Pasand

Wednesday, 27 August 2014

माँ के मन की व्यथा...

›
वर्तमान हालातों को मद्दे नज़र रखते हुए जब मैंने मेरी ही एक सहेली से फोन पर बात की और तब जब उसने यह कहा कि यार चिंता और फिक्र क्य...
15 comments:
Saturday, 22 February 2014

प्रेम

›
प्रेम क्या है ! इस बात का शायद किसी के पास कोई जवाब नहीं है। क्योंकि प्रेम की कोई निश्चित परिभाषा भी तो नहीं है। प्रकृति के कण–कण में प्रे...
25 comments:
Wednesday, 29 January 2014

बस यूँ ही...

›
अजीब दास्‍तान है ये कहां शुरू कहां खत्म ये मंज़िलें हैं कौन सी न वो समझ सके न हम.... सच ज़िंदगी भी तो ऐसी ही है। ठीक इसी गीत की पंक्त...
18 comments:
Thursday, 2 January 2014

कल रात

›
  सुनो जानते हो कल फिर आया था चाँद मेरे द्वारे।   मेरे कमरे की खिड़की में टंगे जाली के पर्दे की ओट से   चुपके - चुपके देख रहा ...
12 comments:
Wednesday, 18 December 2013

खुद भी देखो एक बार प्रकृति बनकर....

›
सर्दियों की ठंडी ठंडी सुबह में मैं और मेरे घर का आँगन  मध्यम- मध्यम  बहती हुई शीत लहर सी पवन  जैसे मेरे मन में किसी गोरी के रूप को गढ़ ...
11 comments:
Wednesday, 11 December 2013

एक मुलाक़ात चाँद के साथ...

›
कल रात मैंने चाँद को देखा। सूने आकाश में उदास बहुत उदास सा जान पड़ा वो मुझे। कल रात ऐसा लगा जैसे बहुत कुछ कहना चाहता है वो मुझ से। वरना इ...
14 comments:
Wednesday, 4 December 2013

सर्द हवाओं में ठिठुरते एहसास....और तुम

›
सर्द हवाओं में ठिठुरते एहसास और तुम  इन दिनों बहुत सर्दी है यहाँ,   एकदम गलन वाली ठंड के जैसी ठंड पड़ रही है जिसमें कुछ नहीं बचता ...
22 comments:
Monday, 18 November 2013

पेड़ों पर अंतिम सांस लेते हुए पत्तों की दास्ताँ

›
     सर्द हवाओं में मेरे साथ साथ चलती दूर बहुत दूर तलक मेरे साथ सूनी लंबी सड़क जिस पर बिछे है न जाने कितने अनगिनत लाखो करोड़ों ...
7 comments:
Sunday, 10 November 2013

ज़िंदगी

›
यूं तो सभी की ज़िंदगी एक किताब है  मगर तुम से मिलकर जाना कि  तुम भी तो एक बंद किताब की तरह ही हो  जिसकी परत दर परत, एक एक करके ...
9 comments:
Tuesday, 24 September 2013

कुछ खामोशियाँ ऐसी भी ...

›
कभी देखा सुना या महसूस भी किया है तन्हाइयों को  खामोशी की चादर लपेटे एक चुप सी तन्हाई  जो दिल और दिमाग के गहरे समंदर से निकली हुई एक ल...
18 comments:
Thursday, 29 August 2013

ख़याली पुलाव या एक वृक्ष, क्या है ज़िंदगी ?

›
ख़याली पुलाव कितने स्वादिष्ट होते है ना  झट पट बन जाते है इतनी जल्दी तो इंसटेंट खाना भी नहीं बन पाता  मगर यह ख़याली पुलाव तो,  जब ...
19 comments:
Thursday, 25 July 2013

ऐसा तो ना था मेरा सावन ...

›
देखो ना सावन आने वाला है यूं तो सावन का महीना लग गया है मगर मैं भला कैसे मान लूँ कि सावन आगया है  क्यूंकि प्रिय ऐसा तो ना था मेर...
14 comments:
Saturday, 20 July 2013

कविता ...एक कोशिश

›
कुछ मत सोचो  न कोई रचना, ना ही कविता मैं यह सोचूँ  काश के तुम बन जाओ कविता  जब चाहे जब तुमको देखूँ  जब चाहे जब पढ़ लूँ तुमको ...
21 comments:
Friday, 21 June 2013

क्या यही प्यार है ?

›
तुम, तुम प्यार की बात कर रहे हो  सुनो तुम्हारे मुंह से यह प्यार व्यार की बातें अच्छी नहीं लगती (जानेमन)   तुम जानते भी हो प्यार होत...
16 comments:
Wednesday, 19 June 2013

गंगा की व्यथा ....

›
मेरा नाम है गंगा हाँ हूँ, मैं ही हूँ गंगा वो गंगा जिसे तुम ने अपने सर माथे लगाया बच्चों को मेरा नाम लेले कर नहलाया, जो कुछ भी मिल...
18 comments:
Tuesday, 11 June 2013

फूल गुलाब का ....

›
"फूल गुलाब का लाखों में हजारों में  चेहरा जनाब का"  कितना आसान होता है ना, किसी को गुलाब कह देना निर्मल, कोमल, खुशबू से...
25 comments:
Sunday, 9 June 2013

इसी का नाम है ज़िंदगी ...

›
पल पल बदलते रहने का नाम है ज़िंदगी आज सुबह तो कल शाम है ज़िंदगी अपने ग़म में तो सभी जीते है दूसरों के ग़म को जीने का नाम है ज़िंदगी...
18 comments:
Wednesday, 5 June 2013

रेत का दर्द...

›
 समंदर का दर्द तो सभी महसूस करते है लेकिन क्या कभी किसी ने उसके किनारे पड़ी रेत के दर्द को भी महसूस किया है शायद नहीं, क्यूंकि...
12 comments:
Saturday, 25 May 2013

ज़िंदगी की सारी खुशियाँ जैसे मौन हो कर रह गयी...

›
ज़िंदगी की सारी खुशियाँ जैसे मौन हो कर रह गयी वो छोटे-छोटे खुशनुमा पल वो गरमियों की छुट्टियों में चंगे अष्टे खेलना वो रातों को सितारों क...
25 comments:
Tuesday, 12 March 2013

बारिश और मैं ....

›
आज क्या लिखूँ कि मन उलझा-उलझा सा है रास्ते पर चलते हुए जब छतरी के ऊपर गिरती पानी की बूँदें शोर मचाती है तो कभी उस शोर को सुन मन मयूर मचल उठ...
23 comments:
‹
›
Home
View web version

About Me

My photo
Pallavi saxena
मैं भोपाल की रहने वाली हूँ। मैंने अपनी सम्पूर्ण शिक्षा भोपाल में ही प्राप्त की। भोपाल के नूतन कालेज से बी.ए एवं अँग्रेज़ी साहित्य में एम.ए किया। एक साधारण सी गृहणी, 7 वर्ष लंदन में रहने के बाद 2014 में फिर अपने वतन भारत(पुणे) वापस आई हूँ। हिन्दी के सुप्रसिद्ध लेखक श्री मुंशी प्रेमचंद को बहुत पसंद करती हूँ। उनके लेखन की सरल भाषा को ध्यान में रखकर, उनसे प्रेरित होकर ही मैं अपने ब्लॉग की भाषा को भी सरल बनाकर लिखने का प्रयास करती हूँ, ताकि मेरे ब्लॉग को हर आयु, वर्ग का व्यक्ति आसानी से समझ सके। अपने इस ब्‍लॉग में मैं अपने जीवन के अनुभव प्रस्‍तुत कर रही हूँ।
Garbhanal
View my complete profile
Powered by Blogger.