जो महसूस किया वो लिख दिया अब कविता बनी या नहीं इस से क्या फर्क पड़ता है आप सब मज़ा लीजिये इस गीत का.... :))
  

    

Sunday, 9 June 2013

इसी का नाम है ज़िंदगी ...


पल पल बदलते रहने का नाम है ज़िंदगी
आज सुबह तो कल शाम है ज़िंदगी

अपने ग़म में तो सभी जीते है
दूसरों के ग़म को जीने का नाम है ज़िंदगी

खूद अपनी खुशी में हंस लिए तो क्या बड़ा किया
रोते हुए बच्चे को हँसाने का नाम है ज़िंदगी

चढ़ते सूरज के साथ आगाज़ का नाम है ज़िंदगी
नित नए पल मिलने वाले तोहफ़े का नाम है ज़िंदगी

सांस तो सभी ले रहे हैं जीने के लिए,
फकत सांस लेते रहने का नाम ना है ज़िंदगी

यूं तो गुजरते कारवां सी भी है यह ज़िंदगी
मगर तेरे नाम के बिना जो गुज़र जाये वो बियाबाँ है ज़िंदगी

भले ही तेरी मूहोब्बत के फूल न सही इसमें
मगर तेरी यादों का दरख़्त है यह ज़िंदगी

गुज़र जाने का नाम ही है ज़िंदगी
गुज़र ही जाये एक दिन,

मगर बिन प्यार किए जो गुज़र जाये तो वो हराम है ज़िंदगी
क्यूंकि केवल प्यार का ही तो दूसरा नाम है ज़िंदगी

पल्लवी सक्सेना    

Wednesday, 5 June 2013

रेत का दर्द...


 समंदर का दर्द तो सभी महसूस करते है
लेकिन क्या कभी किसी ने
उसके किनारे पड़ी रेत के दर्द को भी महसूस किया है
शायद नहीं,
क्यूंकि लोगों को तो अक्सर
सिर्फ आँसू बहाने वालों का ही दर्द दिखाई देता है
मौन रहकर जो दर्द सहे
वह भला कब किसको दिखाई दिया है
कुछ वैसा ही हाल है उस रेत का 
जो समंदर के किनारे पड़ी रहकर
उसके सारे आँसुओं को दिन रात पीकर भी मौन रहा करती है
मगर फिर भी उसके बारे में कभी कोई कुछ नहीं सोचता
लोगों को अगर कुछ दिखाई देता है
तो केवल उस समंदर की खामोशी
रेत का मौन तो किसी को कभी ना दिखाई देता है
और ना ही कभी किसी ने उसकी खामोशी को सुनने की कोशिश ही की होगी कभी
 अरे ज़रा तो सोचो ओ मुसाफिरों
जो खुद किसी के आँसुओं को अपने अंदर जज़्ब करते-करते
खुद खोखली हो चुकी है
वो भला किसी के सपनों के महलो को कैसे एक मजबूती दे सकती है
मगर फिर भी लोग उसके अंचल में गढ़ते हैं अपने सपनों के महल
और जब तक साथ देता है उसका सबल वो बनाने देती है अपने ऊपर वो महल
मगर संमदर की एक लेहर आकर जैसे उसके दर्द को जागा जाती है
और उस पर बना वो सपनों का महल टूट कर बिखर जाता है  
आदत से मजबूर इंसान बड़ी बेरहमी से
उसके बचे हुए अंशों पर अपने पैरों की ठोकर से वार करता हुआ निकल जाता है
बिना एक बार भी यह सोचे
कि कुछ देर पहले यही वो रेत थी
जिसने उसे अपने सपनों को कुछ पल के लिए ही सही
गढ़ने का ,उसे साकार रूप में देखने का एक मौका दिया था...    

Saturday, 25 May 2013

ज़िंदगी की सारी खुशियाँ जैसे मौन हो कर रह गयी...

ज़िंदगी की सारी खुशियाँ जैसे मौन हो कर रह गयी
वो छोटे-छोटे खुशनुमा पल
वो गरमियों की छुट्टियों में चंगे अष्टे खेलना
वो रातों को सितारों की चादर तले देखना
वो करना बात कुछ आज की, कुछ कल के सपनों को देखना

वो लगाना आँगन में झाड़ू और पानी का फिर फेंकना
प्यासे पेड़ों को पानी दे, वो पत्थरों पर खींच के खांचा
फिर लंगड़ी-लंगड़ी खेलना
वो कैरी का पना
वो पुदीने की चटनी
वो भर भर उंगली से चाटना

वो नानी के घर आँगन तले नीबू का रस निकालना
वो बना के शिकंजी झट शक्कर उसमें फिर घोलना
वो गन्ने का रस
वो जलजीरे के मटके
वो छागल का पानी
वो ठेले पे बिकते थे खीरे के टुकड़े
यूं लगते थे जैसे हो हीरे के टुकड़े
वो माँ का, आँचल से पसीना पोंछना

ज़िद कर-कर के खाना, वो मटके की कुल्फी
वो घड़ी-घड़ी शरबत बना के पीना
वो रसना
वो रूहफ़्ज़ा
वो शर्बत-ए-आजम
वो ठंडी बर्फ से फिर कॉफी बनाना

मगर अब ना नानी का घर है
क्यूंकि कुछ न कुछ सीखने की फिकर है
न रहा शर्बत तो क्या,? कोल्ड ड्रिंक्स क्या भला शर्बत से कम है!!!
चटनी का क्या है, सॉस जो यहाँ है।

माँ के आँचल से चेहरा छिला है।
वेट टिशू भला किस मर्ज की दवा है।
आइसक्रीम भला किसे कब बुरा लगा है।
पर मटके न जाने कब से बेधुला है।

गर्मी बहुत है कि खेलना मना है
इसलिए शायद
यह वीडियो गेम और अब आई पेड चला है।
लगता है अब तो ऐसे, जैसे घर में हिन्दी बोलना भी गुनाह है :-)
सच इस सब में जैसे ज़िंदगी ही गुम हो के रह गयी
के यूं लगता है अब तो जैसे
ज़िंदगी की सारी खुशियाँ मौन हो कर रह गयी ... 

Tuesday, 12 March 2013

बारिश और मैं ....

आज क्या लिखूँ कि मन उलझा-उलझा सा है रास्ते पर चलते हुए जब छतरी के ऊपर गिरती पानी की बूँदें शोर मचाती है तो कभी उस शोर को सुन मन मयूर मचल उठता है और तब मेरे दिल से निकलता है बस एक यही गीत....
"रिमझिम गिरे सावन, मचल-मचल जाये मन,
 भीगे आज इस मौसम,लागि कैसी यह अगन" 


यूं तो यह बारिश का मौसम मेरा सबसे ज्यादा पसंदीदा मौसम है,
क्यूंकि मुझे बारिश में भीगना बहुत पसंद है
वह घर की बालकनी में हाथ बढ़ाकर गिरती हुई बूंदों को महसूस करना 
मुझे तो यूं लगता है 
जैसे बारिश भी अपना हाथ बढ़ा रही है मेरी ओर
कि आओ मुझे छू लो,
मेरे साथ झूम लो गा लो 
ठीक किसी हिन्दी फिल्म की नायिका की तरह 
घर के आँगन में जाकर गोल-गोल घूमना 
गड्ढों में भरे पानी में "छई छपा छई, छपाके छाई" 
की तर्ज़ पर छपाक छपाक खेलना 
कितना बचकाना सा लगता है न, अब यह सब, 
लेकिन यही तो वो यादें हैं जिनमें सभी का बचपन ज़िंदा है 
हर वो बच्चा ज़िंदा है जो हर इंसान के बूढ़ा हो जाने पर भी 
कहीं न कहीं उसके दिल के किसी कोने में छुप कर बैठा होता है 
जिसे हर कोई ज़िंदा रखना तो चाहता है 
मगर कुछ सामाजिक बंधनों के कारण उसे सामने नहीं ला पाता 
और देखते ही देखते कितना कुछ बदल जाता है 
यूं तो ज़िंदगी के हर पल में एक ध्वनि है, एक सुर है, एक संगीत है 
मगर यह ज़रूरी नहीं कि हमें हर बार वो संगीत अच्छा ही लगे 
कई बार यूं भी होता है 
जब मन उस संगीत से परेशान हो कानों पर हाथ रखकर  
उसे अनसुना कर देना चाहता है 
मगर प्रकृति ने कब किसकी सुनी है 
वो तो उस साथी की तरह है जो हमें कभी अकेला नहीं छोड़ती 
चाहे ग़म हो या खुशी, हम चाहें या ना चाहे, 
एक वही तो है जो पल-पल साथ निभाती चलती है ज़िंदगी का,
कभी महसूस किया है क्या 
अकेली सड़क पर साथ चलने वाले पेड़ों, रास्तों, पगडंडियों 
और आकाश के साथ-साथ आते जाते वाहनों की आवाजाही
 फिर भी दूर तलक फैली खामोशी 
जिसमें सिर्फ सुनाई देती है गिरती हुई बारिश की पदचाप
जैसे कोई साथ साथ चल रहा हो हमारे 
मगर जब मुड़कर देखो तो दूर तक कोई नज़र नहीं आता  
लेकिन फिर भी मुझे वो यह एहसास दिलाती है।
ज़िंदगी एक ख़मोश सफर नहीं 
क्यूंकि मैं हूँ तुम्हारे साथ अब भी और तुम्हारे बाद भी 
तुम्हारे अपनों का ख़्याल रखने के लिए.... 

Saturday, 9 March 2013

नारी मन....


यूं तो कहने को महिला दिवस है
लेकिन क्या फायदा ऐसे दिवस का जो महज़ कहने को आता है
और आकर यूं ही चला जाता है
ना नारी ही नारी का सम्मान करती है यहाँ
और न ही पुरुष ही करता है
सब भक्षण ही करना चाहते है
कोई संरक्षण करना नहीं चाहता कभी
वैसे तो मैं, अर्थात मैं नारी अपने आप में ही सम्पूर्ण हूँ
इतनी सम्पूर्ण कि मैं अगर चाहूँ तो एक ही झटके में बदल सकती हूँ
इस संसार का भूत, भविष्य और वर्तमान
मगर करती नहीं हूँ मैं ऐसा
क्या करूँ आदत से मजबूर हूँ ना,
इसलिए सदा खुद से पहले तुम्हारे बारे में सोचती हूँ
तुम खुश रहो और सफलता के साथ-साथ एक स्वस्थ एवं दीर्घ आयु जियो
बस यही एक कामना तो किया करती हूँ मैं दिन रात
मगर यह क्या
तुम ने तो मेरे इस रूप को, मेरी कमजोरी समझ लिया
हे नादान पुरुष तुम क्यूँ भूल गए जिस से तुम जन्में हो
वो अगर तुम्हें जन्म देकर तुम्हारा भरण, पोषण और रक्षण कर सकती है
तो वक्त आने पर वही तुम्हारा भक्षण भी कर सकती है
मत भूलो जो मौन है वो कमजोर नहीं
इसलिए किसी को इतना भी मत सताओ और न झुकाओ
कि विपरीत वार में वो तुम्हें कहीं का ना छोड़े
और तुम आसमान से गिरे खजूर में अटके की भांति
धरती पर पड़े क्षत विक्षत नज़र आओ
शुक्र करो कि मैंने छोड़ी नहीं है, अब तक अपनी कुछ आदतें
कि अब भी एक उम्मीद बाकी है मेरे मन में तुम्हारे प्रति
क्यूंकि जन्म से तो कोई बुरा नहीं होता 
न स्त्री, न पुरुष
यह तो वक्त और हालात हैं, जो इंसान को नासमझ बना दिया करते है
इसलिए शायद नारी भी स्वयं नारी की दुश्मन हो जाती है कभी-कभी  
लेकिन नादानी तो सभी से हो सकती है 
क्यूंकि हम इंसान तो है ही
गलतियों का पुतला
मगर वो कहते हैं न गलतियाँ माफ की जा सकती है
मगर गुनाह नहीं,
इसलिए मेरे चेहरे की सोम्यता और शांति की परीक्षा न लो  
क्यूंकि शांति हमेशा संतोष नहीं देती
कई बार वही शांति तूफान से पहले की शांति का रूप भी हो सकती है...

Tuesday, 29 January 2013

न जाने माँ इतनी हिम्मत हर रोज़ कहाँ से लाती है....

न जाने माँ इतनी हिम्मत रोज़ कहाँ से लाती है
के हों कितने ही गम पर वो सदा मुसकुराती है
हर रोज़ कड़ी धूप के बाद चूल्हे की आग में तपती  है
मगर सुबह खिले गुलाब सी नज़र आती है
न जाने माँ इतनी हिम्मत हर रोज़ कहाँ से लाती है

खुद पानी पीकर गुज़र करती है, मगर हमें खिला के सुलाती है
अगर न हो घर में कुछ तो रुई के फ़ाहे को घी का नाम दे बच्चों को बहलाती है
खुद भूखे पेट सोकर भी वो हमे खिलाती है
न जाने माँ इतनी हिम्मत हर रोज़ कहाँ से लाती है

अंदर ही अंदर कोयले सी सुलगती-जलती है
मगर हर बार ठंडी फुहार सी नज़र आती है
जो हमेशा केवल प्यार बरसाती है
जो गम और खुशी में सदा ही मुसकाती है
न जाने माँ इतनी हिम्मत हर रोज़ कहाँ से लाती है

यूं  तो रोज़ देती है हौंसला मगर खुद अंदर ही अंदर घुली जाती है
मगर पिता और परिवार के समीप एक सशक्त ढाल सी नज़र आती है
आज भी थामकर उंगली वो सही राह दिखा जाती है
इसलिए शायद जीवन की पाठशाला का पहला सबक केवल माँ ही पढ़ती है
न जाने माँ इतनी हिम्मत हर रोज़ कहाँ से लाती है....      

Sunday, 20 January 2013

लो बीत गया फिर, एक और साल ....

लो हर बार की तरह बीत गया एक और साल,
फिर एक बार आया है नया साल 
मगर 
कुछ भी तो नहीं बदला मेरी ज़िंदगी में, नया जैसा तो कुछ हुआ ही नहीं कभी,
यूं लगता है जैसे 
बस एक वही साल आकर ठहर सा गया है, मेरी ज़िंदगी में कहीं
कि जिसमें हम मिले थे कभी
तब से अटकी हूँ मैं बस उसी एक साल में, पता है क्यूँ ?
क्यूंकि उस एक साल में ही कुदरत ने जैसे मुझे
ज़िंदगी के सारे मौसम एक साथ ही दे दिये थे, ताउम्र गुज़ारने के लिए,
लेकिन देखो न, केवल पतझड़ को छोड़कर
मेरा साथ किसी मौसम ने दिया ही नहीं कि आज भी
हम राही बन साथ है वो मेरे,
साथी मेरे 
प्यार का भी क्या कमाल मौसम होता है न,
कि गुलाब ही नहीं, बल्कि जंगली फूल तक खूबसूरत नज़र आने लगते है
अधरों पर नित नये गीत स्वतः ही सजने लगते है
ज़िंदगी इतनी खूबसूरत सी नज़र आती है कि जैसे 'जन्नत' अगर कहीं है
तो बस वह यहीं है 
मगर किसे पता होता है कि ज़िंदगी के यह चार पल 
किसी जादुई फरेब से कम नहीं होते 
जैसे किसी जादूगर ने अपने जादू से एक खूबसूरत दुनिया का निर्माण किया  
और हकीकत से सामना होते ही जैसे प्यार का सारा जादू छू सा हो जाता है
और हम अचानक ही आ गिरते हैं हकीकत के धरातल पर
जैसे मुझ संग तुम्हारा प्यार
और बस गुनगुनाते रह जाते यह गीत के
प्यार के लिए, चार पल कम नहीं थे, कभी तुम नहीं थे कभी हम नहीं थे .....:)
     

Saturday, 5 January 2013

रेत सा रिश्ता ...


क्यूँ रिश्ता मुझसे अपना तुमने रेत सा बनाया 
क्यूँ आते हो तुम लौट-लौटकर मेरी ज़िंदगी में गये मौसम की तरह 
जानते हो ना, कभी-कभी खुश गवार मौसम भी जब लौटकर आता है 
तो कुछ शुष्क हवायें भी अपने साथ लाता है 
जो लहू लुहान कर दिया करती है न सिर्फ तन बल्कि मन भी  
और तब तो तुम्हारे प्यार की यादों का 
कोमल एहसास भी भर नहीं पाता उन ज़ख़्मों को 
 तब ऐसा महसूस होता है मुझे, जैसे तुमने ही ठग लिया है मुझे
मानो  
 मैं स्तब्ध सी खड़ी हूँ और कोई आकर मेरा सब कुछ लिये जा रहा है मेरे हाथों से 
खुदको इतना जड़ हताश और निराश आज से पहले कभी नहीं पाया मैंने
शायद इसलिए तुमसे बिछड्ने के ग़म ने ही मुझे बेजान सा कर दिया है
की एक खामोशी सी पसरा गयी है मेरे अंतस में
मगर यह कैसी विडम्बना है हमारे प्यार की
कि मुझे इतना भी अधिकार नहीं  
 कि मैं रोक सकूँ उसे   
यह कहकर कि रुको यह तुम्हारा नहीं, जिसे तुम लिये जा रहे हो अपने साथ  
क्यूंकि सच तो यह है कि अब तो मुझसे पहले उसका अधिकार है तुम पर
तुम तो अब मेरी यादों में भी उसकी अमानत बनकर आते हो 
तो किस हक से कुछ भी कहूँ उससे    
इसलिए खड़ी हूँ पत्थर की मूरत बन यूँ ही, अपने हाथों की हथेलियों को खोले 
और वो लिये जा रहा है मेरा सर्वस्व,
यूँ लग रहा है मुझे, जैसे तुम रेत बनकर फिसल रहे हो मेरे हाथों से 
और वो मुझे चिढ़ाता हुआ सा लिए जा रहा है तुमको अपने साथ  
मुझ से दूर बहुत दूर....
फिर कभी न मिलने के लिये   
यह कहते हुए कि मेरे रहते भला तुमने ऐसा सोच भी कैसे
 कि यह तुम्हारा हो सकता है  
तुम से पहले अब  
यह तो मेरा है, मेरा था, और मेरा ही रहेगा हमेशा.... 

Friday, 14 December 2012

एहसास


कभी कभी यह ज़िंदगी इतनी तन्हा लगती है की जैसे इसे किसी की आरज़ू ही नहीं
यूं लगता है कि जैसे किसी को मेरी जरूरत ही नहीं
न दोस्तों के पास समय है ना अपनों के पास कोई विषय, बात करने के लिए
सब अपनी ही दुनिया में मस्त है किसी को किसी की जरूरत ही नहीं
ढलते हुए सूरज की लालिमा के साथ तन्हा होने का एक अंधकार सा पसर जाता है
मन के किसी कोने में कहीं, और यकायक यह एहसास होने लगता है
जैसे समय का चक्र पल-पल कोई न कोई परीक्षा ले रहा हो मेरी
जिसमें न कोई आस है, ना प्यास है,गर कुछ है तो वो है मैं और मेरी तनहाई
यूं तो इस भागती दौड़ती ज़िंदगी में कभी-कभी तनहाई भी अपनी सी लगती है
मगर कभी-कभी खुद को इस कदर तन्हा पाती हूँ मैं 
कि यूं लगता है कि किसी को मेरी जरूरत ही नहीं,
यूं तो तुम्हारे साथ होते हुए भी कई बार खुद को तन्हा महसूस किया है मैंने
क्यूंकि न जाने क्यूँ एक औपचारिक सा भाव है या स्वभाव है तुम्हारी बातों में 
मगर अपने पन का वो खिचाव नहीं,
जिसकी तलाश में शायद ना जाने कितने ही घुमावदार रस्तों पर भटकता है मन
आतित की परछाइयों का पीछा करते हुए वापस 
उस दौर में लौट जाने को व्याकुल हो उठता है मन 
जहां तनहाई के लिए वक्त ही नहीं था मेरे पास, कि यह सोच भी सकूँ मैं, 
कि क्या होता है तन्हा होना लेकिन फिर तालश वही आकर ख़त्म होती है मेरी, 
जहां से चले थे हम कदम दर कदम एक-एक करके सात वादों के साथ
शायद इसलिए तुम्हारे आने का इंतज़ार रहा करता है मेरी रूह में कहीं,
क्यूंकि जब साथ होते हो तुम तो गुज़र ही जाती है इस ज़िंदगी की हर एक श्याम
लेकिन जब साथ नहीं होते तुम तो खुद को और भी तन्हा पाती हूँ मैं,
और धीमे-धीमें सुलगा करता है मेरा मन, एक जलती हुई अगरबत्ती की तरह
क्यूंकि यूं तो साथ होते हुए भी तन्हा हुआ जा सकता है मेरे हमदम, मगर  
बशर्ते कि जिसके साथ आप हैं उसे तनहाई की हिफाजत करने का हुनर आता हो
तो क्या हुआ अगर तुम्हें अपनेपन का एहसास दिलाना 
या मेरे प्रति अपना प्यार जताना नहीं आता
बहुत से ऐसे लोग हैं इस दुनिया में जिन्हें प्यार तो है मगर प्यार जताना नहीं आता   
बावजूद इसके, बहुत अच्छे से जानती हूँ मैं,कि प्यार तुमको भी है, प्यार हमको भी है,
और सोचो तो ज़रा वो प्यार ही क्या जिसे महसूस करवाना पड़े,या जताना पड़े
वो भला प्यार कहाँ रहा, वो तो दिखावा हुआ प्यार नहीं,
प्यार तो बिन कहे, बिन बोले ही समझने वाला और रूह से महसूस करने वाला एहसास है ना
इसलिए शायद अब भी, नदी के दो किनारे से स्वभाव के बावजूद भी,
एक ही छत के नीचे जी पा रहे हैं हम क्यूंकि स्वभाव भले ही न मिले हों कभी हमारे एक दूजे से
मगर प्यार होने का एक एहसास ही काफी है, ज़िंदगी गुज़ार देने के लिए ....  

Friday, 16 November 2012

कसक ....

यूं तो हूँ मैं तुमसे जन्मी हूँ माँ 
मगर तुमने मुझे कभी अपना समझा ही नहीं माँ 
क्या सिर्फ इसलिए कि मैं एक लड़की थी 
या मेरा रंग ज़रा काला था
या फिर  
मेरी त्वचा ज़रा जरूरत से ज्यादा ही रूखी सुखी सी थी 
दिखने में शायद बहुत कुरूप थी मैं उस वक्त 
लेकिन क्या यह सब कारण एक माँ की ममता को 
अपने ही बच्चे के प्रति जो लगाव रहा करता है 
उसे कम करने में सक्षम है?
जो तुमने मेरा पल पल तिरस्कार किया 
मुझे अपनी बेटी कहने से इंकार किया 
यहाँ तक कि तुमने तो अपने पति, यानि मेरे पिता तक को 
जाने अंजाने अपमानित किया 
यह कह -कहकर कि यह मेरी बेटी नहीं 
यह तो अपने पिता की संतान है
इसलिए उन्हीं पर गया है, इसका रंग रूप

मेरा तो सिर्फ बेटा है 
जो मेरे जैसा दिखता है गोरा चिट्टा  
बल्कि मुझे जैसा ही सोचता भी है
लेकिन इस सब के बावजूद भी मुझे गर्व है माँ 
इस बात पर कि मैं अपने पिता की बेटी हूँ
 जो देखने में भले ही एक साधारण से आम इंसान है  
मगर वासत्व में एक बेहद नेक दिल इंसान भी हैं
जो इस दुनिया में बहुत कम पाये जाते हैं  
तो क्या हुआ जो उनका रंग काला है और मेरा भी 
तो क्या हुआ अगर उनकी त्वचा भी 
मेरी त्वचा कि तरह खराब है 
तो क्या हुआ जो वह एक फिल्मी हीरो कि तरह 
 अपने मन की बातें आपसे कभी जाहिर नहीं कर पाते
मगर इतने सालों में साथ रहते 
एहसास तो हुआ होगा आपको भी, कि वो कहें भले ही नहीं 

लेकिन कदर ही नहीं बल्कि प्यार भी करते हैं वो आपको 
मगर आपने मेरी तरह शायद उन्हें भी कभी अपना समझा ही नहीं 
इसलिए शायद आपने दुनिया की रीत के आगे 
 सिर्फ अपना फर्ज़ निभाय हैं 
प्यार नहीं किया कभी उनसे 
और न ही मुझसे 
क्यूँ माँ क्यूँ 
क्या दिखावा ही ज़िंदगी में सब कुछ है 
क्या वास्तविकता के कोई मायने नहीं ?
नहीं!!! कम से कम मेरी ज़िंदगी में तो यह बात सच नहीं 
क्यूंकि मेरे जीवन की वास्तविकता तो यह है कि  
इतना कुछ होने के बावजूद भी मुझे आज भी बहुत बुरा लगता है 
जब तुम किसी भी बात पर मुझे खुद से अलग करते हुए भईया का पक्ष लेती हो 
और यह कहती हो कि वो मेरे जैसा है 
और मैं अपने पिता जैसी हूँ 
फिर भले ही वो कोई हंसी मज़ाक कि ही बात क्यूँ न हो 
सच तो यह है माँ कि मैं और पापा आज भी आप से बहुत प्यार करते है 
और आपसे जुड़े रहना चाहते हैं 
बातों में भी और वास्तव में भी 
इसलिए कम से कम अब तो इस रंग भेद और बेटे बेटी के भेद को छोड़ो माँ 
और एक बार कह दो कि हाँ हमारी बेटी भी मेरे जैसी ही है। 
तो मेरे दिल को भी एक बार सूकून आजाये .....          

Monday, 5 November 2012

सफर ज़िंदगी का ....


एक लंबी सड़क सी ज़िंदगी 
एक ऐसी सड़क 
जिसे तलाश है अपनी मंज़िल की 
वो सड़क जिसे अपने आप में ऐसा लगता है कि 
कभी तो खत्म होगा यह सफर ज़िंदगी का 
कभी तो मिलेगी मंज़िल 
मगर वक्त का पहिया हरपल यह एहसास दिलाया करता है कि 
एक बार जो चला जाऊन मैं  
तो लौटकर फिर कभी वापस नहीं आता 
पर क्या यही सच्चाई है ? 
नहीं मुझे तो ऐसा नहीं लगता 
ज़िंदगी की सड़कें भले ही कितनी भी लम्बी क्यूँ न हो 
मगर उस सफर के रास्ते में 
उस एक ज़िंदगी के न जाने कितने चक्र 
वक्त के साथ गतिमान रहते हुए घूमते रहते है 
और 
उन चक्रों में गया वक्त भी लौट-लौटकर आता रहता है 
क्यूंकि शायद ज़िंदगी कुछ भी अधूरा नहीं छोड़ती  
उस अंतिम वक्त में भी नहीं  
भले ही यह एहसास क्यूँ न हो सभी के मन के अंदर 
कि अभी तो बहुत से काम बाकी है 
बहुत सी जिम्मेदारियाँ निभाना बाकी है 
अभी अपने लिए तो जिया ही नहीं हमने 
अभी तो उस विषय में सोचना तक बाकी है  
मगर वास्तविकता तो कुछ और ही होती है 
जीवन का लालची इंसान 
जीवन पाने के चाह में ही पूरी ज़िंदगी बिता दिया करता है 
मगर यह नहीं सोच पाता कभी 
की ज़िंदगी अपना चक्र किसी न किसी रूप में पूरा कर ही लेती है 
कुछ अधूरा नहीं छूटता कभी, 
शायद इसी के आधार पर 
ऊपर वाला तय करता है सभी की मृत्यु 
क्यूंकि उसने तो पहले से ही सब तय कर रखा है 
कब, कहाँ, कैसे क्यूँ और किसका इस रंगमंच रूपी संसार से पर्दा उठेगा
और  
एक बार फिर पूरा होगा सफर ज़िंदगी का ......

Friday, 5 October 2012

बदलाव


कभी कहीं पढ़ा था कि बारिश में इन्द्र धनुष के रंग ही तो बरसते है
वरना यूं तो सारी धरती रंग हीन ही नज़र आती है
सच ही तो है,
ज़िंदगी का भी तो कुछ ऐसा ही फलसफ़ा है
आखिर बदलाव ही तो दूसरा नाम है ज़िंदगी का
जो कभी एक सी ना रहकर, हर पल बदलती रहती है
कभी बहा करती है किसी नदी की तरह
तो कभी बहती हवा सी ज़िंदगी,
शायद इसलिए
आज ज़िंदगी के जिस मोड पर मैं खड़ी हूँ
वहाँ से देखो तो सब कुछ बदल चुका है
यहाँ तक के ज़िंदगी के पहले पड़ाव का मंज़र भी,
जिसमें बेटी बनकर जन्म लिया तो
बड़े होते ही मेरे घर के साथ-साथ,
मेरा परिवार ही नहीं,
मेरा नाम तक बदल दिया,
मगर शायद यही काफी न था किस्मत को मेरी
की समय ने फिर करवट ली
पहले तो सिर्फ मेरा शहर ही बदला था
मगर अब तो मेरा देश भी बदल गया
आगे और भी नजाने क्या-क्या बदलना बाकी है
न जाने कितनी शह और मात बाकी हैं
जाने कितनी बारिशों में अब भी मेरे कुछ जज़्बात धुलने बाकी है
गुजरते वक़्त के साथ ऐसा लगा
जैसे ज़िंदगी के चलचित्र पर कोई दृश्य बदल गया
अपना तो अब भी यह आलम है ए खुदा गुज़र रही यूं ज़िंदगी कुछ इस तरह
की तेरे मिलने की आस और तेरे मिलने की प्यास मुझ में अब भी बाकी है ...
.
पल्लवी....          

Wednesday, 26 September 2012

यादों की इमारत

यूं तो आज तुमसे मिले बिछड़े कई साल होने को आए 
मगर आज भी ऐसा लगता है 
जैसे आज की ही बात हो 
यूं होने को तो बात तुमसे आज भी होती है, रोज़ 
जब कभी भी मैं तन्हा होती हूँ 
उस वक्त तुमसे बात क्या 
मैं तो तुम्हें देख भी सकती हूँ और छू भी सकती हूँ 
क्यूंकि तुम कोई मेरा गुज़रा हुआ कल नहीं हो  
बल्कि मेरे अंदर का एहसास हो
जिसे सिर्फ मैं ही महसूस कर सकती हूँ
क्यूंकि एहसास कभी मरा नहीं करते  
लेकिन फिर भी नजाने क्यूँ
तुम्हारे इतने करीब होते हुए भी 
मेरे मन के अंदर तुमसे कहने वाली बहुत सी बातें है 
जो परत-दर-परत मेरी दिल की दीवारों पर हर रोज़ 
किसी रंग की भांति चढ़ती जाती हैं 
शायद यह सोचकर की कभी तो मिलोगे तुम, 
तब सब कहूँगी तुमसे 
एक-एक बात बताऊँगी तुम्हें 
और तब तुम्हें दिखाऊँगी मैं अपने दिल के वो बात रूपी सारे रंग 
जो शायद मैं तुम से मिलने की आस में, 
अपने दिल पर बस चढ़ती गयी थी  
जो आज एक दीवार पर पड़ी किसी रंग की एक पपड़ी के रूप में 
तुम्हारे सामने गिरने को आतुर है 
मगर सुनो डर भी बहुत लगता है मुझे, कहीं ऐसा न हो 
की तुम लौटकर वापस ही ना आओ, या हम अब कभी मिल ही ना पायें 
तो फिर क्या होगा, तब कहीं ऐसा न हो की  
यह दीवार पर पड़ी कई परतों से बनी एक पपड़ी दीवार समेत ही गिर जाये
और शेष रह जाये महज़ वो खाली खंडहर 
जो कभी तुम्हारी यादों से सजी एक खूबसूरत इमारत हुआ करती था ....  
   
  

Friday, 14 September 2012

चाहत


यूं तो ज़िंदगी ने बहुत कुछ दिया है हमें 
इसलिए तो आज सभी ने दिलोजान से चाहा है हमें  
यह मेरी ज़िंदगी का दिया हुआ कोई तौहफा ही है जो आज   
 तूने भी अपने गले से लगाया है हमें,
यही काफी न था शायद चाहत के लिए उनकी 
इसलिए उन्होने अपने सपनों में बसाया है हमें  
वरना यूं तो ना जाने कितनी आँखों ने ख्वाबों में देखा है हमें 
यह और बात है कि हम ही न कर सके मुहब्बत 
किसी ओर से तुझे चाहने के बाद
वरना इस मुहब्बत में अपने कदमो तले तो बहुतों को झुकया है हमने 
हैं नतीजा शायद इस बात का यही के 
उनके पहलू में है आज प्यार तो क्या, हमारे भी दामन में आज आग सही
कि अब तो बस गुज़र रही है ज़िंदगी यूं ही 
ए-खुदा की चाहतों का हुजूम होते हुए भी अब इस दिल को 
किसी की कोई,ख्वाइश ही नहीं 
क्यूंकि बस एक तेरी याद ही काफी है 
हमें एहसास ए मुहब्बत याद दिलाने के लिए कि जिसमें
तेरे होते हुए भी बस एक तेरी चाहत ही नहीं 
अगर कुछ है तो वो   
सौ दर्द हैं....सौ राहतें....सब मिला....हम नशीन..एक तू ही नहीं ..... 

Monday, 3 September 2012

प्यार का एक गीत...


सागर किनारे साहिल की रेत पर 
न जाने कितनी बार लिखा मैंने तुम्हारा नाम 
मगर हर बार उसे कोई न कोई सगार की लहर आकर मिटा गयी 
मगर मैंने हार ना मानी कभी, मैं हर बार लिखती गयी और वो हर बार मिटाती गयी 
उसी तरह तुमने भी शायद मेरे नाम को 
अपने ज़ेहन से मिटाने की एक नाकाम कोशिश की है 
मगर यह कोई उस साहिल की रेत पर लिखे नाम की  तरह  
 लिखा गया प्यार का पैगाम नहीं कि   
जिसे समंदर की कोई भी लेहर ,जब चाहे आकर अपने आग़ोश में लेले 
बल्कि यह तो तुम्हारे दिल के कागज़ पर वक्त की कलम से लिखा गया
 मेरी मुहब्बत का पैगाम है जिसे इस ज़माने के सागर की 
कोई भी बगावत रूपी लेहर आकर 
यूं हीं नहीं मिटा सकती कभी 
जानते हो क्यूँ ,क्यूंकि हर लेहर का साहिल से एक नाता होता है 
इसलिए तो लेहरें भी गए वक्त की तरह  लौट-लौट कर वापस आती है 
उसी साहिल को छूकर बार-बार महसूस करने के लिए
हाँ मैंने खुद भी महसूस किया है 
उन लहरों के आवेग में भी छिपा हुआ संगीत
तेरे मेरे प्यार का एक गीत की   
 तेरा मुझसे है, पहले का नाता कोई 
यूं हीं नहीं दिल लुभाता कोई 
जाने तू ....या ....जाने ना .....माने तू ...या ...माने ना .....       

Wednesday, 22 August 2012

सूर्यास्त और मेरा मन...


कभी यूं भी होता है कि 
अक्सर किसी नदी किनारे शाम के वक्त
उस नदी के निर्मल जल में पैरों को डालकर बैठना
मुझे बहुत अच्छा लगता है
न सिर्फ बैठना बल्कि
घर लौटते हुए परिंदो के करलव के साथ   
 देखना उस सूर्य को अस्त होते हुए,
ना जाने क्यूँ उस अस्त हुए सूर्य को देख  
अठखेलियाँ करता है मेरा मन
बिलकुल उसी सूर्य की आठखेलियों की भांति 
 जैसे वह सूर्य बदलता है अपना रंग 
उस आकाश गंगा में नहा कर 
खुद को शीतल करने के लिए,
..................................................................................................................................
उस वक्त बिखर जाते हैं
उस विशाल आकाश गंगा में भी नजाने कितने ही रंग 
कभी सिलेटी, तो कभी नीला, तो कभी गुलाबी सा मोहक रंग 
तब उन रंगों को देखकर  
मेरे मन के अंदर भी बिखर जाते है   
भांति-भांति के रंग,
कभी एक मुस्कुराहट, तो कभी आँखों में नमी
कभी क्रोध की ज्वाला, तो कभी आत्म संतुष्टि का भाव  
ठीक वैसे ही 
जैसे आकाश गंगा में अस्त होता हुआ सूर्य कई रंग बदलता  है,
उस वक्त ऐसा प्रतीत होता है मानो ,
जैसे यह आकाशा गंगा का रंग नही,
यह रंग है हमारी ज़िंदगी का,
क्यूंकि हमारी ज़िंदगी भी तो,
एक नदी के प्रवाह की तरह ही बहती चलती है,
शुरुआत में एक अबोध शिशु जैसी 
निर्मल, कोमल, निश्छल
लेकिन समय की एक हलचल    
हमारी ज़िंदगी की नदी को 
एक नयी दिशा देने में सक्षम सिद्ध होती है 
और उस हलचल में हिचकोले खाता हमारा अस्तित्व  
कभी वियोग, कभी मिलाप, या कभी विछोह का संताप 
सहते हुए बस डूबता उभरता रहता है 
और एक दिन यह ज़िंदगी की नदी भी  
जा मिलती है उस सागर में 
जहां से फिर कभी कोई वापस नहीं आता....

Thursday, 12 July 2012

ख़्यालों की दुनियाँ ...


दिन भर की भागा दौड़ी और किसी न किसी काम में उलझे रहने के कारण 
जब रात को थक कर जा लेटता है यह शरीर 
तब अक्सर वो मन के जागने का समय होता है 
उस वक्त जाने कैसे सारा दिन की थकान के बाद भी 
शरीर भले ही शिथिल सा निढाल हो जाये 
मगर मन, उसको तो जैसे उसी वक्त रात का आकाश मिलता है 
खुल कर ख़्यालों में उड़ने के लिए 
उनींदी सी आंखे जब अंधेरे कमरे में सफ़ेद छत को निहाराते हुए 
 सारे दिन का लेखा जोखा सोच रही होती है
तब बीच-बीच में उसी छत पर पड़ता बाहरी वाहनों का प्रकाश 
सहसा ऐसा महसूस होने लगता है 
जैसे सूने पड़े मरुस्थल से जीवन रूपी पौधे पर ऊर्जा के कुछ छींटे 
जो सूने जीवन के पौधे को थोड़ी ऊर्जा दे जाते है 
कि कहीं वो मर ही न जाये 
तब एक वक्त ऐसा भी आता है 
जब उस सोच का भार उठाती पलकें बंद होने को मजबूर हो जाती है
और तब जैसे अचानक वक्त एक बच्चे की तरह 
भागकर इस सुबह से रात तक के सफर की यह दौड़ जीत लेता है
और झट से सुबह हो जाती है  
जैसे न जाने कब से उसे बस इस ही एक पल का इंतज़ार हो 
कि कब यह पलकें बंद हो
और कब वो दौड़कर रोज़ की भांति यह रात से सुबह तक की होड़ जीत ले  
वास्तव में होता भी यही है, 
हर रोज़ घड़ी के अलार्म सी बजती घंटी
 जब सुबह-सवरे मुझे हड़बड़ाहट से जगाती है 
तब अक्सर मन में यह ख़्याल आता है
कि स्मृतियाँ रात भर नींद को धुनती रहती है 
और सुबह तक तैयार कर देती है नए सिरे से इंतज़ार की एक नयी रेशमी चादर 
शायद जीना इसी का नाम है ....