Monday, 27 February 2012

क्या इसको ही कहते हैं प्यार ....


जब भी कभी किसी को प्यार होता है 
तब हमेशा ही कोई अनदेखा, अंजाना 
सा चेहरा बिन बांधे कोई डोर ऐसे खींचता है अपनी ओर 
जैसे जन्मो जन्मांतर का रिश्ता हो उससे 
जो अनेदेखा अंजाना होते हुए भी 
बहुत ही अपना सा नज़र आता है।   

जिसके जीवन मे आने के बाद
खेतों में लहराई सरसों कल परसों में बीते बरसों
सी हो जाती है ज़िंदगी चारों और बस खुशबू ही खुशबू 
हुआ करती है मन महका-महका सा रहा करता है 
बेवजह होंटों पर मुस्कान खिली रहती है 
चेहरे और स्वभाव पर एक अनोखी आभा दमकती है।
  
हर मौसम खुश गवार सा नज़र आता है 
प्रकृति के कण-कण से प्यार हो जाता है
प्रकर्ति ही नहीं बेजान आईने से भी प्यार हो जाता है 
खुद को ही बार-बार देख मन बाग-बाग हो जाता है  
आखिर ऐसा भी क्या छुपता होता है 
उस अनदेखे अंजाने से चहरे में, 
जिसके गुम हो जाने के बाद....

ज़िंदगी रेगिस्तान सी नज़र आती है 
इतनी मायूस हो जाती है ज़िंदगी कि 
फिर जीने की कोई चाह ही बाकी नहीं रह जाती है  
जीने के लिए खुशियों में भी ग़म दिखाई देता है 
मंदिर में भी भगवान नहीं पत्थर दिखाई देता है
कल तक जो हवा का एक झोंका किसी के गालों को छूकर 
अपने नसीब पर इतराया करता था। 
  
आज वही हवा थेपडा बन कर थप्पड़ मारती है 
यह कैसी नदी बस गई है अब आँखों में 
जिसे अपना सागर ही नहीं मिलता कहीं 
बिखरते तो अब भी है, फूल कई किसी के चहरे पर कहीं 
मगर अफसोस की उन फूलों की जगह अब मोतीयों ने ले ली है।
ऐसा क्यूँ होता है बार-बार क्या इसको ही कहते है प्यार ?

जिसके बारे में कहा जाता है कि 

"हर इंसान को अपनी ज़िंदगी में 
एक बार प्यार ज़रूर करना चाहिए 
क्यूंकि प्यार इंसान को बहुत अच्छा बना देता है।"            

Tuesday, 21 February 2012

फलसफ़ा ज़िंदगी का


यूं तो शायद आज आपको मेरी यह रचना पढ़कर 
ऐसा लगे जैसे यह तो वही बात हुई "ढ़ाक के तीन पात" 
मगर क्या करू यही सच है, समंदर की लहरों 
और साहिल से शुरू हुआ यह अभिव्यक्ति का कारवां 
आज फिर समंदर पर ही आ गया है 
कोशिश तो बहुत की मैंने ,की इस समंदर से निकल कर
कुछ लिखूँ मगर मेरे मन को मेरे आँखों को शायद 
और कोई नज़ारा रास ही नहीं आया कहीं इसलिए 
आज एक बार फिर 
समंदर और इंसानी भावनाओं से जुड़ी 
कुछ अपने आप से की हुई बात, कुछ मूलाकाते...
पूर्णिमा की रात जब चाँद आपने पूरे शबाब पर होता है 
तब इस समंदर की लहरे भी धारण कर लिया करती है
आवरण श्वेत चाँदी की मीन का जो मचल-मचल कर 
स्वागत कर रही होती हैं उस पूनम के चाँद का  
क्यूंकि उस चाँद की चंद किरणों ने दिया है नव जीवन उन लहरों को 
खुलके जश्न मनाने का, के तभी बिना किसी आहट  के 
धीरे से रात के आँचल से निकल 
जब सूर्य फैला देता है अपनी स्वर्णिम किरणे उन्हीं 
मतवाली लहर नुमा मीनो पर तो जैसा अचानक की बदल 
जाता है सारा नज़ारा और वो श्वेत चाँदी की मीन सहसा  
बदल जाती है सोने की मीन मे 
कितना अदबुद्ध होता है यह मंज़र जैसे यह लहरे लहर न रहकर 
मीन नज़र आने लगती है जैसे इंसान का मन पल में 
परिस्थिति के मुताबिक खुद को बदल ही लेता है  
ठीक वैसे ही यह लहरे रात दिन एक नया आवरण ओढ़
बहलालीय करती है अपना मन 
या शायद उन चाँद और सूरज का मन  
और देखा देती है एक ही पल में वो सारा नज़ारा वो सारे मंज़र 
इंसानी ज़िंदगी के, कभी आवेग 
तो कभी अलहड़ जवानी यह पानी की रवानी
कुछ गहरे अहसास तो कुछ छोड़े हुए अनमोल पल 
समंदर की गोद से निकाला हुआ कोई सच्चा मोती 
हो जैसे सच्चा प्यार का कोई अंश कभी चाँदी तो कभी 
सोना कभी मोती ,तो कभी लहरों की गूंज में 
गूँजता सन्नाटा हो जैसे किसी के मन को अंतमर्थन 
और भी नजाने क्या-क्या छुपा है सागर किनारे  
जिसे ढूँढने और समझ ने 
में ही गुज़र जाती है तमाम ज़िंदगी 
और फिर भी समझ नहीं पाते लोग फलसफा जिंदगी का....     

Thursday, 16 February 2012

इंतज़ार ....

कभी दोस्ती का दिन, तो कभी आलिंगन का दिन,
तो कभी प्यार के इज़हार का दिन  
रोज़ कोई नया दिन आता है और आकर चला भी जाता है 
मगर,यदि कोई नहीं आता तो वह हो केवल तुम
जैसे एक कभी न ख़त्म होने वाला इंतज़ार,
जिसमें दिन रात जला करता है मेरा मन,कभी सोचा है 
घंटों समंदर के किनारे खड़े होकर जब आती-जाती हर लहर 
को देखकर मन ही मन उठती है कोई कसक तब कैसा लगता होगा मुझे 
शायद तुमने कभी महसूस ही न किया हो, 
ईर्ष्या होने लगती है, इन सागर की लहरों से मुझे और ऐसा लगता है    
मुझसे तो कहीं ज्यादा अच्छी है इस साहिल की किस्मत  
जिसे समंदर के प्यार की लहरों में भीगने के 
लिए कभी नहीं गुजरना पड़ता इस "इंतज़ार" की पीड़ा से 
मगर इस दर्द और जलन के बावजूद भी   
मुझे गुरूर है अपने प्यार पर 
कि मैंने जिससे भी प्यार किया पूरी शिद्दत से प्यार किया। 
क्यूंकि प्यार खुदा की वो नेमत है, जो हर किसी को नहीं मिलती 
बहुत किस्मत से लोगों को प्यार मिलता है।  
मुझे भी मिला, मगर इंतज़ार के रूप में क्या पता यही मेरे प्यार की  परीक्षा हो शायद 
इसलिए मैंने अपने प्यार का नाम ही रख दिया है "इंतज़ार"     
जानते हो, तुम्हारे इंतज़ार में मेरी क्या हालत होती है,
कैसे जानोगे, तुमने तो किया ही नहीं कभी किसी का इंतज़ार
तुम्हें तो बिन मांगे सब मिला है कुदरत से, तुम क्या जानोगे 
कि इंतज़ार का यदि, अपना ही एक अलग मज़ा है 
तो अपने आप में एक पीड़ा भी है इंतज़ार
खैर जाने दो तुम नहीं समझोगे     
कैसा लगता है जब किसी का जानो दिल से हो "इंतज़ार"  
ओर वो संगदिल ही संग न हो, तो कैसा लगता है, तब    
आँखों मे नींद नहीं होती और शून्यता का गहरा समुंदर 
मन मे उतर ज्वारभाटे की तरह प्रेम की दीवारों से टकरा कर 
मेरे गुरूर को चूर-चूर कर देने का पुरजोर प्रयास करता रहता है ,
पता है क्यूँ ,क्यूंकि मेरे मन के अंतस में उठती हुई 
भावनाओं की लहरों को भी पाता है, कि मुझे कितना गुरु है अपने प्यार पर
तभी तो कहीं न कहीं भरोसा भी है मुझे खुद के प्यार पर 
वो भी इस भावना के साथ, कि बिना आग में तपाये 
तो सोने की भी परख नहीं होती 
तो मैं क्या चीज़ हूँ,और फिर आग तो आग ही है 
फिर चाहे वो सोने को तापये या मन को 
तपने पर तो जलन होगी ही न !!! फिर भी 
मुझे विश्वास है एक न एक दिन तुम ज़रूर आओगे 
और तब ख़त्म हो जाएगा मेरा यह इंतज़ार 
कहती तो मैं आज भी कुछ नहीं तुम से मगर हमेशा ही जला है, मेरा मन 
मेरा अस्तित्व, मेरा वजूद तुम्हारी प्रतिक्षा की इस अग्नि में सदा ही
इसलिए अपने इस इंतज़ार को ही मानकर तस्वीर तुम्हारी
अपने मन की बातें कर लिया करती हूँ क्या करूँ हूँ तो 
आखिर मैं भी एक इंसान ही इसलिए डर भी लगता है 
कभी-कभी कि कहीं ऐसा न हो   
कि मेरे इस इंतज़ार में केवल मौन ही शेष रह जाये     
इसलिए अब तो बस एक ही गुजारिश है तुमसे 
कि हो सके, तो इतना ख्याल रखना 
इतनी भी देर ना कर देना आने में
की मेरा इंतज़ार तुम्हारा इंतज़ार बन जाये  
और मन के अंदर के ज्वारभाटे के साथ-साथ 
यह शरीर रूपी समंदर भी शांत हो जाए 
जिसमें भावनाओं की लहरें उठा करती थी कभी 
वो खुद समंदर में मिल विलीन हो जाये 
और फिर शेष रह जाये वही मौन ,निशब्द ,स्तब्ध 
इंतज़ार !!!! 

Monday, 13 February 2012

Happy Valentine's Day Friends....

फरवरी यानि प्यार का मौसम    
गुलाबों की गुलबियत लिए
गुलाबी-गुलाबी सा प्यार,
लाल-पीले गुलाबों के रंग सा रंगीन प्यार   
फूलों की खुशबों से महकता प्यार 
चौकलेट की मिठास सा मीठा-मीठा प्यार 
भोले से दिखने वाले "टेडी बीयर" सा मासूम प्यार 
तोहफों के आकर्षण सा आकर्षित करता हुआ सा प्यार 
यानि प्यार एक रूप अनेक,
तो कौन कहता है
प्यार सिर्फ रूहानी होता है,
कौन कहता है कि, प्यार सिर्फ जिस्मानी होता है 
अरे दोस्तों प्यार तो बस सिर्फ प्यार होता है 
फिर चाहे वो क्षणिक हो या अनंत अपार 
है तो वह भी प्यार,
फिर उसे चाहे कोई ख़ुशबू कहे, 
या 
खामोशी  
जो की सुनती है, कहा करती है,
जितनी नज़रें उतने प्यार के रूप 
और उसके पीछे केवल एक ही शब्द
एक ही एहसास,एक ही जज़्बात
प्यार,
तो कर दो आज सभी अपने प्यार का इज़हार,
क्यूंकि आगया है प्यार का त्यौहार
जो कि आज है  
क्या पता, कल हो न हो,
इसलिए   
happy valentine's day friends.... :)      

Thursday, 9 February 2012

दर्द...


दिल के ज़ख़्मों से बूंद-बूंद रिस्ता दर्द 
जब कभी,जज़्ब होता चला जाता हैं कहीं 
 जैसे सुखी मिट्टी में पानी 
और परत दर परत जमता चला जाता है वो दिल का दर्द, 
जैसे किसी चीज़ पर चढ़ाई 
गई मिट्टी के लेप की कई परतें जो एक दिन 
कई परतों के चढ़ाये जाने कारण आ गिरती हैं नीचे
वैसे ही एक दिन जब दिल के दर्द की परतें 
छोड़ती हैं अपनी जड़ें और गिरती हैं 
मन के धरातल पर कहीं
तब आता है एक सैलाब और फूटता है एक ज्वालामुखी 
और उसमें से निकलती हैं, मरी हुई भावनाओं की 
कुछ लाशें, कुछ कुचले हुए जज़्बात 
और तड़पता,सिसकता हुआ सा खुद का वजूद...     

Monday, 6 February 2012

मिर्च मसाला ...


क्या कहूँ लग रहा है आप सब मुझ पर पढ़कर शायद हसेंगे कि यह क्या कुछ भी लिख दिया है। मगर क्या करूँ जो महसूस किया उसे लिखे बिना रह भी नहीं सकती।

लाल मिर्च और नमक आपस में 
मिल कर बने एक मसाला 
कभी इस मसाले को खाया है 
संतरे या मौसमी के साथ 
या फिर सूखे हुए बेर या इमली के साथ 
कितना मज़ा आता है ना चटपटा स्वाद 
जैसे अंदर तक एक स्फूर्ति सी भर देता है 
फलों के साथ फलों का रस बढ़ाता सा मसाला 
खाने मे स्वाद भी लाता है यही एक मसाला 
कभी-कभी बहुत सी बातों में भी जान डाल देता है 
यही एक मसाला  
कभी सोचा है यदि सारे मसालों में 
यह दोनों ही ना हों तो भला 
क्या स्वाद रह जायेगा किसी भी खाने में
सब कुछ फीका बेस्वाद, बेजान सा खाना 
और तब न उस खाने में होगा 
कोई रूप, न रंगत, न निखार 
जैसे हो कोई मरीजों का खाना
 फिर एक पल एक खयाल आया 
ज़िंदगी भी तो एक पकवान की तरह ही है न 
अगर इसमें भी न हों सुख-दुख के खट्टे मीठे 
अनुभव या संघर्ष और सफलता या असफलता का  कोई स्वाद 
तो भला कितने बेस्वाद सी होगी न
 यह ज़िंदगी, उसमें भी किसी बेजान 
से खाने की तरह न कोई रंग होगा
न स्वाद ,न रंगत ,न निखार
बस एक मरीज के खाने सी 
बेस्वाद सी बिना नमक मिर्च की ज़िंदगी  
जैसे ज़िंदगी-ज़िंदगी नहीं मजबूरी हो कोई  
जिसे बस जीने के लिए जीना हो एक बार ..... 
    

Friday, 3 February 2012

सत्यम शिवम सुंदरम ...


कहते है प्यार अमर होता है
प्यार करने वाले खुद मिट जाते है
मगर उनका प्यार कभी नहीं मिटता
हो सकता है यही सच भी हो
वरना क्यूँ जपते लोग नाम
हीर राँझा ,या सोनी मिहिवाल का
अगले पिछले जन्म का तो पता नहीं
हमे तो आज में जीना है
क्यूंकि आज जो है वही सत्य है
और सत्य ही शिव है
लेकिन अगर सत्य ही शिव है
तो फिर वो शिव कि तरह
सुंदर क्यूँ नहीं होता
शिव जिनका न कोई आदि है ना अंत
बिलकुल प्रेम कि तरह
तो फिर सत्य क्यूँ
प्रेम की तरह कोमल नहीं होता...जैसे मेरे और तुम्हारे जीवन का यह एक कड़वा सच
....................................................................................................
क्या हुआ जो, आज हम तुम साथ नहीं है
कभी तो साथ थे न हम
आज भी उन्हीं यादों के सहारे
गुजार जाएगी यह ज़िंदगी
न कभी मैं अकेली हो सकती हूँ
तुम्हारे बिना भी, और
न तुम ही कभी तन्हा हो सकते
हो मेरे बिना फिर हम चाहें न चाहें ....
मैं नहीं कहती की तुम बेवफा हो
और आज तुम जहां हो
उसके जिम्मेदार तो तुम खुद हो ,
क्यूंकि वक्त के हाथों फर्ज़ का हाथ
थमकर तो मैंने खुद बेफाई की तुमसे
और अब जब हम दोनों
की ज़िंदगी की राहें ही
अलग हो चुकी है
तो किसी को कोई हक ही कहा
रह जाता एक दूसरे को बेवफा कहने का
माना कि फर्ज़ की रहा में
मेरा कुछ फर्ज़ तुम्हारे लिए भी था
मगर शायद वो फर्ज़ उस
फर्ज़ से कम ही था जिसे निभाने के लिए
मैंने छोड़ दिया उसे
जो मुझे दिल से अज़्ज़िज़ था
जानते हो क्यूँ
क्यूंकि तुम से पहले अधिकार है
मुझ पर उनका जिन्होंने मुझे दिया
मेरा अस्तित्व तुम्हारी ज़िंदगी में आने के लिए .....
   
 

Wednesday, 1 February 2012

क्या यही प्यार है


कभी सोचा है कि एक सितारों भरी रात से
कहीं ज्यादा रोशनी होती है एक चाँदनी रात में
क्यूँ हजारों की भीड़ में से
केवल एक चेहरा उतर जाता है
अंतस: मैं हमेशा के लिए फिर उसके बाद
भले ही कितने भी खूबसूरत चेहरे क्यूँ ना आए
ज़िंदगी में मगर उस एक चेहरे की परछाईं
जैसे छप कर रह जाती है
कागज़ से कोरे मन पर सदा के लिए
जैसे कोरे कागज़ पर
लिखावट के रूप मे स्याही
जज़्ब होती चली जाती है निरंतर
वैसे ही यह पागल मन
सारी ज़िंदगी बस उस एक
एहसास को नग्मा बना गुनगुनाया
करता है मन
"यूँ हीं कोई मिल गया था सारे राह चलते-चलते"
क्यूँ कोई भी चीज़ चाहे हो कोई मनमोहक गीत
या फिर किसी नाटक या कथा का कोई पात्र
जिसे देखकर, सुनकर या पढ़कर ऐसा लगता है
जैसे बस एक यही वह इंसान था जो इस पात्र
को इतनी शिद्दत से निभा सकता था
अगर कोई दूसरा होता,तो शायद इस पात्र के
साथ वैसा इंसाफ नहीं कर सकता था
या फिर हो असल ज़िंदगी में
आने वाला पहले प्यार का वह शौख झोंका
जो हर दिल को छू जाता है कभी न कभी
और उस एक झोंके के बाद कोई और हवा रास नहीं आती
भले ही वो कितनी भी सुहानी क्यूँ न हो
और हम उस मीठी सी याद में खोकर
अक्सर मौन से हो जाते है
क्या मौन ही एकमात्र जवाब है
दिल में उठते हुए एहसासों का
क्या अकेले में याद कर उन हसीन लम्हों को
यूँ मौन रहकर मुस्कराना प्यार है
या फिर उन एहसासों को ना चाहते हुए भी मारकर
वक्त की सूली पर टांग, फर्ज़ का नाम देकर मुकर जाना
प्यार है, या फिर एहसास ही नाम है इस प्यार का....
  

    

Friday, 27 January 2012

दुआ ना मांगते लोग ....

देखा है कभी खुद के नज़रिये से आसमान को 
देखने में एक सुंदर नारी के काले दुपट्टे में टंके  
सितारों सी रात जिसके चेहरे पर लगी है चंद्र बिंदी 
जिसने छुपा रखा है अपना चेहरा 
उस सितारे जड़े दुपट्टे से
ताकि कोई भूल से भी देखना ले उस रात का दर्द 
जो सागर की तरह गहरा है देखने में ऊपर से शांत 
मगर अंदर से हलचल मचाते होंगे उसके भी जज़्बात 
क्यूंकि इस इंसानी बेहरहम दुनिया में 
मतलब परस्तों कि कमी जो नहीं है, कहीं 
जहां एक इंसान दूसरे इंसान की मजबूरी और लाचारी 
का फायदा उठाने से नहीं चुकता 
वो लालची और खुदगर्ज़ इंसान भला क्या समझेगा 
उस सजी हुई रात के पीछे बिखरे सन्नाटे और दर्द कि पराकाष्ठा को  
क्यूँकि दर्द को समझने के लिए दिल में एहसासों और जज़्बातों
कि जरूरत होती है, जो अब ढूँढने से भी कहाँ मिलती है 
अगर ना होता ऐसा तो टूटते हुए सितारे से भी 
दुआ ना मांगते लोग......
पल्लवी 

Wednesday, 25 January 2012

अस्तित्व ज़िंदगी का ....


ज़िंदगी एक रूप अनेक 
बचपन के रंगों से सजी झरने सी ज़िंदगी 
जवानी के रंग लिए नदिया सी मदमाती ज़िंदगी
तो कभी सागर की तरह ठेहराव लिए शांत सी ज़िंदगी
जब कोशिश की समझने की यह फलसफा ज़िंदगी का तो पाया की  
अस्तित्व कभी ख़त्म नहीं होता ज़िंदगी का 
लेकिन जिस तरह पानी एक झील और सागर के रूप में 
ठहरा होते भी बहता दिखाई देता है
जिससे पता चलता है ज़िंदा है अभी अस्तित्व 
पानी के बहाव का, वैसे ही ज़िंदगी कभी मिटती नहीं    
चाहे हो पौधों का जीवन जो बीज या जड़ों के रूप रूप में 
भी ज़िंदा रहा करता है बरसों जैसे 
माता-पिता का अस्तित्व रहता है 
सदा अपने बच्चों के संस्कारों में 
और प्यार का अस्तित्व 
सदा रहा करता है स्म्रतियों में कहीं 
जैसे किसी इत्र की महक जो 
ज़ेहन में बस जाये एक बार
तो फिर कभी भुलाई नहीं जाती
जैसे रात का अस्तित्व जिंदा रहा करता है 
दिन की रोशनी में कहीं
रात के अंधेर को मिटाने के लिए  
नींदों को रोशना किया करते है ख़ाब
देखो ना बिना रोशनी कुछ भी तो नहीं  
कौन कहता है जाने वाले चले जाते है 
और सिर्फ यादें रह जाती है 
कोई कहीं नहीं जाता सब हमारे आस पास ही 
होते हैं जिन्हें देख भले ही न पाये हम 
मगर उन्हें हर पल ज़रूर महसूस किया जा सकता है उनके अंशों में कहीं .....      
पल्लवी 

Saturday, 21 January 2012

जीवन रूपी अग्नि ...


गीली मिट्टी के बर्तन सी ज़िंदगी
जैसे हो हमारा बचपन
जिसे कुम्हार अपने हाथों से 
सहेज कर बनाता है एक घड़ा और एक सुराही  
दोनों को ही डाल देता है आग मे
तपाकर पक्का करने के लिए 
बिना किसी भेद के क्यूंकि 
उसे अपने दोनों ही बर्तन प्यारे है
वह तो दोनों को ही 
आग में तपा कर पक्का करना चाहता है   
चाहे वो सुराही हो या घड़ा 
और ना ही आग ही भेद करती है दोनों को 
पक्का कर मजबूती प्रदान करने में 
तो फिर क्यूँ हम भेद करने 
लगते है जीवन रूपी आग में 
एक स्त्री को ज्यादा पक्का करने के लिए
क्या एक पुरुष को भी
उस ही जीवन अग्नि में तपकर 
उतना ही पक्का होना ज़रूरी नहीं 
जितना की एक स्त्री के लिए है
तो फिर क्यूँ भूल जाते हैं हम 
जब वही आग जरूरत से ज़्यादा हो जाये 
तो जला भी सकती है उन्हीं बर्तनो को
मगर एक स्त्री को जीवन रूपी आग में
एक बेटी के रूप में, तो कभी एक बहु के रूप में  
छोड़कर जैसे भूल ही जाते हैं हम
और छोड़ देते हैं उसे सदा के लिए 
उस आग में जलने को 
जिसमें वह चुप रहकर भी जलती है 
और यदि बोलना चाहे कुछ 
तो जला दी जाती
क्यूँ नारी जीवन बचपन से लेकर 
अतिम सांस तक एक अग्नि परीक्षा 
ही बना रहता है और जब तक 
एहसास हो हमें उस तपिश का 
तब तक शेष रह जाता है
केवल धुआँ और राख़
कभी भावनाओं के रूप मे,
तो कभी मिटे हुए अस्तित्व को याद करने के लिए ....      

Thursday, 19 January 2012

वक्त साथ दे तो कुछ बात बने ....

 बहुत देर तक चाँद को देखा है कभी
ऐसा लगता है जैसे एक सफ़ेद
चीनी की प्लेट हो और उस 
सफ़ेद चाँद की प्लेट 
पर ऊपर खड़े 
होकर ऊपर से   
जब देखा मैंनेधरती को 
तो मुझे ऐसा लगा वो चाँद 
जिस पर हम खड़े है
वह हमारा वर्तमान है 
और वो जो दूर कहीं नीला 
सा एक बिन्दु नज़र आरहा है 
वह है हमारा अपना अतीत 
बहुत ध्यान से नज़रें गाड़ा कर 
देखा तो ऐसा लगा 
जैसे मन खो गया है 
उस अतीत की गहराइयों में कहीं 
जब उस अतीत की ऊंची नीची पहाड़ियों 
नदियों और झरनो की तरह 
पानी बन बह रहे जज़्बातों को देखा 
तो उस पानी में 
प्यार के सच्चे मोती के 
कुछ कण से मिले
जो समय के बहाव के कारण 
शायद मेरे हाथों से 
फिसल कर वहीं गिर गए थे
मगर शायद हमारी भावनाओं के 
समंदर ने उन प्यार के कणों की रक्षा की
तभी वक्त का दरिया भी उन्हे 
अपने साथ बहाकर ना लेजा सका
शायद इसलिए
आज इतने बरसों बाद भी मुझे मिले 
मेरे सच्चे प्यार के कुछ बिखरे हुए से कण
जिन्हें देखकर एक बार फिर
मेरे दिल से आवाज आई की 
प्यार तब भी था, प्यार अब अभी है
क्यूंकि यह वक्त ही है 
जिसने हमें जुदा किया था 
और आज भी यह वक्त ही है 
जिसने यह एहसास जगाया 
प्यार कभी नहीं मिटता 
और आज भी यह वक्त ही है     
जो हमें फिर मिलाएगा  
तो अब 
अगर वक्त साथ दे तो कुछ बात बने....

Monday, 16 January 2012

किताब ज़िंदगी की ...


ज़िंदगी की किताब में 
एहसासों के पन्ने होते है  
जिन पन्नो पर कभी लिखी 
होती है मन की अभिव्यक्ति
तो कभी कुछ
कहे अनकहे से जज़्बात 
खुद से ही करी हुई हजारों बातें 
सागर से गहरे एहसास 
जिनसे समय के साथ बने 
न जाने कितने अनुभव लिखे होते हैं  
कभी कुछ अच्छे, तो कुछ बुरे भी 
और हर एक पन्ने पर लगा होता है एक बूक मार्क 
कभी एक मुस्कान का, तो कभी आँसुओं का  
जिनसे निर्माण हुआ कुछ भूली बिसरी यादों का 
इरादों का, कुछ सपनों का,कुछ अपनों का  
हर एक पन्ने पर बुना हुआ एक सपना 
जो था कभी अपना 
मगर अब देखो तो लगता है 
जैसे किसी मकड़ी का टूटा हुआ सा जाल 
जिसके टूट जाने पर भी उसमें जकड़ी हुई है एक मकड़ी 
क्यूंकि सपनों का मोह कभी छूटता ही नहीं 
और इसे पहले कोई छुड़ा सके अपना मोह 
अपने ही किसी सपने से 
पलट जाता है ज़िंदगी की किताब का एक और पन्ना 
फिर कोई नई उम्मीद और नाय सपना लिए 
कोशिश करने लगते है हम
हर एक नए पन्ने पर नए सिरे से 
ज़िंदगी की किताब का एक और नया पन्ना
लिखने के लिए 
मगर कितनी अजीब किताब है यह ज़िंदगी 
जिसे केवल खुद ही पढ़ा जा सकता है 
यदि दो भी किसी को पढ़ने के लिए यह किताब   
तो जाने क्यूँ उस पढ़ने वाले को हर एक पन्ना 
जैसे कोरा कागज़ ही नज़र आता है 
और हम यह आस लिए तांकते
रह जाते की शायद
यही हो वो जो समझ सके हमें
हमारी इस किताब के जरिये ही सही
मगर इसी नाकाम कोशिश में
एक दिन भर जाती है यह पूरी किताब
ज़िंदगी की ......
पल्लवी   

Friday, 13 January 2012

क्या तुम्हें याद है ...


दिल जब भी उदास होता है  
क्यूँ अक्सर यही होता है 
पीछे वजह होती है तेरे भूल जाने की
 क्यूँ तुझे कुछ नहीं याद होता है
क्यूँ हर चीज़ याद रह जाती है मुझे
जिस-जिस में तू शामिल होता है, 
चाहे हो वो पहले प्यार की पहली मुलाक़ात ,
या हो इज़हारे मोहोब्बत का दिन ,
जब कुछ इज़हार हुआ था 
शायद हमको प्यार हुआ था 
और जब विवाह के पवित्र बंधन में बंध 
दो से एक हुए थे हम,
यहाँ तक कि जब वही विवाह का बंधन,
बंधन बना गया था हमारे लिए ,
तब से लेकर आज तक 
हर छोटी बड़ी बात, वो प्यारे से एहसास,
कुछ अनछुए जज़्बात  
आज कहा खो गए वो पल 
जब दिल में मची है हलचल,
जब उठ रहीं हैं मन के समंदर में 
कुछ भूली बिसरी यादों की लहरें 
जो दे रही हैं दस्तक 
मेरी ज़िंदगी में ठहरे हुए तूफान को 
,  और कह रहीं है तुम से कि बस 
एक बार खोल दो तुम अपने मन के द्वार को 
 और साथ ले जाने दो मुझे 
तुम्हारे अंदर की सारी कड़वाहट,
मगर तुम हो जो खोलना ही नहीं चाहते
 अब अपने मन के वह द्वार 
शायद इसलिए     
 मैं जज़्ब कर लेती हूँ
उन लहरों का खरा पानी अपनी आँखों में 
यह आस लिए कि शायद 
 मेरी उन नाम आँखों को देखर फिर याद आ जाये तुम्हें 
वो नाम, वो चहरा, वो बातें, वो मुलाकातें   
जिसे देखकर टूट जाये शायद 
तुम्हारे मन के कमरे की वो दीवार
और बेह जाये वो भावनाओं का 
समंदर फिर एक बार
सिर्फ मेरे लिए ..... 

Thursday, 12 January 2012

ज़िंदगी के कुछ (सुहाने पल)...



यूँ तो ज़िंदगी में हर मोड़ पर 
सुख दुःख आते जाते ही रहते है 
जैसे सर्दियों का सर्द मौसम अक्सर 
लोगों को उदास बना जाता है
क्योंकि घर के बाहर कोई ना नज़र आता है 
मगर यूँ उदास और निराश होकर जीये 
तो क्या जीये, मज़ा तो तब आता है
जब वही कोहरे में छुपा सूरज 
निखर के बाहर आता है 
कभी जब खुद को गर्म कपड़ों में लपेटे 
ठंड में कपन्ती सुकुड़ती  
निकलती हूँ घर के बाहर 
इस उम्मीन्द के साथ   
सर्दी में सर्द पड़ी अपनी ज़िंदगी 
को तुम्हारे प्यार से गरमा सकूँ 
तो सर्द सुबहा में भी धुंध की ओट में 
से चुपके-चुपके मुझे देखकर 
मुसकुराता हुआ सूरज ऐसा नज़र आता है
जैसे तुम्हारा मुसकुराता हुआ चहरा 
कर रहा हो मेरा स्वागत 
एक नई ताज़गी से भरी सुबह के लिए
जो भर देता है मुझ में 
 एक नया जोश और आत्मविश्वास  
हर दिन ज़िंदगी से लड़ने के लिए 
जिसे देख, भर जाती हूँ मैं नई स्फुर्ति से 
सारा दिन तुम बिन बिताने के लिए 
और फिर जब रोज़ की 
भागदौड़ के बाद थक कर मन करता है 
कुछ पल सुकून से बिताने के लिए तो 
इंतज़ार होता है तुम्हारा ढलती 
महकती शाम के साथ 
तुम्हारा भी साथ पाने के लिए तब     
  तुम्हारा वही सूरजमुखी सा चहरा 
बन जाता है मेरे लिए रातरानी सा 
मुझे महकाने के लिए 
और सर्दी की सर्द रातों में 
मुझे मीठे महँकते सपनों से सजी
 चैन और सुकून की नींद सुलाने के लिए..
.पल्लवी

Monday, 9 January 2012

भावनायें....

लिखने जाती हूँ जब 
कोरे कागज़ पर अपने 
जज़्बात तो ऐसा लगता है 
जैसी सियाही के रूप में 
मन की अभिव्यक्ति पिघल-पिघल 
कर बह रही हो भावनाओं में 
सागर की तरह, 
जिसका हर एक शब्द  
जो दिखने में ऊपर से 
बहुत शांत दिखाई देता है 
मगर अंतस में उठ रहा है सेलाब
भावनाओं का 
कुछ कही-अनकही सी भावनायें 
कुछ जानी पहचानी सी भावनायें 
कुछ बनती बिखरती भावनायें 
जैसे साहिल पर पड़ी रेत 
से बने हुए सपनों के महल  
तब तक टीके रहते हैं 
जब तक रेत 
नम होती है वक्त रूपी सूरज 
की तपिश पाते ही 
खो जाती है सारी नमी 
और टूट कर बिखर जाता है 
उन रेत के महलों 
का अस्तित्व 
मन की भावनाओं की तरह....  

Friday, 6 January 2012

आखिर क्या है यह ज़िंदगी....


समंदर में उठती लहरें 
जैसी पानी सी बहती हुई ज़िंदगी 
ऊँची-नीची लहरों सी 
पल-पल बदलती ज़िंदगी 
समंदर के पानी की तरह 
कभी गहरी, तो कभी, उथली सी ज़िंदगी 
नदिया और सागर के मिलन
सी कभी मीठी तो कभी 
खारे पानी सी खारी ज़िंदगी,
आखिर क्या है यह ज़िंदगी
जैसे पहेली हो कोई  
जिसका शायद कोई जवाब नहीं 
अपनी होते हुए भी
  जानी-अनजानी सी ज़िंदगी
जैसे कुछ कही-अनकही सी बातें
जो आँखों-आँखों में होकर भी 
रह जाती हैं अधूरी   
कुछ ऐसे सवाल जिनका 
शायद कभी कोई जवाब ही नहीं होता, 
अगर कुछ होता है,
तो वह है केवल मौन, एक ऐसी खामोशी 
एक ऐसा सन्नाटा जो सुनाई देता है  
लहरों के शोर गुल मैं भी 
जिसमें अक्सर तलाश होती है 
 खुद के अस्तित्व की, खुद के वजूद की
जैसे मंदिर की घण्टियों के शोर 
में भी आभास होता है शांति का 
आखिर क्यूँ और कहाँ से आभास होता है 
इतने शोर गुल में भी पसरे सन्नाटे का           
जैसे दूर .......तक नज़र डालने पर भी कभी 
सागर का दूसरा किनारा नज़र नहीं आता 
 ठीक वैस ही, उस ज़िंदगी पर नज़र डालकर 
  भी देखा है कभी,
उस ज़िंदगी का भी  
कभी कोई ओर-छोर नज़र नहीं आता 
बस बहते पानी सी गुज़रती चली जाती है 
यह ज़िंदगी और हम, साहिल की रेत की तरह 
जज़्ब करते चले जाते हैं ज़िंदगी में उठती हुई लहरों के थपेड़ों को 
और नाम देदेते हैं उसे 
मेरे अनुभव ..... :)

Wednesday, 4 January 2012

यादों में भीगा मन

सागर किनारे एकांत में 
अकेले बैठकर कभी सोचा है 
मन रूपी समंदर के तट पर आती 
हुई यादों की हर लहर 
छूकर गुज़र जाती है 
मन को,
जैसे साहिल को छूकर गुज़र जाती हैं लहरें 
और लौटते हुए 
दे जाती है, एक नम एहसास, 
जिसकी नमी अंतस में उतर कर 
न सिर्फ मन को, बल्कि आँखों 
को भी कर जाती है गीला 
फेर्क सिर्फ इतना होता है कि,
यादों की लहर का पानी
कभी पानी मीठा होता है, तो कभी खारा  
दूर.... कहीं किसी सागर किनारे  
उठती हुई ऊँची लहरों का पानी 
जब हल्की बारिश सी बूंदों की तरह 
भिगो जाता है तन  
तब न सिर्फ तन, बल्कि मन भी  
तृप्त हो जाता है,
जैसे प्यासे रगिस्तान को मिला हो पानी 
जैसे वात्सल्य के लिए तरसते शिशु को मिली हो ममता 
जैसे भक्त को मिले हो भगवान 
जैसे दो प्यार करने वाले प्रीमियों को बरसों जुदाई के बाद मिला हो मिलन 
इसे ज्यादा भी और कुछ हो सकती है क्या तृप्ति कि परिभाषा ....... 

Friday, 30 December 2011

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें....

वक्त का पहिया न रुका है कभी 
न रुकेगा कभी किसी के लिए 
हर साल एक नया साल आता है 
तो एक पुराना साल जाता है 
यह आना जाना 
बस यूं हीं चलता-चला जाता है
ज़िंदगी का भी तो कुछ यही 
सिलसिला है 
जो न रुकती है कभी, किसी के लिए 
हर साल एक नई ज़िंदगी जन्म लेती है 
तो एक पूरानी ज़िंदगी देह त्याग देती है 
और जीवन का यह सिलसिला भी
यूं चलता रहता है
एक कभी ख़त्म न होने वाला सिलसिला 
जैसे सागर कि बाहों में मौजों का सिलसिला 
ठीक इसी तरह 
आप सभी के जीवन में भी यह 
 सागर कि लहरों रूपी खुशियों का 
सिलसिला कभी न रुके, कभी न थमे 
बस इस ही मंगल कामना के साथ 
आप सभी को नव वर्ष कि हार्दिक शुभकामनायें  
  

Wednesday, 28 December 2011

पहले प्यार का एहसास


पहले प्यार का वो पहला 
सागर नुमा 
गहरा एहसास 
सागर की बाहों में मचलती लहरें 
प्रेमियों के मन में मचलती 
हुई भावनायें हो जैसे, 
साहिल को छूने के लिए 
जैसे मचलती है लहरेंऔर 
साहिल की रेत उन लहरों को अपने 
अंदर जज़्ब कर लेती है 
जैसे आत्मा में प्रेम समा जाता है 
तब उस गहराई में जाकर होता है
एक ऐसे सच्चे प्रेम का निर्माण 
जैसे सिपीं में 
छुपा सच्चा मोती हो कोई  
प्रमियों का मन भी, 
तो मचलता है वैसे ही ,
बस एक बार अपने पहले प्यार 
के पहले स्पर्श के लिए 
पहले प्यार का वो 
पहला स्पर्श 
जो न केवल तन, बल्कि मन पर 
भी छोड़ जाता है अपने अस्तित्व 
की वो अमिट छाप 
जिसे चाहकर भी कोई
कभी भुला नहीं पाता ....