Thursday, 16 February 2012

इंतज़ार ....

कभी दोस्ती का दिन, तो कभी आलिंगन का दिन,
तो कभी प्यार के इज़हार का दिन  
रोज़ कोई नया दिन आता है और आकर चला भी जाता है 
मगर,यदि कोई नहीं आता तो वह हो केवल तुम
जैसे एक कभी न ख़त्म होने वाला इंतज़ार,
जिसमें दिन रात जला करता है मेरा मन,कभी सोचा है 
घंटों समंदर के किनारे खड़े होकर जब आती-जाती हर लहर 
को देखकर मन ही मन उठती है कोई कसक तब कैसा लगता होगा मुझे 
शायद तुमने कभी महसूस ही न किया हो, 
ईर्ष्या होने लगती है, इन सागर की लहरों से मुझे और ऐसा लगता है    
मुझसे तो कहीं ज्यादा अच्छी है इस साहिल की किस्मत  
जिसे समंदर के प्यार की लहरों में भीगने के 
लिए कभी नहीं गुजरना पड़ता इस "इंतज़ार" की पीड़ा से 
मगर इस दर्द और जलन के बावजूद भी   
मुझे गुरूर है अपने प्यार पर 
कि मैंने जिससे भी प्यार किया पूरी शिद्दत से प्यार किया। 
क्यूंकि प्यार खुदा की वो नेमत है, जो हर किसी को नहीं मिलती 
बहुत किस्मत से लोगों को प्यार मिलता है।  
मुझे भी मिला, मगर इंतज़ार के रूप में क्या पता यही मेरे प्यार की  परीक्षा हो शायद 
इसलिए मैंने अपने प्यार का नाम ही रख दिया है "इंतज़ार"     
जानते हो, तुम्हारे इंतज़ार में मेरी क्या हालत होती है,
कैसे जानोगे, तुमने तो किया ही नहीं कभी किसी का इंतज़ार
तुम्हें तो बिन मांगे सब मिला है कुदरत से, तुम क्या जानोगे 
कि इंतज़ार का यदि, अपना ही एक अलग मज़ा है 
तो अपने आप में एक पीड़ा भी है इंतज़ार
खैर जाने दो तुम नहीं समझोगे     
कैसा लगता है जब किसी का जानो दिल से हो "इंतज़ार"  
ओर वो संगदिल ही संग न हो, तो कैसा लगता है, तब    
आँखों मे नींद नहीं होती और शून्यता का गहरा समुंदर 
मन मे उतर ज्वारभाटे की तरह प्रेम की दीवारों से टकरा कर 
मेरे गुरूर को चूर-चूर कर देने का पुरजोर प्रयास करता रहता है ,
पता है क्यूँ ,क्यूंकि मेरे मन के अंतस में उठती हुई 
भावनाओं की लहरों को भी पाता है, कि मुझे कितना गुरु है अपने प्यार पर
तभी तो कहीं न कहीं भरोसा भी है मुझे खुद के प्यार पर 
वो भी इस भावना के साथ, कि बिना आग में तपाये 
तो सोने की भी परख नहीं होती 
तो मैं क्या चीज़ हूँ,और फिर आग तो आग ही है 
फिर चाहे वो सोने को तापये या मन को 
तपने पर तो जलन होगी ही न !!! फिर भी 
मुझे विश्वास है एक न एक दिन तुम ज़रूर आओगे 
और तब ख़त्म हो जाएगा मेरा यह इंतज़ार 
कहती तो मैं आज भी कुछ नहीं तुम से मगर हमेशा ही जला है, मेरा मन 
मेरा अस्तित्व, मेरा वजूद तुम्हारी प्रतिक्षा की इस अग्नि में सदा ही
इसलिए अपने इस इंतज़ार को ही मानकर तस्वीर तुम्हारी
अपने मन की बातें कर लिया करती हूँ क्या करूँ हूँ तो 
आखिर मैं भी एक इंसान ही इसलिए डर भी लगता है 
कभी-कभी कि कहीं ऐसा न हो   
कि मेरे इस इंतज़ार में केवल मौन ही शेष रह जाये     
इसलिए अब तो बस एक ही गुजारिश है तुमसे 
कि हो सके, तो इतना ख्याल रखना 
इतनी भी देर ना कर देना आने में
की मेरा इंतज़ार तुम्हारा इंतज़ार बन जाये  
और मन के अंदर के ज्वारभाटे के साथ-साथ 
यह शरीर रूपी समंदर भी शांत हो जाए 
जिसमें भावनाओं की लहरें उठा करती थी कभी 
वो खुद समंदर में मिल विलीन हो जाये 
और फिर शेष रह जाये वही मौन ,निशब्द ,स्तब्ध 
इंतज़ार !!!! 

12 comments:

  1. अति सुंदर रचना है, वाह

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  2. ईर्षा होने लगती है, इन सागर की लहरों से मुझे और ऐसा लगता है
    मुझसे तो कही ज्यादा अच्छी है इस साहिल की किस्मत
    जिसे समंदर के प्यार की लहरों में भीगने के
    लिए कभी नहीं गुजरना पड़ता इस "इंतज़ार" की पीढ़ा.... :)
    अति सुंदर रचना ,मन की बातें की अच्छी प्रस्तुति.... :)

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  3. अति सुंदर रचना ,मन की बातें की अच्छी प्रस्तुति..

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  4. bahut sunder bhav.............

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  5. आप सभी पाठकों का टहे दिल से शुक्रिया...कृपया यूं ही संपर्क बनाए रखें।

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  6. आप मेरे ब्‍लाग तक आए और आपने प्रोत्‍साहन दिया आपका आभार। आपका ब्‍लाग और रचनायें सुन्‍दर है आपको साधुवाद। आशा है आप भविष्‍य में भी प्रोत्‍साहित करेंगे।

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  7. achi kavita par bahu lambi hae :(

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  8. गहन भावनाओं (intense sentiments) से सजी बहुत सुंदर कविता.

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  9. ये इंतज़ार भी जबरदस्त चीज़ है न :)
    वैसे मैंने भी इंतज़ार पर एक पोस्ट लिखा था..
    कविता नहीं, वो बस एक पोस्ट ही था!

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  10. आपके विचारो की अति सुन्दर अभिव्यक्ति है
    ........................इन्दु

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