Friday, 27 January 2012

दुआ ना मांगते लोग ....

देखा है कभी खुद के नज़रिये से आसमान को 
देखने में एक सुंदर नारी के काले दुपट्टे में टंके  
सितारों सी रात जिसके चेहरे पर लगी है चंद्र बिंदी 
जिसने छुपा रखा है अपना चेहरा 
उस सितारे जड़े दुपट्टे से
ताकि कोई भूल से भी देखना ले उस रात का दर्द 
जो सागर की तरह गहरा है देखने में ऊपर से शांत 
मगर अंदर से हलचल मचाते होंगे उसके भी जज़्बात 
क्यूंकि इस इंसानी बेहरहम दुनिया में 
मतलब परस्तों कि कमी जो नहीं है, कहीं 
जहां एक इंसान दूसरे इंसान की मजबूरी और लाचारी 
का फायदा उठाने से नहीं चुकता 
वो लालची और खुदगर्ज़ इंसान भला क्या समझेगा 
उस सजी हुई रात के पीछे बिखरे सन्नाटे और दर्द कि पराकाष्ठा को  
क्यूँकि दर्द को समझने के लिए दिल में एहसासों और जज़्बातों
कि जरूरत होती है, जो अब ढूँढने से भी कहाँ मिलती है 
अगर ना होता ऐसा तो टूटते हुए सितारे से भी 
दुआ ना मांगते लोग......
पल्लवी 

Wednesday, 25 January 2012

अस्तित्व ज़िंदगी का ....


ज़िंदगी एक रूप अनेक 
बचपन के रंगों से सजी झरने सी ज़िंदगी 
जवानी के रंग लिए नदिया सी मदमाती ज़िंदगी
तो कभी सागर की तरह ठेहराव लिए शांत सी ज़िंदगी
जब कोशिश की समझने की यह फलसफा ज़िंदगी का तो पाया की  
अस्तित्व कभी ख़त्म नहीं होता ज़िंदगी का 
लेकिन जिस तरह पानी एक झील और सागर के रूप में 
ठहरा होते भी बहता दिखाई देता है
जिससे पता चलता है ज़िंदा है अभी अस्तित्व 
पानी के बहाव का, वैसे ही ज़िंदगी कभी मिटती नहीं    
चाहे हो पौधों का जीवन जो बीज या जड़ों के रूप रूप में 
भी ज़िंदा रहा करता है बरसों जैसे 
माता-पिता का अस्तित्व रहता है 
सदा अपने बच्चों के संस्कारों में 
और प्यार का अस्तित्व 
सदा रहा करता है स्म्रतियों में कहीं 
जैसे किसी इत्र की महक जो 
ज़ेहन में बस जाये एक बार
तो फिर कभी भुलाई नहीं जाती
जैसे रात का अस्तित्व जिंदा रहा करता है 
दिन की रोशनी में कहीं
रात के अंधेर को मिटाने के लिए  
नींदों को रोशना किया करते है ख़ाब
देखो ना बिना रोशनी कुछ भी तो नहीं  
कौन कहता है जाने वाले चले जाते है 
और सिर्फ यादें रह जाती है 
कोई कहीं नहीं जाता सब हमारे आस पास ही 
होते हैं जिन्हें देख भले ही न पाये हम 
मगर उन्हें हर पल ज़रूर महसूस किया जा सकता है उनके अंशों में कहीं .....      
पल्लवी 

Saturday, 21 January 2012

जीवन रूपी अग्नि ...


गीली मिट्टी के बर्तन सी ज़िंदगी
जैसे हो हमारा बचपन
जिसे कुम्हार अपने हाथों से 
सहेज कर बनाता है एक घड़ा और एक सुराही  
दोनों को ही डाल देता है आग मे
तपाकर पक्का करने के लिए 
बिना किसी भेद के क्यूंकि 
उसे अपने दोनों ही बर्तन प्यारे है
वह तो दोनों को ही 
आग में तपा कर पक्का करना चाहता है   
चाहे वो सुराही हो या घड़ा 
और ना ही आग ही भेद करती है दोनों को 
पक्का कर मजबूती प्रदान करने में 
तो फिर क्यूँ हम भेद करने 
लगते है जीवन रूपी आग में 
एक स्त्री को ज्यादा पक्का करने के लिए
क्या एक पुरुष को भी
उस ही जीवन अग्नि में तपकर 
उतना ही पक्का होना ज़रूरी नहीं 
जितना की एक स्त्री के लिए है
तो फिर क्यूँ भूल जाते हैं हम 
जब वही आग जरूरत से ज़्यादा हो जाये 
तो जला भी सकती है उन्हीं बर्तनो को
मगर एक स्त्री को जीवन रूपी आग में
एक बेटी के रूप में, तो कभी एक बहु के रूप में  
छोड़कर जैसे भूल ही जाते हैं हम
और छोड़ देते हैं उसे सदा के लिए 
उस आग में जलने को 
जिसमें वह चुप रहकर भी जलती है 
और यदि बोलना चाहे कुछ 
तो जला दी जाती
क्यूँ नारी जीवन बचपन से लेकर 
अतिम सांस तक एक अग्नि परीक्षा 
ही बना रहता है और जब तक 
एहसास हो हमें उस तपिश का 
तब तक शेष रह जाता है
केवल धुआँ और राख़
कभी भावनाओं के रूप मे,
तो कभी मिटे हुए अस्तित्व को याद करने के लिए ....      

Thursday, 19 January 2012

वक्त साथ दे तो कुछ बात बने ....

 बहुत देर तक चाँद को देखा है कभी
ऐसा लगता है जैसे एक सफ़ेद
चीनी की प्लेट हो और उस 
सफ़ेद चाँद की प्लेट 
पर ऊपर खड़े 
होकर ऊपर से   
जब देखा मैंनेधरती को 
तो मुझे ऐसा लगा वो चाँद 
जिस पर हम खड़े है
वह हमारा वर्तमान है 
और वो जो दूर कहीं नीला 
सा एक बिन्दु नज़र आरहा है 
वह है हमारा अपना अतीत 
बहुत ध्यान से नज़रें गाड़ा कर 
देखा तो ऐसा लगा 
जैसे मन खो गया है 
उस अतीत की गहराइयों में कहीं 
जब उस अतीत की ऊंची नीची पहाड़ियों 
नदियों और झरनो की तरह 
पानी बन बह रहे जज़्बातों को देखा 
तो उस पानी में 
प्यार के सच्चे मोती के 
कुछ कण से मिले
जो समय के बहाव के कारण 
शायद मेरे हाथों से 
फिसल कर वहीं गिर गए थे
मगर शायद हमारी भावनाओं के 
समंदर ने उन प्यार के कणों की रक्षा की
तभी वक्त का दरिया भी उन्हे 
अपने साथ बहाकर ना लेजा सका
शायद इसलिए
आज इतने बरसों बाद भी मुझे मिले 
मेरे सच्चे प्यार के कुछ बिखरे हुए से कण
जिन्हें देखकर एक बार फिर
मेरे दिल से आवाज आई की 
प्यार तब भी था, प्यार अब अभी है
क्यूंकि यह वक्त ही है 
जिसने हमें जुदा किया था 
और आज भी यह वक्त ही है 
जिसने यह एहसास जगाया 
प्यार कभी नहीं मिटता 
और आज भी यह वक्त ही है     
जो हमें फिर मिलाएगा  
तो अब 
अगर वक्त साथ दे तो कुछ बात बने....

Monday, 16 January 2012

किताब ज़िंदगी की ...


ज़िंदगी की किताब में 
एहसासों के पन्ने होते है  
जिन पन्नो पर कभी लिखी 
होती है मन की अभिव्यक्ति
तो कभी कुछ
कहे अनकहे से जज़्बात 
खुद से ही करी हुई हजारों बातें 
सागर से गहरे एहसास 
जिनसे समय के साथ बने 
न जाने कितने अनुभव लिखे होते हैं  
कभी कुछ अच्छे, तो कुछ बुरे भी 
और हर एक पन्ने पर लगा होता है एक बूक मार्क 
कभी एक मुस्कान का, तो कभी आँसुओं का  
जिनसे निर्माण हुआ कुछ भूली बिसरी यादों का 
इरादों का, कुछ सपनों का,कुछ अपनों का  
हर एक पन्ने पर बुना हुआ एक सपना 
जो था कभी अपना 
मगर अब देखो तो लगता है 
जैसे किसी मकड़ी का टूटा हुआ सा जाल 
जिसके टूट जाने पर भी उसमें जकड़ी हुई है एक मकड़ी 
क्यूंकि सपनों का मोह कभी छूटता ही नहीं 
और इसे पहले कोई छुड़ा सके अपना मोह 
अपने ही किसी सपने से 
पलट जाता है ज़िंदगी की किताब का एक और पन्ना 
फिर कोई नई उम्मीद और नाय सपना लिए 
कोशिश करने लगते है हम
हर एक नए पन्ने पर नए सिरे से 
ज़िंदगी की किताब का एक और नया पन्ना
लिखने के लिए 
मगर कितनी अजीब किताब है यह ज़िंदगी 
जिसे केवल खुद ही पढ़ा जा सकता है 
यदि दो भी किसी को पढ़ने के लिए यह किताब   
तो जाने क्यूँ उस पढ़ने वाले को हर एक पन्ना 
जैसे कोरा कागज़ ही नज़र आता है 
और हम यह आस लिए तांकते
रह जाते की शायद
यही हो वो जो समझ सके हमें
हमारी इस किताब के जरिये ही सही
मगर इसी नाकाम कोशिश में
एक दिन भर जाती है यह पूरी किताब
ज़िंदगी की ......
पल्लवी   

Friday, 13 January 2012

क्या तुम्हें याद है ...


दिल जब भी उदास होता है  
क्यूँ अक्सर यही होता है 
पीछे वजह होती है तेरे भूल जाने की
 क्यूँ तुझे कुछ नहीं याद होता है
क्यूँ हर चीज़ याद रह जाती है मुझे
जिस-जिस में तू शामिल होता है, 
चाहे हो वो पहले प्यार की पहली मुलाक़ात ,
या हो इज़हारे मोहोब्बत का दिन ,
जब कुछ इज़हार हुआ था 
शायद हमको प्यार हुआ था 
और जब विवाह के पवित्र बंधन में बंध 
दो से एक हुए थे हम,
यहाँ तक कि जब वही विवाह का बंधन,
बंधन बना गया था हमारे लिए ,
तब से लेकर आज तक 
हर छोटी बड़ी बात, वो प्यारे से एहसास,
कुछ अनछुए जज़्बात  
आज कहा खो गए वो पल 
जब दिल में मची है हलचल,
जब उठ रहीं हैं मन के समंदर में 
कुछ भूली बिसरी यादों की लहरें 
जो दे रही हैं दस्तक 
मेरी ज़िंदगी में ठहरे हुए तूफान को 
,  और कह रहीं है तुम से कि बस 
एक बार खोल दो तुम अपने मन के द्वार को 
 और साथ ले जाने दो मुझे 
तुम्हारे अंदर की सारी कड़वाहट,
मगर तुम हो जो खोलना ही नहीं चाहते
 अब अपने मन के वह द्वार 
शायद इसलिए     
 मैं जज़्ब कर लेती हूँ
उन लहरों का खरा पानी अपनी आँखों में 
यह आस लिए कि शायद 
 मेरी उन नाम आँखों को देखर फिर याद आ जाये तुम्हें 
वो नाम, वो चहरा, वो बातें, वो मुलाकातें   
जिसे देखकर टूट जाये शायद 
तुम्हारे मन के कमरे की वो दीवार
और बेह जाये वो भावनाओं का 
समंदर फिर एक बार
सिर्फ मेरे लिए ..... 

Thursday, 12 January 2012

ज़िंदगी के कुछ (सुहाने पल)...



यूँ तो ज़िंदगी में हर मोड़ पर 
सुख दुःख आते जाते ही रहते है 
जैसे सर्दियों का सर्द मौसम अक्सर 
लोगों को उदास बना जाता है
क्योंकि घर के बाहर कोई ना नज़र आता है 
मगर यूँ उदास और निराश होकर जीये 
तो क्या जीये, मज़ा तो तब आता है
जब वही कोहरे में छुपा सूरज 
निखर के बाहर आता है 
कभी जब खुद को गर्म कपड़ों में लपेटे 
ठंड में कपन्ती सुकुड़ती  
निकलती हूँ घर के बाहर 
इस उम्मीन्द के साथ   
सर्दी में सर्द पड़ी अपनी ज़िंदगी 
को तुम्हारे प्यार से गरमा सकूँ 
तो सर्द सुबहा में भी धुंध की ओट में 
से चुपके-चुपके मुझे देखकर 
मुसकुराता हुआ सूरज ऐसा नज़र आता है
जैसे तुम्हारा मुसकुराता हुआ चहरा 
कर रहा हो मेरा स्वागत 
एक नई ताज़गी से भरी सुबह के लिए
जो भर देता है मुझ में 
 एक नया जोश और आत्मविश्वास  
हर दिन ज़िंदगी से लड़ने के लिए 
जिसे देख, भर जाती हूँ मैं नई स्फुर्ति से 
सारा दिन तुम बिन बिताने के लिए 
और फिर जब रोज़ की 
भागदौड़ के बाद थक कर मन करता है 
कुछ पल सुकून से बिताने के लिए तो 
इंतज़ार होता है तुम्हारा ढलती 
महकती शाम के साथ 
तुम्हारा भी साथ पाने के लिए तब     
  तुम्हारा वही सूरजमुखी सा चहरा 
बन जाता है मेरे लिए रातरानी सा 
मुझे महकाने के लिए 
और सर्दी की सर्द रातों में 
मुझे मीठे महँकते सपनों से सजी
 चैन और सुकून की नींद सुलाने के लिए..
.पल्लवी

Monday, 9 January 2012

भावनायें....

लिखने जाती हूँ जब 
कोरे कागज़ पर अपने 
जज़्बात तो ऐसा लगता है 
जैसी सियाही के रूप में 
मन की अभिव्यक्ति पिघल-पिघल 
कर बह रही हो भावनाओं में 
सागर की तरह, 
जिसका हर एक शब्द  
जो दिखने में ऊपर से 
बहुत शांत दिखाई देता है 
मगर अंतस में उठ रहा है सेलाब
भावनाओं का 
कुछ कही-अनकही सी भावनायें 
कुछ जानी पहचानी सी भावनायें 
कुछ बनती बिखरती भावनायें 
जैसे साहिल पर पड़ी रेत 
से बने हुए सपनों के महल  
तब तक टीके रहते हैं 
जब तक रेत 
नम होती है वक्त रूपी सूरज 
की तपिश पाते ही 
खो जाती है सारी नमी 
और टूट कर बिखर जाता है 
उन रेत के महलों 
का अस्तित्व 
मन की भावनाओं की तरह....  

Friday, 6 January 2012

आखिर क्या है यह ज़िंदगी....


समंदर में उठती लहरें 
जैसी पानी सी बहती हुई ज़िंदगी 
ऊँची-नीची लहरों सी 
पल-पल बदलती ज़िंदगी 
समंदर के पानी की तरह 
कभी गहरी, तो कभी, उथली सी ज़िंदगी 
नदिया और सागर के मिलन
सी कभी मीठी तो कभी 
खारे पानी सी खारी ज़िंदगी,
आखिर क्या है यह ज़िंदगी
जैसे पहेली हो कोई  
जिसका शायद कोई जवाब नहीं 
अपनी होते हुए भी
  जानी-अनजानी सी ज़िंदगी
जैसे कुछ कही-अनकही सी बातें
जो आँखों-आँखों में होकर भी 
रह जाती हैं अधूरी   
कुछ ऐसे सवाल जिनका 
शायद कभी कोई जवाब ही नहीं होता, 
अगर कुछ होता है,
तो वह है केवल मौन, एक ऐसी खामोशी 
एक ऐसा सन्नाटा जो सुनाई देता है  
लहरों के शोर गुल मैं भी 
जिसमें अक्सर तलाश होती है 
 खुद के अस्तित्व की, खुद के वजूद की
जैसे मंदिर की घण्टियों के शोर 
में भी आभास होता है शांति का 
आखिर क्यूँ और कहाँ से आभास होता है 
इतने शोर गुल में भी पसरे सन्नाटे का           
जैसे दूर .......तक नज़र डालने पर भी कभी 
सागर का दूसरा किनारा नज़र नहीं आता 
 ठीक वैस ही, उस ज़िंदगी पर नज़र डालकर 
  भी देखा है कभी,
उस ज़िंदगी का भी  
कभी कोई ओर-छोर नज़र नहीं आता 
बस बहते पानी सी गुज़रती चली जाती है 
यह ज़िंदगी और हम, साहिल की रेत की तरह 
जज़्ब करते चले जाते हैं ज़िंदगी में उठती हुई लहरों के थपेड़ों को 
और नाम देदेते हैं उसे 
मेरे अनुभव ..... :)

Wednesday, 4 January 2012

यादों में भीगा मन

सागर किनारे एकांत में 
अकेले बैठकर कभी सोचा है 
मन रूपी समंदर के तट पर आती 
हुई यादों की हर लहर 
छूकर गुज़र जाती है 
मन को,
जैसे साहिल को छूकर गुज़र जाती हैं लहरें 
और लौटते हुए 
दे जाती है, एक नम एहसास, 
जिसकी नमी अंतस में उतर कर 
न सिर्फ मन को, बल्कि आँखों 
को भी कर जाती है गीला 
फेर्क सिर्फ इतना होता है कि,
यादों की लहर का पानी
कभी पानी मीठा होता है, तो कभी खारा  
दूर.... कहीं किसी सागर किनारे  
उठती हुई ऊँची लहरों का पानी 
जब हल्की बारिश सी बूंदों की तरह 
भिगो जाता है तन  
तब न सिर्फ तन, बल्कि मन भी  
तृप्त हो जाता है,
जैसे प्यासे रगिस्तान को मिला हो पानी 
जैसे वात्सल्य के लिए तरसते शिशु को मिली हो ममता 
जैसे भक्त को मिले हो भगवान 
जैसे दो प्यार करने वाले प्रीमियों को बरसों जुदाई के बाद मिला हो मिलन 
इसे ज्यादा भी और कुछ हो सकती है क्या तृप्ति कि परिभाषा ....... 

Friday, 30 December 2011

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें....

वक्त का पहिया न रुका है कभी 
न रुकेगा कभी किसी के लिए 
हर साल एक नया साल आता है 
तो एक पुराना साल जाता है 
यह आना जाना 
बस यूं हीं चलता-चला जाता है
ज़िंदगी का भी तो कुछ यही 
सिलसिला है 
जो न रुकती है कभी, किसी के लिए 
हर साल एक नई ज़िंदगी जन्म लेती है 
तो एक पूरानी ज़िंदगी देह त्याग देती है 
और जीवन का यह सिलसिला भी
यूं चलता रहता है
एक कभी ख़त्म न होने वाला सिलसिला 
जैसे सागर कि बाहों में मौजों का सिलसिला 
ठीक इसी तरह 
आप सभी के जीवन में भी यह 
 सागर कि लहरों रूपी खुशियों का 
सिलसिला कभी न रुके, कभी न थमे 
बस इस ही मंगल कामना के साथ 
आप सभी को नव वर्ष कि हार्दिक शुभकामनायें  
  

Wednesday, 28 December 2011

पहले प्यार का एहसास


पहले प्यार का वो पहला 
सागर नुमा 
गहरा एहसास 
सागर की बाहों में मचलती लहरें 
प्रेमियों के मन में मचलती 
हुई भावनायें हो जैसे, 
साहिल को छूने के लिए 
जैसे मचलती है लहरेंऔर 
साहिल की रेत उन लहरों को अपने 
अंदर जज़्ब कर लेती है 
जैसे आत्मा में प्रेम समा जाता है 
तब उस गहराई में जाकर होता है
एक ऐसे सच्चे प्रेम का निर्माण 
जैसे सिपीं में 
छुपा सच्चा मोती हो कोई  
प्रमियों का मन भी, 
तो मचलता है वैसे ही ,
बस एक बार अपने पहले प्यार 
के पहले स्पर्श के लिए 
पहले प्यार का वो 
पहला स्पर्श 
जो न केवल तन, बल्कि मन पर 
भी छोड़ जाता है अपने अस्तित्व 
की वो अमिट छाप 
जिसे चाहकर भी कोई
कभी भुला नहीं पाता ....

Thursday, 22 December 2011



क्या तुमने कभी देखा है
किसी सागर को रंग बदले हुए 
क्या सच में ऐसा ही होता है, 
या ब्रह्म है ये मेरे अंतस का..... 
सुबह सवेरे जब सूरज आता है अपनी लालिमा 
लिए तब बिखर जाती  है
एक सुनहरी सी चादर समंदर के लहरों पर 
और जैसे-जैसे दिन चढ़ता जाता है......
तब जैसे सूरज की तपिश से पिघलता जाता है आसमान 
और कर देता हैं इस सुनहरी चादर को नीला
उसी सूरज के ढलने तक... 
एक ही दिन में, न जाने कितने स्वरूप बदल जाते हैं 
इस एक ही मंजर के ..
.मगर हर घड़ी बदलते स्वरूप की इस पीढ़ा को
 कोई नहीं सुन पाता 
सोचा है कभी क्यूँ ?
क्यूंकि शायद रोज़ के कोलहाल से भरी ज़िंदगी
कभी मौका ही नहीं देती 
कि कभी सागर किनारे बैठकर सोच भी सको,
 कि क्यूँ खारा है 
आखिर इतना 
समंदर का पानी 
क्यूँ मन की तरंगो की तरह मचलती लहरें
.रात के सनाटे में अकसर बदल जाती है 
जैसे सागर की चीख़ों में मगर खुद में ही मग्न लोग कभी
महसूस ही नहीं कर पाते इस समंदर में उठती
आवेग और पीढ़ा से भरी लहरों कि आह का अंतर्नाद   क्यूँ ???
क्यूंकि शायद कुछ बातें खामोशी के साथ ही अच्छी लगती है ... :)  

Wednesday, 21 December 2011

मन की लहरें

साहिल को छुने की चाह में
मचलती सागर की लहरें
जैसे मन की तरंगों ने
ओढ़ लिया हो
लहर नुमा कोई आवरण
न जाने ऐसी कितनी तरंगें
 है हमारे मन की
जो मचलती है
सब कुछ पाने के लिए
क्यूंकि जो आज है, क्या पता
कल हो न हो
फिर क्या पता एक टुकड़ा साहिल
भी शायद इन लहरों में कटकर
न घुले,न मिले
क्यूंकि कट के घुल मिलजाना
पानी का स्वभाव होता है
किनारों का नहीं ....   

Monday, 19 December 2011

ठंडक की तलाश ....


ज़िंदगी की तप्ति 
धूप में तप-तप कर 
जब थोड़ा सी ठंडक पाने 
की चाह में,  
कभी निकलती हूँ घर से 
तो सबसे पहले याद आता है
समंदर का वो किनारा 
जिसकी नम और ठंडी रेत
पर चलकर किए थे हमने  
कुछ वादे, वो इरादे
जिनमें गहराई थी कभी 
समंदर की तरह
जिसमें प्यार और विश्वास भी था 
समंदर की तरह जहां दूर... तक नज़र
डालने पर भी दिखाई देता था
सागर नुमा  
सिर्फ तुम्हारा गहरा प्यार
जिसमें उठती हुई
 तुम्हारे 
प्यार की ठंडी-ठंडी लहरें 
भिगो जाती थी मेरे 
अंतस को तुम्हारे प्यार से  
जिसका सागर ही, कि तरह 
कोई किनारा न था,
मगर अब सोचती हूँ, 
तो लगता है 
जैसे ज़िंदगी में उड़ती गरम हवाओं ने 
सुखा कर उस ठंडी रेत को 
बदल दिया है शायद,
रेगिस्तान की तप्ति 
रेत में 
जिसने सुखा दिया है 
अब शायद प्यार का वो 
गहरा सागर भी 
जैसे बंजर ज़मीन हो कोई 
जिसमें अब कोई जीवन सांस नहीं लेता ....  

    

Saturday, 17 December 2011

अतीत....

कहते है, अतीत सभी का होता है 
 किसी का अच्छा 
तो किसी का बुरा 
अतीत के आईने से झाँकती यादें 
जैसे हिलते हुए पानी में  
धीरे-धीरे उतरता हुआ सा 
कोई प्रतिबिंब
जो, आहिस्ता-आहिस्ता 
साफ होता चला जाता है 
जैसे दर्पण हो कोई 
अतीत यदि मधुर हो  
तो अनायास ही उभर आती है 
उस प्रतिबिंब पर 
एक मोहक सी मुस्कान
जैसे पूर्णिमा के दिन 
जब चाँद अपने पूरे रुबाब पर 
हो कर बिखेरता है
सागर की लहरों पर अपनी मदमती छटा 
तो ऐसा लगता है
 जैसे लहरों ने औढ
लिया हो कोई सुनहरी आवरण 
मगर जब वही अतीत हो
 भयावह  
तो वही पूरनमासी बन जाती है, 
अमावस की रात
तब वही खूबसूरत लहरें 
धर लेती हैं काली नागन का रूप 
और डस लेती हैं, न सिर्फ 
वर्तमान को
बल्कि भविष्य को भी,
यह सब देख
 जब उतर 
आता है आँखों की नदीया में
 भरा खरा पानी 
तब उस खारे पानी से मिल
 बन जाता है 
 दर्द और पीड़ा का एक और समंदर
जिसमें बना प्रतिबिंब
 डराता ही नहीं,
बल्कि चिढ़ाता भी है इंसानी वजूद को  .... 

Wednesday, 14 December 2011

इंतज़ार

इंतज़ार
भला क्या होता है इंतज़ार 
वो जो कभी ख़त्म ही न हो 
वही होता है न इंतज़ार ........

जो कभी किसी का ख़त्म 
न हुआ है, न होगा कभी 
वही होता है, ना इंतज़ार  
कभी मीठा, तो कभी 
खट्टा लगता है,
इंतज़ार,
जैसे नदी को सागर 
से मिलने का इंतज़ार, 
सूखी धरती को, बारिश का इंतज़ार,
जैसे भूखे को रोटी का,
प्यासे को पानी का,
गरीब को लक्ष्मी का,  
और न जाने कितने ऐसे इंतज़ार है
जिनका कभी अंत होकर भी अंत नहीं होता
एक ख़त्म तो अगले ही पल 
दूसरा शुरू हो जाता है इंतज़ार,
ज़िंदगी का दूसरा
नाम ही हो,जैसे इंतज़ार, 
इंतज़ार के क्षणों में 
वक्त रुक सा जाता है 
जैसे ऊपर से शांत दिखने वाला 
सागर अपने अंतस में हो 
रही छटपटाहटों को छुपाये हुए शांत 
नज़र आता है
ठीक वैसे ही शायद हमारे
अंतस मन में उठ रही उथल पुथल
को भी हम अपने चहरे पर लगाकर
एक अनचाही सी मुस्कान
अपने अंदर छुपाये
रहते है, अपनी ज़िंदगी में 
आने वाले हर-एक छोटे बड़े पलों का
इंतज़ार ... 

Tuesday, 13 December 2011

ज़िंदगी के स्पर्श (एक नज़रिया )


ऊन के गोले सी 
गोल-गोल ज़िंदगी 
कभी नर्म तो कभी गर्म
सी ज़िंदगी
उलझे हुए ऊन के ताने बाने से 
बुनी हुई ज़िंदगी 
समंदर में उठने वाली 
हर लहर के उतार चढ़ाव 
सी बहती ज़िंदगी 
जिसकी हर एक लहर
का रिश्ता है सागर से  
जैसे ऊन के धागों
से आपस में मिलकर
बना होता है 
कोई निर्माण
जिसमें छुपी होती है
 माँ के हाथों की नरमी और अंचल की गर्मी  
जिसका आधार होता है  
एक नर्म स्पर्श 
जैसे बारिश का धरती से 
धरती का नदिया से 
नदिया का सागर से 
सागर का लहरों से
और लहरों का साहिल से
वैसे ही कभी-कभी 
ज़िंदगी के बदलते मौसम 
में ज़रूरी हो जाता है
शीतल पड़ी हुई 
ज़िंदगी को 
प्यार भरे रिश्तों की गर्माहट देना ..... 


Sunday, 11 December 2011

यादों की नमी ....


मन रूपी समंदर ,में उठती हुई कुछ 
अनकही सी अनजानी सी लहरें 
जो कभी छू जाती है 
मेरे अस्तित्व को 
तो अन्यास ही यादआ जाती है 
कुछ भूली बिसरी यादें 
 जिसमें छलक जाती है वो बचपन की यादें,
वो गुड़ियों की शादी,वो सावन के झूले, 
वो कॉलेज़ की मस्ती,वो प्यार रूमानी   
वो बारिश का पानी,
 जो आज भी भिगो जाता है 
मेरे मन को जैसे 
समंदर की लहरें भिगो जाती है
 साहिल को 
और साहिल की रेत 
उन्हीं लहरों को अपने अंदर
 जज़्ब कर लेती है ऐसे 
   जैसे कभी कोई मन, 
अपने अंदर जज़्ब
कर लेता है, 
किसी की यादों को 
और ज़िंदगी की तप्ती धूप में 
वही नमी काम आती है 
जलते हुए मन को शीतल करने के लिए .... 

Saturday, 10 December 2011

अटूट विश्वास



प्यार में एक बार विश्वास 
क्या टूट जाये तो  
ज़िंदगी ही बेगानी,
 बेमानी सी नज़र आने लगती है,
मगर उस प्यार और विश्वास का 
क्या जिसके बारे 
में मैं जानता हूँ कि  
मैं भले ही उनके साथ 
विश्वासघाती क्यूँ न 
बन जाऊँ मगर वो मेरा 
 साथ निभाये गे खुदा की तरह
कहकर बेटा, यदि ज़िंदगी
के समंदर 
में कुछ उठती 
हुई तूफ़ानी लहरों को 
 पार करना है, तो थाम लो हाथ मेरा, 
और मैं बडा ही स्वार्थी बन कहता हूँ  
 हाथ आप मेरा नहीं,
 मैं आपका थामना चाहता हूँ ,
 क्यूँकि शायद मुझको खुद पर ही विश्वास नहीं,
 कब छोड़ दूँ मैं आपका साथ और हाथ,
 मगर आप पर है, 
मुझको सम्पूर्ण विश्वास,
 कि मैं भले ही छोड दूँ  
आपका हाथ,
 मगर आप कभी नहीं छोड़ोगे मेरा हाथ,
क्यूँकि आपका और मेरा रिश्ता,
 तो समंदर की लहरों और साहिल का सा है , 
जो कुछ भी नहीं 
ले जाती आपने साथ
बल्कि महफूज़ करके सभी 
को छोड़ जाती है,
 साहिल पर बिना किसी
  शर्त के यही तो रिश्ता है, न मेरा 
आपसे 
है न मम्मा है न पापा ....!!!