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Thursday, 29 August 2013

ख़याली पुलाव या एक वृक्ष, क्या है ज़िंदगी ?

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ख़याली पुलाव कितने स्वादिष्ट होते है ना  झट पट बन जाते है इतनी जल्दी तो इंसटेंट खाना भी नहीं बन पाता  मगर यह ख़याली पुलाव तो,  जब ...
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Thursday, 25 July 2013

ऐसा तो ना था मेरा सावन ...

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देखो ना सावन आने वाला है यूं तो सावन का महीना लग गया है मगर मैं भला कैसे मान लूँ कि सावन आगया है  क्यूंकि प्रिय ऐसा तो ना था मेर...
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Saturday, 20 July 2013

कविता ...एक कोशिश

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कुछ मत सोचो  न कोई रचना, ना ही कविता मैं यह सोचूँ  काश के तुम बन जाओ कविता  जब चाहे जब तुमको देखूँ  जब चाहे जब पढ़ लूँ तुमको ...
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Friday, 21 June 2013

क्या यही प्यार है ?

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तुम, तुम प्यार की बात कर रहे हो  सुनो तुम्हारे मुंह से यह प्यार व्यार की बातें अच्छी नहीं लगती (जानेमन)   तुम जानते भी हो प्यार होत...
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Wednesday, 19 June 2013

गंगा की व्यथा ....

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मेरा नाम है गंगा हाँ हूँ, मैं ही हूँ गंगा वो गंगा जिसे तुम ने अपने सर माथे लगाया बच्चों को मेरा नाम लेले कर नहलाया, जो कुछ भी मिल...
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Tuesday, 11 June 2013

फूल गुलाब का ....

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"फूल गुलाब का लाखों में हजारों में  चेहरा जनाब का"  कितना आसान होता है ना, किसी को गुलाब कह देना निर्मल, कोमल, खुशबू से...
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Sunday, 9 June 2013

इसी का नाम है ज़िंदगी ...

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पल पल बदलते रहने का नाम है ज़िंदगी आज सुबह तो कल शाम है ज़िंदगी अपने ग़म में तो सभी जीते है दूसरों के ग़म को जीने का नाम है ज़िंदगी...
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Wednesday, 5 June 2013

रेत का दर्द...

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 समंदर का दर्द तो सभी महसूस करते है लेकिन क्या कभी किसी ने उसके किनारे पड़ी रेत के दर्द को भी महसूस किया है शायद नहीं, क्यूंकि...
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Saturday, 25 May 2013

ज़िंदगी की सारी खुशियाँ जैसे मौन हो कर रह गयी...

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ज़िंदगी की सारी खुशियाँ जैसे मौन हो कर रह गयी वो छोटे-छोटे खुशनुमा पल वो गरमियों की छुट्टियों में चंगे अष्टे खेलना वो रातों को सितारों क...
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Tuesday, 12 March 2013

बारिश और मैं ....

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आज क्या लिखूँ कि मन उलझा-उलझा सा है रास्ते पर चलते हुए जब छतरी के ऊपर गिरती पानी की बूँदें शोर मचाती है तो कभी उस शोर को सुन मन मयूर मचल उठ...
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Saturday, 9 March 2013

नारी मन....

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यूं तो कहने को महिला दिवस है लेकिन क्या फायदा ऐसे दिवस का जो महज़ कहने को आता है और आकर यूं ही चला जाता है ना नारी ही नारी का सम...
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Tuesday, 29 January 2013

न जाने माँ इतनी हिम्मत हर रोज़ कहाँ से लाती है....

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न जाने माँ इतनी हिम्मत रोज़ कहाँ से लाती है के हों कितने ही गम पर वो सदा मुसकुराती है हर रोज़ कड़ी धूप के बाद चूल्हे की आग में तपती  है ...
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Sunday, 20 January 2013

लो बीत गया फिर, एक और साल ....

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लो हर बार की तरह बीत गया एक और साल, फिर एक बार आया है नया साल  मगर  कुछ भी तो नहीं बदला मेरी ज़िंदगी में, नया जैसा तो कुछ हुआ ही नही...
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Saturday, 5 January 2013

रेत सा रिश्ता ...

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क्यूँ रिश्ता मुझसे अपना तुमने रेत सा बनाया  क्यूँ आते हो तुम लौट-लौटकर मेरी ज़िंदगी में गये मौसम की तरह  जानते हो ना, कभी-कभी खुश ग...
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Friday, 14 December 2012

एहसास

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कभी कभी यह ज़िंदगी इतनी तन्हा लगती है की जैसे इसे किसी की आरज़ू ही नहीं यूं लगता है कि जैसे किसी को मेरी जरूरत ही नहीं न दोस्तों के...
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Friday, 16 November 2012

कसक ....

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यूं तो हूँ मैं तुमसे जन्मी हूँ माँ  मगर तुमने मुझे कभी अपना समझा ही नहीं माँ  क्या सिर्फ इसलिए कि मैं एक लड़की थी  या मेरा रंग ज़रा ...
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Monday, 5 November 2012

सफर ज़िंदगी का ....

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एक लंबी सड़क सी ज़िंदगी  एक ऐसी सड़क  जिसे तलाश है अपनी मंज़िल की  वो सड़क जिसे अपने आप में ऐसा लगता है कि  कभी तो खत्म हो...
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Friday, 5 October 2012

बदलाव

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कभी कहीं पढ़ा था कि बारिश में इन्द्र धनुष के रंग ही तो बरसते है वरना यूं तो सारी धरती रंग हीन ही नज़र आती है सच ही तो है, ज़िंदगी का ...
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Wednesday, 26 September 2012

यादों की इमारत

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यूं तो आज तुमसे मिले बिछड़े कई साल होने को आए  मगर आज भी ऐसा लगता है  जैसे आज की ही बात हो  यूं होने को तो बात तुमसे आज भी होती है, ...
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Friday, 14 September 2012

चाहत

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यूं तो ज़िंदगी ने बहुत कुछ दिया है हमें  इसलिए तो आज सभी ने दिलोजान से चाहा है हमें   यह मेरी ज़िंदगी का दिया हुआ कोई तौहफा ही है जो आज    ...
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Pallavi saxena
मैं भोपाल की रहने वाली हूँ। मैंने अपनी सम्पूर्ण शिक्षा भोपाल में ही प्राप्त की। भोपाल के नूतन कालेज से बी.ए एवं अँग्रेज़ी साहित्य में एम.ए किया। एक साधारण सी गृहणी, 7 वर्ष लंदन में रहने के बाद 2014 में फिर अपने वतन भारत(पुणे) वापस आई हूँ। हिन्दी के सुप्रसिद्ध लेखक श्री मुंशी प्रेमचंद को बहुत पसंद करती हूँ। उनके लेखन की सरल भाषा को ध्यान में रखकर, उनसे प्रेरित होकर ही मैं अपने ब्लॉग की भाषा को भी सरल बनाकर लिखने का प्रयास करती हूँ, ताकि मेरे ब्लॉग को हर आयु, वर्ग का व्यक्ति आसानी से समझ सके। अपने इस ब्‍लॉग में मैं अपने जीवन के अनुभव प्रस्‍तुत कर रही हूँ।
Garbhanal
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