Friday, 14 April 2017

बेवकूफ औरतें


सही में औरतें बहुत ही बेवकूफ होती है
हजारों ताने उल्हाने, मार पीट सहकर भी उम्मीद का दामन जो नहीं छोड़ पाती यह औरतें
न जाने कितनी बार टूट -टूटकर बिखर जाने के बाद भी खुद को समेट जो लेती हैं यह औरतें
न जाने कहाँ से एक नए अंकुर की तरह हर रोज़ पुनः जन्म लेती हैं यह औरतें
एक नयी आशा के साथ सुबह तो होती है,इनकी किन्तु हर रात फिर टूटती हैं यह औरतें
कभी मानसिक रूप से तो कभी शारीरिक रूप से भी
फिर भी उफ़्फ़ तक नहीं करती यह बेवकूफ औरतें
न जाने क्यूँ जो इन्हें सताता है, इन्हें रुलाता है, वही शक्स इनकी कमजोरी क्यूँ बन जाता है
क्यूँ उसे छोड़कर जी नहीं सकती यह बेवकूफ औरतें
क्यूँ अपना सब कुछ मिटाकर भुलाकर भी उसी के लिए दुआ मांगती है यह औरतें
न जाने क्यूँ दिमाग के बदले दिल से सोचती और जीती हैं यह औरतें
जिसे भी शिद्दत से चाहती हैं अक्सर उसी को खो बैठती हैं
पहले मायका छूट जाता है और फिर औलाद, क्यूंकि पति तो इनका कभी होता ही नहीं
समय के साथ सब कुछ बदल जाता है, नहीं बदलती तो यह बेवकूफ औरतें
गलती से मर भी जाएँ न कोई ऐसी औरत कहीं कभी किसी रोज़
तो ज़रा सी प्यार की नमी पाकर किसी खरपतवार या अमर बेल की तरह फिर उग आती हैं यह बेवकूफ औरतें
और फिर दौहराती है अपना वही प्यार और मोहब्बत करने का वही अंदाज़ ओ इतिहास
पता होते हुये भी कि अंजाम ए मोहब्बत क्या होगा
बड़ी शिद्दत से मोहब्बत निभाती हैं यह बेवकूफ औरतें
  

Monday, 10 April 2017

ज़िंदगी ~


गुज़र रही है ज़िंदगी कुछ इस तरह कि जैसे इसे किसी की कोई चाहत ही नहीं
कभी दिल है तो कभी दिमाग है ज़िंदगी 
कभी एक नदिया तो कभी एक किताब है ज़िंदगी
न मंजिल का पता है ना राह की कोई खबर 
न डूबने का डर है न उबरने की कोई फिकर  
शब्द भी खामोश है और कलम भी बेज़ुबान है 
बस समय की धारा में बहते चले जाने का मन है 
जो हो रहा है, जो चल रहा है बस चलने दो, बस नदी कि तरह बहने दो यह ज़िंदगी  
लिखने दो कोई नई दास्तां या मिटा देने दो कुछ पुराना इस ज़िंदगी को 
यादों में जीते तो गुज़र ही जाती है ज़िंदगी
कभी बिना किसी याद के भी अपने साथ बहा ले जाने दो ज़िंदगी
न सोचो, न समझो न देखो, न सुनो 
बस कहीं गुम हो जाने दो यह ज़िंदगी 
होश में रहकर तो सभी जिया करते है 
कभी मदहोशी में भी गुज़र जाने दो यह ज़िंदगी 
जहां न कल का पता हो, न आज की खबर...बस ...यदि कुछ साथ हो तो वो हो ज़िंदगी।     

Saturday, 23 July 2016

बहती हवा सी ज़िंदगी ~


कभी रुकती संभलती, कभी ज़रा सी ठहरती 
तो कभी डूबती उबरती 
कुछ यूं ही हवा सी बह रही है ज़िंदगी 
न समय का पता है, न मंज़िल की कोई खबर 
गुज़र गया जो कल जहन में आता नहीं 
आज में जीने को जी चाहता है 
फिर न जाने क्यूँ  ? कैसे अचानक ही 
आने वाले कल की चिंता सिर उठती है
फिर ज़रा देर को ज़िंदगी रुक सी जाती है 
फिर दिल दिमाग को समझाता है कि आज ही कल को बनाता है 
तो क्यूँ ना आज में ही जी लेने हम तुम यह पूरी ज़िंदगी 
क्या पता! कल यह पल हो न हो... 
जो आज साथ है,जो आज पास है, कल हो न हो 
फिर दिमाग दिल की बात दौहरात है 
फिर एक बार ज़िंदगी को समझाता है 
और बस फिर बन जाती है "बहती हवा सी ज़िंदगी" 
थमी रुकी ,थकी चली, तो कभी जली बुझी, मिटी बनी 
बस यूँ ही सदियों से बहा करती है 
बहती हवा सी ज़िंदगी....
(पल्लवी सक्सेना )  

Monday, 30 November 2015

स्त्री ...


इस अभिव्यक्ति की जान अंतिम पंक्तियाँ मेरी नहीं है मैंने उन्हें कहीं पढ़ा था। कहाँ अब यह भी मुझे याद नहीं है। कृपया इस बात को अन्यथा न लें।   

'कोमल है कमजोर नहीं तू शक्ति का नाम ही नारी'
स्त्री एक कोमल भाव के साथ एक कोमलता का एहसास दिलाता शब्द 
जिसके पीछे छिपी होती है 
एक माँ ,एक बहन ,एक बेटी और एक पत्नी 
जो जन्म ही लेती एक सम्पूर्ण सृष्टि के रूप में 
फिर भी एक पुरुष को अवसर देती है अपने साथ खड़े होने का 
अपनी समग्रता और सम्पूर्णता में उसे श्रय देने का
इसलिए पत्नी के बाद माँ बन खुद को सम्पूर्ण समझती है वो 
किन्तु, फिर भी संपूर्णता की तलाश कभी पूरी नहीं होती
क्यूंकि वक्त दर वक्त 
यही पुरुष अपने अहंकार के चलते 
उसे लोगों का कुरेदा हुआ ज़ख्म बना देता है 
किन्तु फिर भी सारी वेदना को सहते हुए आगे बढ़ती है वो 
खुद ज़ख्म होते हुए भी औरों के लिए मरहम का काम करती है वो 
और उदहारण बनती है अगली स्त्री के लिए  
किन्तु तब भी नहीं जान पाता वो  नादान पुरुष 
एक स्त्री के मन की यह ज़रा सी बात 
के
जो समर में घाव खाता है उसी का मान होता है
छिपा उस वेदना में अमर बलिदान होता है
सृजन में चोट खाता है
छैनी और हथोड़ी का
वही पाषाण मंदिर में भगवान होता है ।    






Monday, 2 November 2015

खामोशी के चंद आँसू



कैसे अजीब होते है वो पल, जब एक इंसान खुद को इतना मजबूर पाता है 
कि खुल के रो भी नहीं पाता।  
तब, जब अंधेरी रात में बिस्तर पर पड़े-पड़े निरर्थक प्रयास करता है 
उस क्रोध के आवेग को अपने अंदर समा लेने का 
तब और अधिक तीव्रता से ज़ोर मारते है 
वह आँसू जिनका अक्सर गले में ही दम घोट दिया जाता है। 
कैसा होता है वो पल जब हम अपने ही आंसुओं को 
अपने ही गले में घोटकर मार देने के लिए विवश हो जाते है।
कितनी बेबसी, कितनी विवशता होती है उन पलों में   
कि लगता है जैसे सांस घुट जायेगी अभी  
कितना कठिन और सशक्त होता है वह विलाप 
जिसे हम किसी को दिखाना नहीं चाहते।
किन्तु जब चाहकर भी हम, 
उसके इस सशक्ति पन को अपने भीतर रोक नहीं पाते 
तब वह दबे छिपे आँसू अपने पूरे वेग के साथ, 
हम पर वार करते है।
और हम अपने उस क्रोध (अहम)पर विजय पाने हेतु
अपने पूरे बल से उस क्रोध अग्नि के 
अपने उन आंसुओं को अपने गले ही में घोट देते है 
तब आँखें तो भर आती है उस मृत क्रोध के गर्म लहू से 
जो अक्सर आँख का आँसू बन तकिया भिगो जाता है 
लेकिन उस समय जिस पीड़ा से गुज़र रहे होते है हम 
वह तो नि: शब्द :है। 
दमघोट कर मारे जाने वाले इंसान की भी कुछ ऐसी ही दशा होती होगी 
जब प्राण निकलते वक्त ढूंढते होंगे कोई मार्ग 
कि चंद साँसे और मिल जाये या 
खुली हवा मिले, तो शायद ज़िंदगी बच जाये 
मगर उस वक्त,वक्त को कहाँ दया आती है 
वह तो हमारी ही तरह क्रूर बनकर  
घोट देता है सामने वाले का दम 
और शेष रह जाते है खामोशी के चंद आँसू...         

Wednesday, 27 August 2014

माँ के मन की व्यथा...


वर्तमान हालातों को मद्दे नज़र रखते हुए जब मैंने मेरी ही एक सहेली से फोन पर बात की और तब जब उसने यह कहा कि यार चिंता और फिक्र क्या होती है यह आज समझ आरहा है मुझे...जब हम बच्चे थे तब तो हमेशा यही लगता था कि माँ नाहक ही इतना चिंता करती है मेरी, सिर्फ इसलिए क्यूंकि मैं एक लड़की हूँ। मगर आज जब खुद मेरे एक बेटी है। तो समझ आता है कि क्यूँ किया करती थी माँ मेरी इतनी चिंता। बस उसी आपसी बातचीत से मन में उभरे कुछ विचार...


एक बेटी से बहन, बहन से वधू और वधू से माँ बनने तक के सफर में
कितना कुछ अनुभव कराया है इस वक्त ने मुझे 
हर कदम पर, एक नया रिश्ता 
रोज़ कोई नयी चुनौती या त्याग लिया आता है। 
जीवन के इन अनुभवों से झुझते हुए कई बार बहुत कुछ सोचा है मैंने, 
बहुत कुछ सीखा है मैंने, 
मैं कौन ?
 मैं एक स्त्री 
बहुत ही साधारण सी, एक आम सी स्त्री 
एक आम इंसान, 
एक ऐसी इंसान जिसे कभी किसी युग में इंसान समझा ही नहीं गया 
जिसने समझा केवल एक वस्तु ही समझा 
जब जिसकी जैसी इच्छा हुई 
तब उसने इस वस्तु का वैसा ही इस्तमाल किया।
 कभी सीता बनाकर दर दर की ठोकरें खाने भेज दिया, 
तो कभी द्रोपदी बनाकर दाव पर लगा दिया, 
भरी सभा में अपमानित होने के लिए 
तब से आज तक 
सबने मुझे एक भोग की वस्तु के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं समझा 
कभी किसी ने मेरा मन पढ़ने की चेष्टा नहीं की
 सभी ने देखा तो केवल तन देखा 
कभी गरीब के घर जन्मी 
तो परिवार चलाने के लिए मैंने खुद अपना तन बेंचा  
मगर अपनी आत्मा नहीं बेची कभी 
 अमीर के घर जन्मी तो,
 दहेज की आग में जलायी गयी 
और 
एक सामान्य परिवार में जन्म लेने पर भी 
कभी मुझे अपनों ने छला 
तो कभी बाहर घूम रहे, इंसान की खाल में छिपे भेड़ियों ने 
कुछ इस तरह देखा उन्होंने मुझे 
कि देखने मात्र से ही लज्जित हो गई मैं, 
यूं जैसे किसी भूखे के सामने पड़ा हुआ भोजन 
 हर रोज़ खड़े होते है 
हर गली, हर नुक्कड़ पर कुछ इंसान से दिखने वाले यह भेड़िये 
मौके की तलाश में, नौचने को मेरा तन 
तब मन ही मन करती हूँ मैं रोज़ ही एक निश्चय
हर रोज़ लेती हूँ एक प्रण  
कि अपनी संतान को न दूँगी मैं यह भय 
निडर बनाऊँगी मैं उसे, 
इतना निडर कि नौच सके वो आंखे 
उन वासना में लिप्त भूखे भेड़ियों की 
जिन्हें सदा औरत में केवल शरीर ही दिखाई देता है 
इंसान नहीं
मगर जब माँ का ह्रदय देखता है 
 हर स्त्री के प्रति होता घिनौना व्यवहार 
तो हार देता है वह अपना होंसला 
और सोचता है 
मैं एक स्त्री, मुझे तो वादा करने 
या स्वयं अपने लिए कोई निश्चय करने का भी अधिकार नहीं है यहाँ 
फिर भला मैं कैसे दे पाऊँगी 
तुझे मेरे मन की कली
एक सभ्य और सुरक्षित समाज का आँगन 
तुझे एक महकता हुआ फूल बनने के लिए ...          

   

Saturday, 22 February 2014

प्रेम

प्रेम क्या है ! इस बात का शायद किसी के पास कोई जवाब नहीं है। क्योंकि प्रेम की कोई निश्चित परिभाषा भी तो नहीं है। प्रकृति के कण–कण में प्रेम है। साँझ का सूरज से प्रेम, धरती का अंबर से प्रेम, पेड़ का अपनी जड़ों से प्रेम, जहां देखो बस प्रेम ही प्रेम। प्रेम एक शाश्वत सत्य है।
प्रभु की भक्ति भी भक्त का प्रेम है। देश भक्ति भी प्रेम है। मानवीय रिश्तों में प्रेम है। हवाओं में प्रेम है नज़ारों में प्रेम है। मौसम में भी तो है प्रेम। वसंत ऋतु से लेकर फागुन तक केवल प्रेम ही प्रेम तो है। राधा और कृष्ण का प्रेम। गोपियों और कान्हा का प्रेम फिर समझ नहीं आता जब चारों और केवल प्रेम ही प्रेम है।
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तो फिर यह घृणा कहाँ से आई।
यह ईर्ष्या कब कहाँ और कैसे समाज पर छायी।
प्रभु ने तो यह दुनिया प्रेममयी खीर ही बनाई।
फिर क्यूँ हमने इसमें घोल दी अपने स्वार्थ की खटाई।
जो नित नए दिन के साथ जीवन में घुल मिलकर बहता जाता है
बन नदी की पावन धार।
क्यूँ उसी प्रेम को बाँध दिया हमने,
देकर नाम कटार(समाज) 
जहां जन्में केवल जाती, धर्म, फसाद।
ना रही भक्ति न रही शक्ति
हावी हो गया ढोंग व्यापार।
जिसके चलते नष्ट हो गया विश्वास का कारोबार।
लिये घूमता है अब हर कोई 
लेकर स्वार्थ कटार।
बगुले की भांति अब सभी ताड़ में रहते है।
जब जिस को मिल जाए अवसर
वार करके ही दम लेते है।
तड़प देखकर मछली की अब
सब आनंद ही लेते हैं।
नेता हों या अभिनेता अब सब अभिनय ही करते हैं।
दया धर्म अब डूब मरने को चुल्लू भर पानी को तरसते हैं

Wednesday, 29 January 2014

बस यूँ ही...

अजीब दास्‍तान है ये कहां शुरू कहां खत्म
ये मंज़िलें हैं कौन सी न वो समझ सके न हम....

सच ज़िंदगी भी तो ऐसी ही है। ठीक इसी गीत की पंक्तियों की तरह एक कभी न समझ आनेवाली पहेली। एक लंबा किन्तु बहुत छोटा सा सफरजिसकी जाने कब साँझ ढल जाये, इसका पता ही नहीं चलता। न जाने कितने भावनात्मक रास्तों से गुज़रता है यह ज़िंदगी का कारवां, लेकिन अंतिम पड़ाव आते-आते तक हाथ फिर भी खाली ही रह जाते हैं और दिल एकदम भरा-भरा...खुद का दिमाग ही जैसे दुश्मन बन जाता है और बार-बार डांट-डांट कर बस यही कहता है कि क्या पाया तुमने इंसान होकर? अरे तुम से अच्छे तो ये पंछीनदियाँपवन के झोंके हैं। जानते हो क्यूँक्‍योंकि कोई सरहद न इन्हें रोके।

मगर तुम...तुम तो खुद अपनी ही बनाई हुई सरहदों में अटक कर रह गए। न आगे जा सके न पीछे हट सके। हमेशा तुमने बस अपने अहम को तुष्ट करने की ही सोची। कभी किसी के स्वाभिमान या मान-सम्मान के विषय में तो तुम सोच ही नहीं पाये। सोचते भी कैसे, इंसान जो ठहरे। लेकिन एक बात तो बताओ। आखिर इंसान है क्यागलतियों का एक पुतला, जो ज़िंदगीभर गलतियाँ कर-कर के ही सीखता है किन्तु फिर भी गलतियाँ करना नहीं भूलता।

कुछ महानुभव गलती छोड़ गुनाह कर बैठते हैं और कहते हैं इसमें भी मेरी गलती कहाँ है। क्योंकि इस दुनिया का कर्ताधर्ता तो वो ऊपरवाला है ना। कहते हैं उसकी मर्ज़ी के बिना तो एक पत्ता तक नहीं हिलता। यदि यही सच है तो फिर गुनहगारों से गुनाह करवानेवाला भी तो वही हुआ ना। लेकिन वो भी शायद इसी जुमले को सच मानता है कि करे कोई भरे कोई’ यानि कि इंसान से गुनाह करवाए वो ऊपरवाला और सज़ा भी वही दे। यानी यह तो वही बात हुई कि चित भी मेरी और पट भी मेरी और तू (इंसान) मेरे हाथ की कठपुतली। जिसे मैं जब चाहूँ, जहां चाहूँजैसे चाहूँ, अपने इशारों पर नचा सकता हूँ। अपनी मनमर्ज़ी के मुताबिक अपने मनोरंजन के लिए कुछ भी करवा सकता हूँ। फिर चाहे तुम उसे गलती का नाम दो या गुनाह का, पाप कहो या पुण्य तुम्हारी मर्ज़ी। मगर तुम सब अक्ल के अंधे करोगे वही जो मैं चाहूँगा।

खुद ही सोचो कितनी अजीब बात है ये कि जिस वस्तु को पाने के लिए तुम रात-दिन एक कर देते होजिस एक चीज़ को पाने के लिए मेरे सामने सदा रोते-बिलखते गिड़गिड़ाते रहते होयहाँ तक कि उस चीज़ को पाने के लिए तुम भिखारी तक बन जाने से भी ज़रा नहीं हिचकिचाते और जब मैं तुम पर दया करके तुम्हें तुम्हारी वही प्रिय वस्तु या चीज दे देता हूँ तो अगले ही पल तुम्हारे मन से उस चीज़ को पाने की खुशी यकायक जाने कहाँ लुप्त हो जाती है। यह देख कभी-कभी तो मैं स्वयं भी सोच में पड़ जाता हूँ कि यह मानव मन भी कैसा विचित्र है जिस प्राप्य की आकांक्षा में जमीन-आसमान एक किया जाता है, वही प्राप्त होने पर तुच्छ क्यूँ लगता है। अनदेखी की अनुभूति क्यूँ देता है। 

फिर मुझे याद आता है कि एक इंसान कभी संतुष्ट ही कहाँ होता है। एक मनोकामना पूर्ण होने से पहले ही दूसरी जो जन्म ले लेती है। इसलिए तो मैं कभी तुम्हें पूर्ण संतुष्ट नहीं करता। क्योंकि मैं जितना भी दूँ तुम को सदा कम ही लगता है। लेकिन तुम यह नहीं जानते जीवन की यही कमी तुम्हारे जीवन की निरंतरता बनाए रखने की बूटी है। क्योंकि यदि इंसान संतुष्ट हो गया तो अपने जीवन पथ पर कभी आगे नहीं बढ़ पाएगा....और यदि ऐसा हुआ तो ज़िंदगी, ज़िंदगी ही कहाँ रह जाएगीक्योंकि बहते हुए पानी को भी यदि रोक दिया जाये तो उसमें से भी बदबू आने लगती है यह तो फिर भी ज़िंदगी है...सोचो ज़रा यह रुक गयी तो फिर इस संसार का क्या होगा....                   

Thursday, 2 January 2014

कल रात

 
सुनो जानते हो कल फिर आया था चाँद मेरे द्वारे। 
मेरे कमरे की खिड़की में टंगे जाली के पर्दे की ओट से 
चुपके-चुपके देख रहा था वो कल रात मुझे
इस बार चाँदनी भी साथ थी उसके 
कुछ कम उदास नज़र आया वो मुझे कल रात 
शायद अब मन हलका हो गया है उसका 
तभी तो चांदनी को भी मना लिया उसने कल रात 
ऐसा लगा मुझे कल रात   
जैसे दोनों किसी छोटे नन्हे शिशु की तरह खेल रहे हों मेरे साथ
जैसे चाँदनी मुझसे कह रही हो कल रात  
कि शुक्रिया दोस्त मुझे मेरा हँसतामुसकुराता चाँद लौटाने के लिए 
तुमने मुझे मेरा चाँद लौटाया है 
तो मैं भी तुम्हें कोई तोहफा जरूर देना चाहूंगी
 बस तुम ना मत करना 
और अचानक मेरे चेहरे पर चाँदनी 
 अपनी अद्भुत चमक के साथ 
टूटती हुई मोती की माला की तरह बिखर गई
और छोड़ गई अपने उस अद्भुत सौंदर्य का एक अंश 
मेरे चेहरे पर कल रात
फिर उसी सौंदर्य और भरपूर चमक को लिए 
वो हँसती-खिलखिलाती हुई जा मिली अपने चाँद के साथ 
ऐसे जैसे सागर में नदिया और फूल में खुशबू मिले  
आखिर में दोनों हाथों में हाथ डाले
हवा के बिछौने पर बादलों की ओढ़नी लिए नभ में छिप गए
तब ऐसा लगा मुझे 
जैसे चाँद के मुख पर लगे खामोशी के सभी बादल छंट गए....

  

Wednesday, 18 December 2013

खुद भी देखो एक बार प्रकृति बनकर....


सर्दियों की ठंडी ठंडी सुबह में मैं और मेरे घर का आँगन 
मध्यम-मध्यम बहती हुई शीत लहर सी पवन 
जैसे मेरे मन में किसी गोरी के रूप को गढ़ रहे है
जैसे ही हवा के एक झौंके से ज़रा-ज़रा झूमता है एक पेड़
तो ऐसा लगता है जैसे किसी सुंदर सलोनी स्त्री के अधरों पर बिखर रही है
एक मीठी सी मुस्कान, 
दूर कहीं बादलों से ढके आकाश में 
किसी एक चिड़िया का नज़र आ जाना 
यूँ लगता है, जैसे सूने किसी पनघट पर नीर लेने आयी 
किसी कामायनी के घूँघट का ज़रा हल्के से सरक जाना 
और उसकी एक हलकी सी झलक का दिख जाना...

आह ! कितना अदबुद्ध है यह नज़ारा, 
जी चाहता है इसे हमेशा-हमेशा के लिए अपने अंतस में भरलूँ 
कि जब मन उदास होता है, साथ अवसाद होता है। 
तब इन्हीं सुंदर कोमल खूबसूरत पलों को याद करने पर 
अशांत मन ज़रा देर के लिए ही सही ही 
ठंडक और सुकून पाता है 
तब प्रकृति के यही नज़ारे हमारे अंदर नव जीवन का संचार करते है 
प्रेरित करते हैं हमें पुनः नयी शुरुआत करने के लिए 
जानते हो क्यूँ ? क्यूंकि यह प्रकृति हमारी माँ है 
और कोई भी माँ अपने किसी भी बच्चे को 
यूँ दुख में विलीन हो, अवसाद में गुम होता नहीं देख सकती 
मगर अफ़सोस कि यह वो माँ है, 
जिस पर उसके अपने ही बच्चे कुठाराघात करने से बाज़ नहीं आते। 
किन्तु फिर भी जब तक उसमें प्राण बाकी है। 
जहां तक भी संभव है वह अपने बच्चों को निराशा नहीं देती 

उस पर भी जब हमारे अत्याचारों की अति पर 
कोई प्रकृतिक आपदा आती है जैसे    
सुनामी या बाढ़, बादल का फटना या ज़मीन का धंसना, 
तब भी त्राहिमाम-त्राहिमाम करते हुए भी 
मढ़ देते है, सारा दोष उसी के सर पर 
बिना यह सोचे कि यह उस माँ का गुस्सा नहीं 
बल्कि उसकी एक दरकार है 
कि अब भी वक्त है संभल जाओ 
वरना एक वक्त ऐसा आयेगा 
जब मैं स्वयं चाहकर भी 
नहीं लुटा पाऊँगी तुम पर अपना प्यार 
अपने सौंदर्य की वो बहार, जिसे देख-देखकर तुम बड़े हुए हो  
जिसकी धूप छाँव में, पेड़ो के पीछे छिपकर कभी खेले कभी सोये 
जिसने अंजाने में ही तुम्हें जीवन के मूल्य सिखा दिये। 

अरे ज़रा तो सोचो क्या दोगे तुम अपनी आने वाली पीढ़ी को ?
यह कंक्रीटों का जंगल, 
या पंखे और AC की घुटन भरी हवा, 
ज़रा एक बार दिल से सोचकर देखो। 
गूगल पर ही दिखा पाओगे उन्हें यह प्रकृतिक नज़ारे 
यह पंछी नदिया पवन के झोंके, यह चाँद सूरज, यह पेड़ पौधे, 
यह फूल बगिया, यह जंगल, यह जानवर यह सारे नज़ारे, 
क्या शेष रह जाएगा पास में तुम्हारे ? 
न खाने को शुद्ध अन्न होगा, न पीने को साफ पानी। 
तब क्या अपनी ही संतान को ऐसा विष देना चाहोगे तुम ? नहीं ना ! 
तो ज़रा एक बार मेरे बारे में भी तो सोचो, 
सोचो अपने दिल पर हाथ रखकर सोचो। 
मैं कैसे दे दूँ तुम्हें वो विष, 
जो तुमने मेरे आँचल में घोल दिया है।
मुझे माँ रूप में खुद अपने अंदर देखो, 
देखो ज़रा "खुद भी देखो कल्पना मात्र में एक बार प्रकृति बनकर" 
तब शायद तुम समझ सको मेरा दर्द।
        

Wednesday, 11 December 2013

एक मुलाक़ात चाँद के साथ...


कल रात मैंने चाँद को देखा। सूने आकाश में उदास बहुत उदास सा जान पड़ा वो मुझे। कल रात ऐसा लगा जैसे बहुत कुछ कहना चाहता है वो मुझ से। वरना इस कड़कड़ाती ठंड की ठिठुरती रात में भला वो अपनी पूरी जगमगाहट लिए मेरी खिड़की पर क्या कर रहा था। शायद बहुत कुछ था उसके पास, जो वो कहना चाहता था मुझसे, मगर इस चमक चाँदनी का स्वांग भरने की क्या जरूरत थी उसे। मैं तो यूँ भी उसकी दीवानी हूँ। लेकिन शायद वह अपने रंग रूप के माध्यम से मुझे लुभाना चाहता था। मुझे आकर्षित करना चाहता था, ताकि में उसकी सुंदरता से मोहित होकर ही सही उसकी बात को सुन लूँ। क्यूंकि यूँ तो आमतौर पर चाँद से बातें तो सभी किया करते हैं। मगर उसके दिल की कोई सुनता ही नहीं। सब बस उसे अपनी आप बीती सुनना चाहते है और सुनाते भी है। मगर जाने क्यूँ उसकी आँखों की नमी, उसका दर्द, उसका अकेलापन किसी को दिखाई ही नहीं देता कभी...। आखिर हर किसी को कोई एक तो चाहिए ही होता है ना जो शांति से, पूरी ईमानदारी के साथ तुम्हारी बात सुन सके! नहीं ? इसलिए तो होते हैं ना, रिश्ते प्यार मोहब्बत के, दोस्ती के, नाते रिश्तेदारों के। हाँ यह बात अलग है कि इन रिश्तों की भीड़ में भी कोई एक ही ऐसा होता है जिसे अपने दिल की बात कह देने के बाद कुछ दिल हल्का सा महसूस करता है। मगर कोई होता तो है न...पर इस चाँद के पास तो कोई है ही नहीं। यह किस से कहे अपने दिल की बात, अपने जज़्बात। शायद आज इसलिए इसका मौन मुखर हो ही गया। आखिर कोई कब तक चुप रहे और सहे यह खामोशियाँ। माना की खामोशियों का भी अपना एक अलग ही वजूद होता है, जो स्थिति परिस्थिति के हिसाब से अपना रंग बदलता है, मगर हमेशा मन को अच्छी नहीं लगती यह खामोशियाँ...तभी तो इंसान ने समाज बनाया और समाज ने आपसी रिश्ते। सच वरना कितना अकेला होता न यह इंसान, इस प्रकृति की तरह। अकेला खामोश तन्हा, जो चाहकर भी कभी अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाता। सोचो ज़रा कैसा लगता हो उन मूक-बधिर लोगों को, ध्यान दिया है क्या कभी उनकी पीड़ा पर, जो न अपने मन की कह सकते है ना सुन सकते हैं। कितने अंजान है वो इस कहने सुनने के सुख से! उन्हें तो पता ही नहीं कि किसी को कुछ कहना और किसी से कुछ सुनना किस तरह न सिर्फ जीवन बल्कि कई बार ह्रदय परिवर्तन का कारण भी बन जाता है, और एक हम हैं जो अब भी लड़का लड़की की इच्छाओं के प्रति अपने ही अहम के कुएं में कूपमंडूक बने घुटे जा रहे हैं। बिना यह सोचे, बिना यह समझे कि हमें केवल एक स्वस्थ शिशु भी मिल जाये तो बहुत है। क्या फर्क पड़ता है कि वह लड़का है या लड़की। ज़रा सोचो। एक बार इस नज़र से भी सोचकर तो देखो। मेरे दुश्मन, मेरे भाई मेरे हम साये....  

Wednesday, 4 December 2013

सर्द हवाओं में ठिठुरते एहसास....और तुम


सर्द हवाओं में ठिठुरते एहसास और तुम 
इन दिनों बहुत सर्दी है यहाँ,  
एकदम गलन वाली ठंड के जैसी ठंड पड़ रही है
जिसमें कुछ नहीं बचता
सब गल के पानी हो जाना चाहता है
जैसे रेगिस्तान में रेत के तले सब सूख जाता है ना 
बिलकुल वैसे ही यहाँ की ठंड में भी कुछ नहीं बचता  
यहाँ तक के खुद का वजूद भी नहीं,अस्तित्व हीन सी लगने लगती है ज़िंदगी 
जिसकी न कोई राह है, न मंज़िल, फिर भी बस चले जा रही है 
किसी बर्फ की चट्टान के जैसी ज़िंदगी, जो कतरा-कतरा पिघल रही है 
ऐसे में जब कभी घर के बाहर निकलना होता है 
तब जैसे इन सर्द हवाओं में मेरे सारे एहसास ठिठुर जाते है 
सारे जज़्बात सिकुड़ जाते है  
और फिर जब मौसम की ठंडक 
धीरे-धीरे किसी बुझते हुए दिये की कप कपाती लौ की भांति 
मेरे दिमाग को सुन्न करना आरम्भ करती है 
तब मैं भी चुपके से जला लेती हूँ अपने अंदर तुम्हारे नाम की एक सिगड़ी
और डाल देती हूँ उसमें कोयला नुमा जलती हुई कुछ यादें,वादे, मुलाकातें 
तब उन यादों,वादों और मुलाकातों की गरमी पाकर 
फिर जी उठते है मेरे अंदर के कुछ मरे हुए एहसास मेरे जज़्बात....और तुम 

Monday, 18 November 2013

पेड़ों पर अंतिम सांस लेते हुए पत्तों की दास्ताँ

  

 

सर्द हवाओं में मेरे साथ साथ चलती
दूर बहुत दूर तलक मेरे साथ सूनी लंबी सड़क
जिस पर बिछे है
न जाने कितने अनगिनत लाखो करोड़ों
सूखे पत्ते नुमा ख्याल
जिनपर चलकर कदमों से आती हुई पदचाप
ऐसी महसूस होती है, मानो यह कोई पदचाप नहीं
बल्कि किसी गोरी के पैरों की पायल हो कोई
जिसकी मधुर झंकार सीधा दिल पर दस्तक देती है
लेकिन जब देखती हूँ पत्तों से रिक्त पेड़ को
तो ऐसा लगता है कि जैसे ज़िंदगी अपने अंतिम सफर पर पहुँचकर
इंतज़ार कर रही है
उस पल का, जब हवा का कोई एक झोंका आए
और उन बचे हुए प्रतीक्षा में लीन 
पत्ते नुमा प्राणों को अपने साथ ले जाये
ताकि फिर एक बार जन्म ले सके, एक नयी ज़िंदगी 
और 
जीवन के संघर्षों से आहात, एक पुरानी हो चुकी ज़िंदगी को विराम मिल सके....  

Sunday, 10 November 2013

ज़िंदगी


यूं तो सभी की ज़िंदगी एक किताब है 
मगर तुम से मिलकर जाना कि 
तुम भी तो एक बंद किताब की तरह ही हो 
जिसकी परत दर परत, एक एक करके
मुझे हर एक पन्ने को खोलना है 
और न सिर्फ खोलना है, बल्कि पढ़ना भी तो है
हाँ यही तो चाहते हो न तुम भी 
कि मैं पढ़ सकूँ तुम्हारा मन 
तुम्हारी ज़िंदगी की किताब से 
ताकि तुम भी खुलकर महक सको, चहक सको 
किसी बंद कली की तरह
क्यूंकि अक्सर जलती हुई अगरबत्ती सी ज़िंदगी 
सुलगती हुई महकदार अगरबत्ती सी ही, तो हो जाना चाहिती है ना मेरे दोस्त ....      

Tuesday, 24 September 2013

कुछ खामोशियाँ ऐसी भी ...


कभी देखा सुना या महसूस भी किया है तन्हाइयों को 
खामोशी की चादर लपेटे एक चुप सी तन्हाई 
जो दिल और दिमाग के गहरे समंदर से निकली हुई एक लहर हो कोई 
जब कभी दिलो और दिमाग की जद्दोजहद के बीच शून्य में निहारती है आंखे 
तो जैसे हर चीज़ में प्राण से फूँक जाते है 
और ज़रा-ज़रा सांस लेता हुआ सा प्रतीत होता है 
सुनो क्या तुमने भी कभी महसूस किया है तन्हाइयों को इस तरह ...

पक्का नहीं किया होगा 
क्यूंकि तन्हाई उदासी खामोशी तो खुदा की उस नेमत की तरह हैं 
जो केवल इश्क करने वालों को ही नसीब होती है 
पर तुमने तो कभी इश्क किया ही नहीं
खुद से भी नहीं 
और जो खुद से इश्क नहीं कर सकता 
वो भला किसी और से इश्क़ कर सकता है क्या 
नहीं ना ...

इसलिए तुम कभी महसूस ही नहीं कर सकते 
वो तन्हाइयाँ 
वो खामोशियाँ
वो एक चुप 
जो भीड़ में भी तन्हा कर दे
जो बेवजह कहीं भी होठों की मुस्कुराहट का सबब बन जाये

वो ख़मोशी जो उस मसले हुए फूल की तरह होती है, जो खुद मिटकर भी महकता है 
ठीक वैसे ही जैसे एक जली हुई अगरबत्ती जो सुलगती तो है, मगर खुशबू के साथ 
जैसे सागर किनारे खड़े होकर भी लहरों का शोर, शोर सा सुनाई नहीं देता 
जानते हो क्यूँ... क्यूंकि कुछ खामोशियाँ ,तन्हाइयाँ शोर में भी खूबसूरत ही लगती है 
सुनो क्या तुमने भी कभी महसूस किया है उन खामोशीयों और तन्हाइयों को इस तरह .....

Thursday, 29 August 2013

ख़याली पुलाव या एक वृक्ष, क्या है ज़िंदगी ?

ख़याली पुलाव कितने स्वादिष्ट होते है ना 
झट पट बन जाते है
इतनी जल्दी तो इंसटेंट खाना भी नहीं बन पाता 
मगर यह ख़याली पुलाव तो, 
जब तब, यहाँ वहाँ, कहीं भी आसानी से उपलब्ध हो जाते है 
बस एक वजह चाहिए होती है इन्हें पकाने की 
वो मिली नहीं कि पुलाव तैयार है
....................................................................

लेकिन क्या सचमुच ख़्याल, पुलाव की ही तरह होते है 
मुझे तो ऐसा लगता है, 
जैसे ख़्याल 
किसी पेड़ पर लगे पत्तों की तरह होते हैं 
आपका अपना अस्तित्व एक वृक्ष का रूप होता है 
और आपके ख़्याल उस वृक्ष की पत्तियाँ 
जब ख्यालों का कारवाँ बढ़ता है 
तब न जाने कितने ख़यालों के पंछी आकर
आपकी आँखों में अपना बसेरा बना लेते हैं 
और किसी चित्रपट पर चल रहे किसी चलचित्र की तरह 
दृश्य दर दृश्य एक के बाद एक ख़्याल बदलता चला जाता है 
फिर अचानक से एक वास्तविकता की आँधी आती है 
और अपने साथ उड़ा ले जाती है 
आपके ख़्वाबों और ख़्यालों के सारे पंछियों को 
 तब आँखें वीरान सी रह जाती है
ख़्यालों के पंछियों के घरौंदों से लदा वृक्ष 
पतझड़ के बाद पत्तों से रिक्त वृक्ष की तरह रह जाता है 
अकेला, उजाड़, सुनसान 
मगर मन में आस और आँखों में प्यास 
उस एक उम्मीद की किरण को मरने नहीं देती 
और फिर एक बार किसी नई चाहत की नमी पाकर 
ख्यालों का वृक्ष फिर उसी तरह हरा भरा होने लगता है 
जैसे 
बारिश के बाद आयी नई नई कोपलों की हरियाली 
शायद ज़िंदगी इसी को कहते हैं....

Monday, 5 August 2013

चित लागे न कहूँ ओर ....

निंद्रा में खोई थी मोहन
स्वप्न सजीले देख रही थी
भटक रही थी उन गलियों में
चित चोर रहे तुम वहीं
कितना मोहक था सब कुछ
जहां नाच रहा था मोर

हरियाली ही हरियाली थी
सब थे भाव बिहोर
न कोई दुख था, न कोई पीड़ा
न वियोग का छोर,
अब देखो तो कुछ न बाकी
विरह पसरे चहुं ओर

नहीं रहे अब नदिया सागर
बिखरा पड़ा है कुढ़ा कर्कट
जित देखो चहुं ओर
पेड़ बचे न पगडंडी
अब जाऊँ में किस और मोहना
चित लागे न कहूँ ओर....
   

Thursday, 25 July 2013

ऐसा तो ना था मेरा सावन ...


देखो ना सावन आने वाला है
यूं तो सावन का महीना लग गया है
मगर मैं भला कैसे मान लूँ कि सावन आगया है 
क्यूंकि प्रिय ऐसा तो ना था मेरा सावन 
जैसा अब के बरस आया है
  मेरे मन की सुनी धरती 
 तो अब भी प्यासी है, उस एक सावन की बरसात के लिए 
जिसकी मनोरम छवि अब भी 
रह रह कर उभरती है
मेरे अंदर कहीं 
जब मंदिरों में मन्त्रौच्चार से गूंज उठता था 
मेरा शहर 
बीलपत्र और धतूरे की महक से
महक जाया करता था मेरा घर 
वो आँगन में पड़ा करते थे 
सावन के झूले 
वो हरियाली तीज पर 
हाथों में रची हरी भरी मेंहदी की खुशबू 
वो अपने हाथो से बनाना राखियाँ 
वो एक कच्चे धागे से बंधे हुए  
अटूट बंधन
जाने कहाँ खो गया है अब यह सब कुछ  
अब कुछ है 
तो महज़ औपचारिकता
नदारद है 
वो अपनापन
जैसे सब बह गया इस साल
न अपने बचे, न अपनापन
तुम ही कहो ना प्रिय यह कैसा सावन 
जहां अब 
कहीं कोई खुशी दूर तक दिखायी नहीं देती  
अगर कुछ है 
तो वो है केवल मातम 
जहां अब बाज़ार में फेनी और घेवर की मिठाइयाँ नहीं 
बल्कि मासूम बच्चों के खाने में घुला जहर बिक रहा है
जहां अब सावन की गिरती हुई बूंदों से 
मन को खुशी नहीं होती  
बल्कि अपनों के खोने का डर ज्यादा लगता है
मेंहदी की ख़ुशबू अब 
खून की बू में बदल गयी है
सावन के झूले अब बच्चों की अर्थियों में बदल रहे है     
ऐसा तो ना था मेरा सावन, कभी ना था, जैसा अबके बरस दिख रहा है.... :(  


Saturday, 20 July 2013

कविता ...एक कोशिश


कुछ मत सोचो 
न कोई रचना, ना ही कविता
मैं यह सोचूँ 
काश के तुम बन जाओ कविता 
जब चाहे जब तुमको देखूँ 
जब चाहे जब पढ़ लूँ तुमको 
ऐसी हो रसपान कविता 

हो जिसमें चंदन की महक पर  
लोबान सी महके वो कविता 
हो जिसमें गुरबानी के गुण 
रहती हो गिरजा घर में वो, 
प्रथनाओं में लीन कविता 

सपनीली आँखों में चमके 
तारों सी रोशन हो कविता 
हो उदास अगर कोई भी मन 
बन मुस्कान उन अधरों पर  
देखो फिर मुसकाये वो कविता 

भूख से रोते बच्चे को देखकर  
झट रोटी बन जाये कविता 
माँ की लोरी में घुलकर फिर   
मीठी नींद सुलाये कविता  
बेटी सी मासूम कविता 
पिता का मान सम्मान कविता 
कहलाए वो तेरी भी और मेरी भी बन जाये कविता....

Friday, 21 June 2013

क्या यही प्यार है ?


तुम, तुम प्यार की बात कर रहे हो 
सुनो तुम्हारे मुंह से यह प्यार व्यार की बातें अच्छी नहीं लगती (जानेमन)  
तुम जानते भी हो प्यार होता क्या है ? 
प्यार ज़िंदगी में केवल एक बार होता है दोस्त 
बारबार नहीं,   
तो भला फिर तुम्हें 
प्यार करने का हक़ ही कहाँ रह जाता है
प्यार करने वाले कभी दो नावों में सवार नहीं होते 
प्यार तो वो करते हैं जो अपनी जुबान के पक्के होते है 
तुम्हारी तरह फरेबी और मतलबी नहीं 
एक बे पेंदी के लोटे की तरह 
कि जब मन किया प्यार का दामन थम लिया 
और जब जी चाह ऐसे भुला दिया जैसे जानते ही नहीं ...
मगर प्यार, प्यार तो कोई मजबूरी नहीं है, 
प्यार तो ईश्वर की पूजा है, खुदा की इबादत है, 
ज़िंदगी का मक़सद है, आत्मा की शांति है 
पर फिर भी कभी तुमने अपनी ज़िंदगी और प्यार में से कभी  
अपने प्यार को नहीं चुना, एक पल के लिए भी नहीं,
जैसे वो प्यार नहीं पाप हो तुम्हारा  
जबकि, मैंने तो तुम्हें सदा अपने दिल की गहराइयों से चाहा, 
तुमसे प्यार किया, यहाँ तक के सब कुछ 
अपना मैंने तुम पर वार दिया न सिर्फ अपना तन,मन,धन 
अपितु अपने लिए अपने परिवार का प्यार, उनका विश्वास
सब कुछ, सिर्फ तुम्हारा साथ पाने के लिए 
मैंने उन सबको भूला दिया जिनकी वजह से आज मैं हूँ
मेरा वजूद है,      
पर बदले में तुमने मुझे क्या दिया 
विश्वास घात, दर्द, दूरियाँ, तन्हाइयाँ, 
पराया होने का एहसास 
माना कि प्यार में कोई शर्त नहीं होती (जाने तमन्ना) 
यह भी माना कि प्यार में, प्यार के बदले प्यार ही मिले 
यह भी ज़रूरी नहीं
मगर यह सब तभी तक ठीक और सही लगता है ना 
जब प्यार एक तरफा हो मगर हमारे बीच तो ऐसा नहीं था 
फिर तुम्ही कहो क्या यही प्यार है...    

Wednesday, 19 June 2013

गंगा की व्यथा ....


मेरा नाम है गंगा
हाँ हूँ, मैं ही हूँ गंगा
वो गंगा
जिसे तुम ने
अपने सर माथे लगाया
बच्चों को मेरा नाम
लेले कर नहलाया,
जो कुछ भी मिला सकते थे
तुम, तुम ने मेरे आँचल
में वो सब कुछ मिलाया

न सोचा एक बार भी
मेरे लिए कि गंदगी
से मुझे भी हो सकती है
तकलीफ़, असहनिए पीड़ा
यह कहाँ का इंसाफ है
पाप तुम करो
और सज़ा मैं भुगतूँ ?
लेकिन फिर भी
मैं चुप रही...

मैंने आज तक कभी
कुछ न कहा
तुमने पूजा पाठ
और भक्ति के आडंबर
के नाम पर मुझे पल-पल छला
मैं चुप रही....
तुमने बीमारी से भरे शवों को
मुझ में घोला
मैं तब भी चुप रही...

यहाँ तक के तुम ने
मेरे जीवन, मेरे प्रवाह तक को
मुझ पर बांध बना-बना कर रोका
मैं तब भी चुप रही
कई बार मैंने तुम्हें
अपने संकेत दिये
कई बार चाह कि
तुम मेरी चुप्पी को समझो

मेरी पीड़ा को
स्वयं महसूस करो
चंद लोगों ने
शायद समझा भी मुझे
इसलिए गंगा सफाई अभियान भी चलाया
मगर हाये रह मंहगाई
उन चंद लोगों को भी
अमानुषता रही है खाई

मैं शिव के सर चढ़ कर बैठी
लेकिन एक दिन
उनके गले लग कर क्या रोली
तुम से सहा नहीं गया

अब जब फूटा है
मेरा कहर तो सहो,
सहना ही होगा तुमको
आज भुगतनी ही होगी
तुम्हें भी वही पीड़ा
जो आज तक तुम
मुझे देते आए हो

माना कि मैं माँ हूँ
मगर इसका अर्थ, यह तो नहीं
कि तुम अपने कुकर्मों से
मेरा अस्तित्व ,
मेरा वजूद ही मिटा डालो
मत भूलो अगर मैं एक माँ होने के नाते
तुम्हें जन्म दे सकती हूँ
तुम्हारे पापो को
अपने आँचल से धो सकती हूँ

तो मैं ही तुम्हें
पल भर में
घर से बेघर भी कर सकती हूँ
हाँ हूँ मैं गंगा,
जो गर चाहूँ तो
भगवान को भी
अपने जल से पवित्र कर दूँ
और जो ना चाहूँ
तो हज़ारो ज़िंदगियों को

पल भर में यूं ही मसल के खाक कर दूँ
अब भी कह रही हूँ मैं
चेंत सको तो चेंत जाओ
माँ के अंचाल में यूं जहर ना मिलाओ....           

Tuesday, 11 June 2013

फूल गुलाब का ....


"फूल गुलाब का लाखों में हजारों में 
चेहरा जनाब का" 

कितना आसान होता है ना, किसी को गुलाब कह देना
निर्मल, कोमल, खुशबू से लबरेज़ महकता हुआ गुलाब
किसी के होंटों गुलाब, तो किसी के गालों पर गुलाब
और हो भी क्यूँ ना
आखिर यूं हीं थोड़ी न फूलों का राजा कहलाता है गुलाब
मगर किसी को गुलाब की उपमा से नवाज़्ते वक्त
हम कभी क्यूँ नहीं सोच पाते
उसकी सुंदरता और उसकी कोमलता के पीछे छिपे
उसके दर्द को, उन काँटों की चुभन को
जिसके बीच दिन रात रहकर भी
तिल तिल कर बढ़ती है एक कोमल कली
और बनती है एक खूबसूरत गुलाब
जिसे देखने के बाद हर मन मचल ही जाता है उसे पाने के लिए
इन दिनों मेरे घर में भी खिल रहे हैं, अनगिनत गुलाब
मगर कल उन्हें पाने की चाह में
मैंने महसूस की उसके काँटों की चुभन
तब यह ख्याल आया कि
हर मुस्कुराहट के पीछे एक दर्द छिपा होता है
चहरे और स्वभाव से जो इंसान खुश मिजाज दिखाई दे
अक्सर वही इंसान अंतस से बेहद दुखी होता है
अर्थात जो आँखें देखती है वो हमेशा सच नहीं होता
यूं तो समंदर किनारे भी बहुत शोर होता है
लेकिन समंदर की ख़ामोशी भी अक्सर हमें सुनाई नहीं देती...
जैसे यह है तो एक कविता मगर कविता सी सुनाई नहीं देती :-)

खैर छोड़िए जनाब जो मन में आया और जो महसूस किया वो लिख दिया अब कविता बनी या नहीं इस से क्या फर्क पड़ता है आप सब मज़ा लीजिये इस गीत का.... :))
  

    

Sunday, 9 June 2013

इसी का नाम है ज़िंदगी ...


पल पल बदलते रहने का नाम है ज़िंदगी
आज सुबह तो कल शाम है ज़िंदगी

अपने ग़म में तो सभी जीते है
दूसरों के ग़म को जीने का नाम है ज़िंदगी

खूद अपनी खुशी में हंस लिए तो क्या बड़ा किया
रोते हुए बच्चे को हँसाने का नाम है ज़िंदगी

चढ़ते सूरज के साथ आगाज़ का नाम है ज़िंदगी
नित नए पल मिलने वाले तोहफ़े का नाम है ज़िंदगी

सांस तो सभी ले रहे हैं जीने के लिए,
फकत सांस लेते रहने का नाम ना है ज़िंदगी

यूं तो गुजरते कारवां सी भी है यह ज़िंदगी
मगर तेरे नाम के बिना जो गुज़र जाये वो बियाबाँ है ज़िंदगी

भले ही तेरी मूहोब्बत के फूल न सही इसमें
मगर तेरी यादों का दरख़्त है यह ज़िंदगी

गुज़र जाने का नाम ही है ज़िंदगी
गुज़र ही जाये एक दिन,

मगर बिन प्यार किए जो गुज़र जाये तो वो हराम है ज़िंदगी
क्यूंकि केवल प्यार का ही तो दूसरा नाम है ज़िंदगी

पल्लवी सक्सेना    

Wednesday, 5 June 2013

रेत का दर्द...


 समंदर का दर्द तो सभी महसूस करते है
लेकिन क्या कभी किसी ने
उसके किनारे पड़ी रेत के दर्द को भी महसूस किया है
शायद नहीं,
क्यूंकि लोगों को तो अक्सर
सिर्फ आँसू बहाने वालों का ही दर्द दिखाई देता है
मौन रहकर जो दर्द सहे
वह भला कब किसको दिखाई दिया है
कुछ वैसा ही हाल है उस रेत का 
जो समंदर के किनारे पड़ी रहकर
उसके सारे आँसुओं को दिन रात पीकर भी मौन रहा करती है
मगर फिर भी उसके बारे में कभी कोई कुछ नहीं सोचता
लोगों को अगर कुछ दिखाई देता है
तो केवल उस समंदर की खामोशी
रेत का मौन तो किसी को कभी ना दिखाई देता है
और ना ही कभी किसी ने उसकी खामोशी को सुनने की कोशिश ही की होगी कभी
 अरे ज़रा तो सोचो ओ मुसाफिरों
जो खुद किसी के आँसुओं को अपने अंदर जज़्ब करते-करते
खुद खोखली हो चुकी है
वो भला किसी के सपनों के महलो को कैसे एक मजबूती दे सकती है
मगर फिर भी लोग उसके अंचल में गढ़ते हैं अपने सपनों के महल
और जब तक साथ देता है उसका सबल वो बनाने देती है अपने ऊपर वो महल
मगर संमदर की एक लेहर आकर जैसे उसके दर्द को जागा जाती है
और उस पर बना वो सपनों का महल टूट कर बिखर जाता है  
आदत से मजबूर इंसान बड़ी बेरहमी से
उसके बचे हुए अंशों पर अपने पैरों की ठोकर से वार करता हुआ निकल जाता है
बिना एक बार भी यह सोचे
कि कुछ देर पहले यही वो रेत थी
जिसने उसे अपने सपनों को कुछ पल के लिए ही सही
गढ़ने का ,उसे साकार रूप में देखने का एक मौका दिया था...    

Saturday, 25 May 2013

ज़िंदगी की सारी खुशियाँ जैसे मौन हो कर रह गयी...

ज़िंदगी की सारी खुशियाँ जैसे मौन हो कर रह गयी
वो छोटे-छोटे खुशनुमा पल
वो गरमियों की छुट्टियों में चंगे अष्टे खेलना
वो रातों को सितारों की चादर तले देखना
वो करना बात कुछ आज की, कुछ कल के सपनों को देखना

वो लगाना आँगन में झाड़ू और पानी का फिर फेंकना
प्यासे पेड़ों को पानी दे, वो पत्थरों पर खींच के खांचा
फिर लंगड़ी-लंगड़ी खेलना
वो कैरी का पना
वो पुदीने की चटनी
वो भर भर उंगली से चाटना

वो नानी के घर आँगन तले नीबू का रस निकालना
वो बना के शिकंजी झट शक्कर उसमें फिर घोलना
वो गन्ने का रस
वो जलजीरे के मटके
वो छागल का पानी
वो ठेले पे बिकते थे खीरे के टुकड़े
यूं लगते थे जैसे हो हीरे के टुकड़े
वो माँ का, आँचल से पसीना पोंछना

ज़िद कर-कर के खाना, वो मटके की कुल्फी
वो घड़ी-घड़ी शरबत बना के पीना
वो रसना
वो रूहफ़्ज़ा
वो शर्बत-ए-आजम
वो ठंडी बर्फ से फिर कॉफी बनाना

मगर अब ना नानी का घर है
क्यूंकि कुछ न कुछ सीखने की फिकर है
न रहा शर्बत तो क्या,? कोल्ड ड्रिंक्स क्या भला शर्बत से कम है!!!
चटनी का क्या है, सॉस जो यहाँ है।

माँ के आँचल से चेहरा छिला है।
वेट टिशू भला किस मर्ज की दवा है।
आइसक्रीम भला किसे कब बुरा लगा है।
पर मटके न जाने कब से बेधुला है।

गर्मी बहुत है कि खेलना मना है
इसलिए शायद
यह वीडियो गेम और अब आई पेड चला है।
लगता है अब तो ऐसे, जैसे घर में हिन्दी बोलना भी गुनाह है :-)
सच इस सब में जैसे ज़िंदगी ही गुम हो के रह गयी
के यूं लगता है अब तो जैसे
ज़िंदगी की सारी खुशियाँ मौन हो कर रह गयी ...