Sunday, 29 April 2012

ज़िंदगी


ज़िंदगी एक ऐसा शब्द जिसके हर नज़र में एक अलग ही मायने है 
कोई कहता है ज़िंदगी एक किताब है 
तो कोई कहता है बारिश का पानी 
कोई कहता है आग का दरिया
तो कोई कहता है सागर का पानी 
कोई सागर की लहरें तो कोई तेरी मेरी कहानी 
जैसे इस ज़िंदगी को देखने के लिए 
परखने के लिए जितनी आँखें उतने ही दृष्टिकोण 
मगर आज तक कोई न समझ सका है 
इस ज़िंदगी का फलसफा
आखिर यह ज़िंदगी है क्या एक सवाल ?
जिसके न जाने कितने जवाब 
मुझे लगता है ज़िंदगी एक मकान की तरह है
जिसमें आतित की यादों के कई सारे झरोखे हैं 
किसी भी एक खिड़की या झरोखे में खड़े होकर देख लो 
एक अलग ही दुनिया नज़र आती है 
कभी उस दुनिया में लौट जाने को मन करता है 
तो कभी-कभी उस ही खिड़की के दरवाजे 
हमेशा के लिए बंद कर देने को भी मन करता है
कभी यूं भी होता है कि  
उसी झरोखे के बंद किवाड़ के नीचे से बहती हुई हवा सी 
कोई मीठी सी याद छुपके से आकर आपके होंठों पर 
एक मोहक सी मुस्कान बिखेर जाती है 
तब अक्सर उस मोहक सी यादों के बीच हम सुन
नहीं पाते उस ज़िंदगीनुमा मकान के दरवाजे के बाहर दस्तक देती
भविष्यवाणियाँ को ,
जो उस वक्त निर्धारित कर रही होती है हमारा भविष्य   
तो कभी यूं भी होता है कि उस ज़िंदगी के मकान के बाहर ही 
उमड़ रहे होते है कुछ अंधड़ जिनकी आवाज़ 
हमें झँझोड़ कर वर्तमान में ला खड़ा करती है
लेकिन तब भी वो हिला नहीं पाती उस ज़िंदगी के मकान को कभी 
जिसकी नींव होती है खुद ज़िंदगी
उम्मीद, आस्था और विश्वास 
जिसके आधार पर खड़ा होता है
एक नहीं कई ज़िंदगीयों का एक मकान.....      

Friday, 30 March 2012

प्रकृति और साथ ज़िंदगी का ....


कभी सोचा है प्रकृति और इंसान के साथ के गहरे रहस्य को
जैसे एक ही सिक्के के दो पहलुओं सा साथ 
एक के बिना दूजा अधूरा
जैसे मन के भाव वैसा प्रकृति का स्वभाव  
क्यूंकि एक प्रकृति ही तो है 
जो इंसान के साथ सदा होती है
वो कहते हैं ना 
"ज़िंदगी के साथ भी, ज़िंदगी के बाद भी"    
कभी महसूस किया है तुमने प्रकृति को बात करते  
जब खुश होता है हमारा मन या उदास होता है 
तब अक्सर प्रकर्ति का ही तो हमेशा साथ होता है
कभी एक हमसफर का रूप तो कभी माँ का स्वरूप  
अक्सर बातें करते हैं तब यह नदिया, यह पहाड़, यह झरने 
वो नदी का किनारा, वो पेड़, वो फूल, वो पत्तियाँ भी कभी-कभी 
वो चाँद वो तारे ज्यों दोस्त हो हमारे फिर क्या यह धरती और क्या आकाशा 
सारी कायनात जैसे हमारों ही इशरों पर चल, देने लगती है हमारा ही साथ 
अक्सर प्यार में पागल मन गुंगनाने लगता है वो गीत 
पंछी ,बादल प्रेमी के पागल हम कौन है साथिया....
और मन कहता है याद नहीं भूल गया हो याद नहीं भूल गया 
और जब मन उदास होता है तो
जैसे यही खूबसूरत नज़ारे अचानक दिल की चुभन बन जाते है एक सुलगती हुई 
मन में दबी आग मगर संगीत तो संगीत ही होता है चाहे गम का हो, या खुशी का 
और उदास होने पर भी मन गाता है 
यह रात खुशनसीब है जो अपने चाँद को 
कलेजे से लगाए सो रही है यहाँ तो ग़म की सेज पर हमारी आरज़ू अकेली मुंह छुपाये रो रही है 
इंसानी मन और उसके मानोभाव तो आज तक खुद इंसान नहीं समझ सका है 
तो कोई और क्या समझेगा भला  
क्यूंकि जब भी की है कोशिश किसी ने 
इस राज़ को समझ पाने की 
तब तब पलटा है ज़िंदगी और प्रकृति दोनों ही ने 
मिलकर इंसानी ज़िंदगी की किताब का एक पन्ना
जिसे नए सिरे से लिखने और समझने के लिए  
 फिर एक बार हो इंसान प्रकृति और साथ ज़िंदगी का....    


Tuesday, 27 March 2012

अपना घर


जानते हो तुम्हारे घर से जाने के बाद 
मुझे घर कितना सुना और खाली-खाली सा लगने लगता है  
यूं तो मैं कहने को अक्सर कह दिया करती हूँ
 कि यही तो वो समय है मेरा 
जब सबके स्कूल ऑफिस जाने के बाद 
मैं दो घड़ी चैन से बैठकर चाय पी पाती हूँ 
और मन ही मन यह सोच लेती हूँ 
कि चलो अब सारा दिन केवल मेरा है मेरे लिए है 
चाहे जो मन करे करू, अब तो तुम्हारे घर वापस आने तक यहाँ मेरा ही एक क्षत्र राज है,
मगर यह सब कहने की बाते हैं वास्तविकता तो कुछ ओर ही है। 
वास्तव में घर वो स्थान है जहां यदि काम ढूँढने जाओ 
तो शायद एक पूरा दिन भी कम पड़ जाये 
और यदि न चाहो, तो कोई काम ही नहीं होता 
मगर यह सब मैं तुमसे कोई शिकायत करने के लिए नहीं कह रही हूँ 
बल्कि मुझे तो बहुत अच्छा लगता है 
यूं घर का काम करना 
और बाकी घर के सदस्यों कि तरह 
अपने इस घर कि भी देख भाल करना
जानते हो क्यूँ, क्यूंकि जब मैं तुमसे जुड़कर यहाँ आई थी ना  
तब इसी घर ने मेरे पाओं कि मिट्टी को अपने अंदर जजब करके 
मुझे सदा के लिए अपना बना लिया था अपना मान लिया था
तभी से एक अनदेखा अंजान
मगर जो अब बहुत ही जाना पहचाना सा रिश्ता सा बन गया है मेरा इस घर से 
यहाँ की दीवारों से, यहाँ रखी हर चीज़ से मेरा एक रिश्ता सा बना हुआ है  
 यहाँ कि हर चीज़ मुझसे बातें किया करती है 
अपनी भावनाओ को मेरे साथ सांझा किया करती है
और उन सब से यूं बाते करते कराते 
कब शाम ढाल जाती है और तुम्हारे घर वापस लौटने का समय हो जाता है 
पता ही नहीं चलता जानते हो क्यूँ, क्यूंकि      
अपना घर अपना ही होता है 
चाहे महल हो या फिर छोटे से घर की चार दीवारी  
यहाँ तक की झोपड़ी ही क्यूँ ना हो अपना घर अपना ही होता है, 
चाहे जहां भी रहलो 
अपने घर का सा सुकून, शांति या आराम किसी को कहीं और मिल ही नहीं सकता 
फिर चाहे कोई भी जगह कितनी भी सुंदर हो या 
फिर कितने भी ऐश और आराम की वस्तुओं से ही क्यूँ न भरी पड़ी हो,
किन्तु तब भी जो सुख और सुरक्षित होने की भावना 
का आभास जैसा अपने घर की चार दीवारी में 
प्रवेश करने के बाद मिलता है 
मेरा दावा है, वो सुख किसी को भी और कहीं मिल ही नहीं सकता 
पर क्या खुद कभी महसूस की है एक बात तुमने  
या फिर सोचा है क्या कभी
यूं तो कहने को पूरा घर ही अपना होता है 
लेकिन तब भी हर घर के कोने में, 
कोई न कोई एक ऐसी जगह भी ज़रूर होती है 
जहां मन एक असीम शांति और अपने पन का अनुभव करता है, 
जहां वक्त के ठहराव को महसूस किया जा सकता है 
जो अपने घर के अलावा पूरी दुनिया में और कहीं मिल पाना संभव नहीं, 
वो जगह किसी भी व्यक्ति के लिए, उसके घर में बनी कोई भी जगह हो सकती है 
जैसे किसी के लिए पूजा घर, तो किसी के लिए महज़ कोई खिड़की,
 कोई बालकनी,बागीचा, छत या फिर आपका अपना कमरा 
या किचन घर की कोई भी जगह हो सकती है वो   
जहां आप अपने आप से बात करते हैं
वह एक स्थान अपने आप में आपके लिए बहुत खास होता है,
जहां ज़िंदगी की उलझनों और मन में चल रहे 
किसी भी प्रकार के विचारों को आप अपने आप से बांटते है,
फिर चाहे वो, आपके अंदर चल रहा किसी प्रकार का अंतर द्वंद हो,
किसी बात का दुख हो, कोई समस्या ही ,परेशानी हो 
या फिर चाहे कोई बेहद खुशी की बात ही क्यूँ ना हो
मुझे भी बहुत अच्छा लगता है
अपने इस घर की हर एक चीज़ से बाते करना   
यूं ही कभी बागीचे में या घर के आँगन में टहलते-टहलते 
पेड़ पौधों से बाते करना या उनसे अपने मन की बातों को कहना,
 कभी-कभी खिड़की में घंटों खड़े रहकर 
बाहर के नज़रों को देखते हुए अपने आपसे बाते करना 
कभी-कभी तो यूं भी होता है की अपने कमरे में किसी एक जगह बैठकर 
तकिये को हाथों में लिए घंटो मन ही मन कुछ सोचते रहना 
अपने आप खुद से ही सवाल भी पूछना और खुद ही जवाब भी देना 
या फिर छत की मुडेर पर खड़े होकर वहाँ लगे गमलों से बाते करना
प्रकृति के साथ अपनी बातों को अनुभवों को अहसासों को बटना 
अपने आप में एक ऐसा सुकून देता है 
जिसका कोई पर्याय नहीं
वाकई ऐसा महसूस होने लगता है 
जैसे सच मुछ कुदरत आपकी बातें सुन रही हो
और आपसे वो कह रही हो जो आप और से सुने की आपेक्षा रखते हो 
मगर कभी सुन नहीं पाते उस वक्त प्रकृति एक ऐसे दोस्त के रूप में सामने होती है 
जो आपकी हर बात सुनने समझने को तैयार है बिना किसी शर्त के 
बिना किसी शिकायत के जो हर नज़रिये से आपके साथ है
यदि आप खुश हो तो वो खुश है और यदि आप दुखी हो तो दुखी भी है 
बस यह सब देखने की नज़र चाहिए     
कुछ लोग अपने घर की साफ सफाई के दौरान भी लगभग घर 
की हर एक वस्तु से बातें करते हुए 
अपने मनोभावों को बाँट लिया करते है। 
यह सब सिर्फ ओर सिर्फ केवल अपने ही घर में संभव हो पाता है 
किसी और के घर में यह सुख कहाँ ,
इसलिए मुझे प्यार है अपने इस छोटे से मगर मेर इस अपने आशियाँने से
क्यूंकि कुछ बातें खामोशी के साथ ही और खामोशी के बाद भी बहुत अच्छी लगती है.....  






Friday, 23 March 2012

रिश्तों में नाम ज़रूरी है क्या ?


माना के रिश्ता था कभी हमारे बीच प्यार का मगर क्या सच में वो प्यार ही था 
या हम उसे प्यार समझ बैठे थे  
मगर आज ज़िंदगी के जिस मोड पर खड़े हम 
तुम ही बताओ क्या वो सच में प्यार था।  
दो अंजान लोग विचारों के माध्यम से मिले,मिलकर साथ चले 
विचारों के मिलन से ही नज़दीकियाँ बढ़ी तो क्या विचारों का मिलाप ही प्यार है ??? 
न.... मुझे तो नहीं लगता कि एक सी सोच और भावना का होना ही प्यार कहलाता है 
क्यूंकि ऐसे तो न जाने कितने लोग होंगे इस जहां में जिनसे मेरी तुम्हारी सोच मिलती होगी 
तो क्या हमे उन सब से प्यार हो जाएगा 
गर ऐसा होता तो शायद आज इस दुनिया का नक्शा ही कुछ ओर होता, !!!
नहीं, तुम्हें नहीं लगता ना ऐसा.....मैं जानती हूँ, तुम मन ही मन मुस्कुरा रहे हो, 
शायद हंस भी रहे हो सोच-सोच कर कि कैसे पागल लड़की है यह  
 कुछ भी सोचती है कुछ भी कहती है 
भला प्यार का सोच से क्या वासस्ता है ना !!! यही सोच रहे हो न तुम ? 
शायद तुम ही सही हो मुझे भी यही लगता है 
प्यार का सोच से कोई वास्ता हो ही नहीं सकता 
क्यूंकि प्यार तो उनके बीच में भी देखा है मैंने 
जिनकी सोच नदी के दो किनारों कि तरहा होती है ,
मगर तब भी प्यार सांस लेता है, उनकी रूह में कहीं न कहीं, 
तो फिर हमारे बीच जो कुछ था, वो प्यार था या जो आज है वो प्यार है 
हमारी सोच और भावनायें तो कल भी मिलती थी और आज भी मिलती है। 
मगर मैं इस रिश्ते को कोई नाम देना नहीं चाहती। न प्यार का और न ही दोस्ती का, 
जाने क्यूँ मैं आज तक समझ ही नहीं सकी कि लोग जब प्यार में बिछड़ जाते है, 
तो आगे जाकर वो इस रिश्ते को दोस्ती का नाम देकर क्यूँ चलाया करते है 
क्यूँकि प्यार दोस्ती में नहीं बदल सकता है। हाँ दोस्ती ज़रूर प्यार में बदल जाती है। 
इसलिए में अपने इस रिश्ते को इन नामों के माया जाल से बचाकर रखना चाहती हूँ। 
मेरी नज़र में हमारे बीच जो भी है वो ना तो प्यार है, न दोस्ती 
सिर्फ विचारों और भावनाओं का रिश्ता है हमारा 
तो क्या ज़रूरी है इसे कोई न कोई नाम दिया ही जाये 
क्या बिना किसी रिश्ते का नाम दिये, दो लोग आपस में अपने सुख दुख नहीं बाँट सकते।
क्या ज़रूर है दो इन्सानों के बीच बने आपसी समझ के रिश्ते को कोई नाम देना 
क्या बिना किसी रिश्ते कि मोहौर लगे दो 
इन्सानों को उनकी आपसी समझ के बल पर जो कि हर रिश्ते कि नीव होती है  
उन्हे जीने का अधिकार नहीं दिया जा सकता
यूं भी मकान बन जाने के बाद तो लोग सिर्फ मकान को देखते है 
क्यूंकि नीव को कोई नहीं नाम नहीं होता
तो फिर रिश्तों में नाम क्यूँ ....         

Wednesday, 21 March 2012

है कोई जवाब ?


कहते हैं खुशी बांटने से बढ़ती है और ग़म बाटने से घटता है
यह भी कहा जाता है कि अति हर चीज़ कि बुरी होती है
फिर चाहे वो प्यार ही क्यूँ न हो
कितना कुछ कहा जाता है न इस प्यार के बारे में
लेकिन यदि कभी यही प्यार बेवफाई कि वजह बन जाये तो,
तुम मुझे पूरी शिद्दत से चाहो और मैं तुम्हे धोखा दे जाऊन तो
तो क्या तब मुझे माफ कर सकोगे तुम क्यूंकि प्यार में तो कोई शर्त नहीं होती
प्यार तो नाम है त्याग का,प्यार में सिर्फ पाना प्यार नहीं होता
बल्कि प्यार में अपना सर्वस्व देदेना प्यार कहलाता है

जैसे की तुमने मुझे दिया
लेकिन यदि फिर भी बहक जाये मेरे कदम तो क्या माफ कर सकोगे तुम
नियति के खिलाफ जाकर मेरे साथ इंसाफ कर सकोगे तुम
यूं तो बिना किसी अपराध के अग्नि परीक्षा सदियों से सदा औरत ही देती आई है
लेकिन यदि आज में अपना अपराध मानकर, लूँ तुम्हारे प्यार की परीक्षा
तो क्या सब कुछ भुला कर मुझे माफ कर सकोगे तुम
यूं तो आज ज़माना बराबरी का है, मगर क्या तुम मेरा यह सच जानकर भी
मुझे वैसे ही चाह सकोगे जैसे कभी पहले चाहा था तुमने

मैं जानती हूँ कहना बहुत आसान होता है मगर निभा पाना उतना ही मुश्किल
क्यूंकि हो तो तुम भी आखिर एक इंसान ही कोई भगवान नहीं हो ,
तुम्हारे अंदर भी एक दिल है जो धड़कता है, दिमाग है, जो सोचता है जज़्बात हैं जो मचलते है
मगर क्या इन सब को परे रखकर केवल प्यार का दामन थाम
क्या तुम दे पाओगे मेरा साथ मेरे सच के साथ
क्या निभा पाओगे शादी के फेरों में दिया गया अपना वो वचन
कि हर पल हर स्थिति में तुम दोगे मेरा साथ,

शायद नहीं क्यूंकि दुनिया का हर पुरुष प्यार करना तो बहुत अच्छे से जानता है
मगर प्यार निभाना केवल स्त्रियॉं को आता है
यकीन न हो मेरी बात का यदि तो इतिहास उठाकर देखलों
प्यार में समझौता और सहनशीलता कि मूरत केवल स्त्री को ही कहा जाता है
मगर जब यही बात किसी पुरुष पर आती है तो मात्र एक धोबी के कहने भर से
एक पतिवृता स्त्री को घर से बेघर कर दिया जाता है जंगलों में भटकने के लिए
आखिर कब तक कृष्ण बहलाते रहेगे यह कहकर राधा का मन
कि मैं इसलिए विवाह किया रुक्मणी से प्रिय
क्यूंकि विवाह में दो लोगों कि जरूरत होती है, और हम तो एक ही है ना

आखिर क्यूँ और कब तक चलेगा
यह प्यार में समर्पण, सहनशीलता, और त्याग का यह एक तरफा खेल
अरे वह तो फिर भी भगवान थे, रही होगी उनकी कोई मजबूरी
जिसके चलते उठाना पड़े होंगे उनको यह कदम शायद...मगर मैं तो इंसान हूँ,
और इस नाते मुझे शिकायत है सदियों से चले आरहे इस एक तरफा खेल से
मानती हूँ भूल मेरी है गुनहगार भी मैं ही हूँ मगर तभी प्यार है मुझे तुमसे
अब तुम्हारी बारी है जवाब तुमको देना है।
क्या अब भी मेरे सच के साथ तुम्हें कुबूल है मेरा प्यार

रही बात मेरी तो मेरे दिल के अंदर बने तुमसे कि गई बेवफाई
के जख्मो से खून का रिसना तो बादस्तूर अब भी जारी है
भले ही वो एक भूल थी मेरी,जिसके चलते
भावनाओं ने ही भावनाओं के तूफानों में झोंक दिया मेरा अस्तित्व को  
मगर मुझे तुम से प्यार तब भी था और अब भी है
इसलिए शायद कदम बढ़ना तो चाहते है मेरे, मगर बढ़ नहीं पा रहे,

जाने क्यूँ अंजाने में ही सही जख्म भी मैंने ही दिया है तुमको,
मगर तब भी दर्द मुझे ही हो रहा है
फिर भी ना जाने मुझे ऐसा क्यूँ लगता है, कि मैं मर चुकी हूं
मगर मुरदों को तो दर्द नहीं हुआ करता न फिर मुझे क्यूँ हो रहा है
क्यूंकि शायद यूं तो मेरी आत्मा मर ही चुकी है
मगर उसी आत्मा कि शांति के लिए शरीर का मिट्टी में मिलना अभी शेष है......  

Sunday, 18 March 2012

जीवन क्या है ? जीवन या एक पहेली....


 एक बेहतरीन लेखिका के एक ब्लॉग को पढ़कर मेरे मन में उठे कुछ विचार 

गहराइयों मे जाकर भी सोचा है कभी कि यह जीवन क्या है ? समझ ही नहीं आता कि जीवन क्या है एक पहेली या एक हकीकत, जिसे समझते सुलझाते ही इंसान की तमाम उम्र गुज़र जाती है। मगर ज़िंदगी के अंतिम पड़ाव तक समझ नहीं आता कि यह जीवन आखिर था क्या? शून्य में निहारते हुए इंसान को अकेले में अक्सर कुछ प्रश्न आ घेरते है जैसे हम क्या चाहते हैं, क्यों चाहते हैं...जीवन हमें कैसा चाहिए जैसे सवाल। यूं तो हर इंसान दौहरी ज़िंदगी जिया करता है। हमेशा दो मुखौटों के साथ एक वो जो समाज और दुनिया को दिखाने के लिए होता है और एक वो जो खुद के लिए सच्चाई के आईने से कम नहीं होता। समाज और दुनिया के लिए लगाया गया मुखौटा अक्सर हम सभी रोज़ ही सुबह से अपने चहरे पर लगा लिया करते है, एक औपचारिकता भरी मुस्कान और जीवन के दो औपचारिक शब्द माफ़ करना और धन्यवाद के साथ और जब रात को अकेले में दिन भर की भागदौड़ के बाद जैसे ही सुकून के कुछ पल मिला करते है, तन्हाइयों के साथ तब अपने आप ही उतर जाता है,यह दिन भर से चढ़ा दिखावे का मुखौटा जैसे हटा हो कोई नकाब किसी अजनबी के चेहरे से,

तो तब अक्सर मन करता है निकल जाने को एक ऐसी सुनसान राह पर जहां तेज रोशनी उगलते ख़ाबों के बीच से गुज़रता कोई अपने आप सा खाली सा रास्ता तालाशता हुआ मन जहां हवा की सरसराहट से यहाँ वहाँ उड़ते सूखे पत्ते और बेवजह इक्का दुक्का निकलती गाडियाँ जिन्हें देखकर ऐसा महसूस होता है जैसे इनमें बैठे लोग भी बस भागे चले जारहे हैं अपनी दिन बार की ऊब को ख़त्म करने के लिए और उस अनदेखी अनजानी मंज़िल की तलाश में जिसका सफर है यह ज़िंदगी, ऐसे में जब हम दूर कहीं कोई पार्क में या बागीचे में ऐसे ही एक अधजले से टिमटिमाते बिजली के खंबे के नीचे पड़ी किसी बेंच पर जाकर झींगुरों और मच्छरों के शोर तले कुछ देर बैठे हुए जब अपने आप से मिलते हैं तब अकसर किसी एक पल का कोई टुकड़ा हमारा हाथ पकड़ के हमको ख्यालों की उस दूसरी दुनिया में लेजाता है और हम उसमें गुम हो जाते हैं। जहां हम तन्हा होकर भी खुद को कभी तन्हा महसूस नहीं किया करते और तभी अचानक जैसे  कहीं से कोई आवाज का सूरज उगता है यह कहते हुए कि इतनी रात गए यहाँ क्या कर रहे हो, चलो जाओ अपने घर और हम उस आवाज के साथ उन ख्यालों की दुनिया से बाहर आजाते हैं । तब अक्सर घर लौटे वक्त दिमाग में फिर एक खयाल दस्तक देता है।

एक दुनिया हमारे अंदर भी है, जो बिकुल बाहरी दुनिया की तरह है। जहां रास्ते भी हैं, मंज़िले भी, जहां पहाड़ भी है,नदियाँ भी,जहां मौसम के रूप में बहार भी है, तो पतझड़ भी, प्यार भी है, तो नफरत भी, वो सब कुछ है जो हमें बाहर दिखाता है। जबकि दरअसल वह सब हमारे अंदर ही होता है। इन्हीं सब ख़यालों के बीच चलते हुए रात का अंचल पसरता जाता है और उस बागीचे से घर को लौटता वह रास्ता जिस पर चलकर हम खुद से मिलने गए थे छोटा होता चला जाता है और अंत में हम फिर वहीं आखड़े होते हैं जहां से चले थे कभी....शायद किसी ने ठीक ही कहा है "दुनिया गोल है"। लेकिन इन सब के बीच एक बात तो तय है, कि किसी भी इंसान को अकेले होने के लिए किसी सुनसान बियाबान जगह पर जाने की कोई जरूरत नहीं होती। हम इंसानों से, रिश्ते नातों से, भरे जंगल में भी अकेले हो सकते हैं। कभी भी, कहीं भी...जैसे वो गीतहै ना
"हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी 
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी"

सोचते-सोचते लगता है उफ़्फ़ कितनी उलझन भरी है यह ज़िंदगी जिसका सफर है मगर मंज़िल कोई नहीं, शायद मंज़िल नाम की कोई चीज़ होती ही नहीं, सिर्फ सफर ही हुआ करता है। हाँ जब भी ऐसा लगता है, कि  हमको हमारी मंज़िल मिल गई, किन्तु तब वास्तव में वो मंज़िल नहीं जीवन के सफर का एक पड़ाव होता है।  जहां हम कुछ देर रुकते है और यह गुमान हो जाता है। कि यही तो है हमारी मंज़िल, मगर फिर थोड़े ही दिनों में यह अहसास भी हो जाता है, कि अभी कहाँ अभी तो दिल्ली बहुत दूर है। अभी तो बहुत कुछ है जीवन में जिसे अभी पाना है। अभी हम रुक नहीं सकते अभी तो बस चलते ही चले जाना है और हम फिर निकल पड़ते हैं उस अनजानी सी अनदेखी मंज़िल की ओर जीवन के इस पथ पर चलते-चलते कुछ हमसफर मिलते हैं ऐसा आभास सा होता है, लेकिन उनके बिछड़ते ही हम और अकेले हो जाते हैं। यानी शाश्वत है अकेला होना ही। तो क्यूँ न यह जीवन भी अकेले ही जिया जाये। क्या जरूरत है किसी के साथ की, यूं भी तो अब तक का सफर हमने अकेले ही तय किया है। क्यूंकि हमसफर भले साथ हो आपके मगर उसके बावजूद भी आपकी अपनी एक अलग दुनिया होती है जहां सिर्फ और सिर्फ आप होते हैं। आपके अंदर कि दुनिया बिना मुखौटे की दुनिया,जहां आप खुद से मिला करते हैं।  

तब कभी महसूस किया है, किसी नदी के किनारे बने 
किसी मरघट के दृश्य को
कहीं किसी के स्मृतिचिन्ह किसी पत्थर के रूप में दर्जहोते हैं 
तो कहीं थोड़ी थोड़ी दूरी पर आग भी होती है।   
जीवन भर की थकी हुई देहों को विश्राम देती आग. 
कहीं आग बस बुझने को हुआ करती है 
तो कहीं धू-धूकर जल रही होती है।   
तो कहीं मंथर गति से जल रही होती है  
मानो अपनी ही गति पर मुग्ध हो.
हर एक आग का अपना एक अलग ही दृश्य नज़र आता है
मगर उन चिताओं का भी 
अंत समय आनेतक वहाँ कोई नहीं रुकता
और रहजाता है वहाँ भी फिर एक बार वही अकेलापन.....
प्रतिभा कटियार 

यह जीवन का कैसा सत्य है। जहां इंसान का रिश्ता केवल उसकी साँसों पर टीका होता है। जहां साँसे ख़त्म वहाँ सब कुछ जैसे अचानक से कहीं विलीन हो जाता है। सासों के रुकते ही शरीर अपवित्र हो जाता है। अपने ही घर में अपनी ही लाश छूत पाक का करण बन जाती है और जल्द से जल्द उसे अग्नि के सुपुद्र करने कि कोशिशें शुरू हो जाती है और शायद तब उस अग्नि में आहुति हम खुद ही रूह रूप में दूर खड़े हो देदीया करते हैं। अपने अंदर उन बरसों से चल रहे प्रश्नो को, कि हम कौन है, हमारी मंज़िल क्या है कोई मंज़िल भी है या यह सफर ही है बस जो न रुकता है न थमता है बस केवल चला करता है। क्या पता इन जलती हुई चिताओं में इन सवालों कि आहुतियों के बाद भी इंसान को सुकून मिल भी पाता है या नहीं, इस अतिम सफर के बाद भी यह जीवन पहली सुलझ भी पाती है या नहीं ????              

Tuesday, 6 March 2012

ज़िंदगी के रंग...

कुछ भी शुरू करने से पहले आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनायें दोस्तों 

होली के रंग अपनों के संग
बस रंग ही रंग कभी सोचा है 
अगर ज़िंदगी में यह रंग 
न होते तो कितनी 
उदास निराश और फीकी सी लगती यह ज़िंदगी 
सच सभी तरह के रंगों का भी बहुत महत्व होता है 
इस एक ज़िंदगी में 
फिर चाहे वो होली के रंग हों 
या ज़िंदगी में हुए अनुभवों के रंग 
रंग तो रंग ही है
जीवन के रंग 
कभी खुशी कभी ग़म 
कुछ रंग ज़िंदगी में स्वतः ही बिखर
हमारी ज़िंदगी को रंगीन बना जाते है
जैसे सच्चे प्यार क्या कोई ठहरा हुआ सागर जो छलके
पर न बिखरे यही तो चाहता है हर दिल    
मगर कुछ रंग ऐसी भी होते है 
जो ना चाहते हुए भी हमारी ज़िंदगी में 
 भर दिये जाते हैं 
जैसे यह ज़िंदगी नहीं, किसी चित्रकार 
की कोई चित्रकारी हो 
और 
उसमें कोई रंग कम पड़ जाये तो 
 वो चित्रकार वहाँ काम चलाने के लिए 
जबरन ही किसी और रंग को भर दिया करता हो
ज़िंदगी भी तो एक चित्रकारी की तरह ही है 
जिसमें शायद चित्र तो हम बनाते है 
मगर उन चित्रों में रंग कोई और भरा करता है ..... 



Monday, 27 February 2012

क्या इसको ही कहते हैं प्यार ....


जब भी कभी किसी को प्यार होता है 
तब हमेशा ही कोई अनदेखा, अंजाना 
सा चेहरा बिन बांधे कोई डोर ऐसे खींचता है अपनी ओर 
जैसे जन्मो जन्मांतर का रिश्ता हो उससे 
जो अनेदेखा अंजाना होते हुए भी 
बहुत ही अपना सा नज़र आता है।   

जिसके जीवन मे आने के बाद
खेतों में लहराई सरसों कल परसों में बीते बरसों
सी हो जाती है ज़िंदगी चारों और बस खुशबू ही खुशबू 
हुआ करती है मन महका-महका सा रहा करता है 
बेवजह होंटों पर मुस्कान खिली रहती है 
चेहरे और स्वभाव पर एक अनोखी आभा दमकती है।
  
हर मौसम खुश गवार सा नज़र आता है 
प्रकृति के कण-कण से प्यार हो जाता है
प्रकर्ति ही नहीं बेजान आईने से भी प्यार हो जाता है 
खुद को ही बार-बार देख मन बाग-बाग हो जाता है  
आखिर ऐसा भी क्या छुपता होता है 
उस अनदेखे अंजाने से चहरे में, 
जिसके गुम हो जाने के बाद....

ज़िंदगी रेगिस्तान सी नज़र आती है 
इतनी मायूस हो जाती है ज़िंदगी कि 
फिर जीने की कोई चाह ही बाकी नहीं रह जाती है  
जीने के लिए खुशियों में भी ग़म दिखाई देता है 
मंदिर में भी भगवान नहीं पत्थर दिखाई देता है
कल तक जो हवा का एक झोंका किसी के गालों को छूकर 
अपने नसीब पर इतराया करता था। 
  
आज वही हवा थेपडा बन कर थप्पड़ मारती है 
यह कैसी नदी बस गई है अब आँखों में 
जिसे अपना सागर ही नहीं मिलता कहीं 
बिखरते तो अब भी है, फूल कई किसी के चहरे पर कहीं 
मगर अफसोस की उन फूलों की जगह अब मोतीयों ने ले ली है।
ऐसा क्यूँ होता है बार-बार क्या इसको ही कहते है प्यार ?

जिसके बारे में कहा जाता है कि 

"हर इंसान को अपनी ज़िंदगी में 
एक बार प्यार ज़रूर करना चाहिए 
क्यूंकि प्यार इंसान को बहुत अच्छा बना देता है।"            

Tuesday, 21 February 2012

फलसफ़ा ज़िंदगी का


यूं तो शायद आज आपको मेरी यह रचना पढ़कर 
ऐसा लगे जैसे यह तो वही बात हुई "ढ़ाक के तीन पात" 
मगर क्या करू यही सच है, समंदर की लहरों 
और साहिल से शुरू हुआ यह अभिव्यक्ति का कारवां 
आज फिर समंदर पर ही आ गया है 
कोशिश तो बहुत की मैंने ,की इस समंदर से निकल कर
कुछ लिखूँ मगर मेरे मन को मेरे आँखों को शायद 
और कोई नज़ारा रास ही नहीं आया कहीं इसलिए 
आज एक बार फिर 
समंदर और इंसानी भावनाओं से जुड़ी 
कुछ अपने आप से की हुई बात, कुछ मूलाकाते...
पूर्णिमा की रात जब चाँद आपने पूरे शबाब पर होता है 
तब इस समंदर की लहरे भी धारण कर लिया करती है
आवरण श्वेत चाँदी की मीन का जो मचल-मचल कर 
स्वागत कर रही होती हैं उस पूनम के चाँद का  
क्यूंकि उस चाँद की चंद किरणों ने दिया है नव जीवन उन लहरों को 
खुलके जश्न मनाने का, के तभी बिना किसी आहट  के 
धीरे से रात के आँचल से निकल 
जब सूर्य फैला देता है अपनी स्वर्णिम किरणे उन्हीं 
मतवाली लहर नुमा मीनो पर तो जैसा अचानक की बदल 
जाता है सारा नज़ारा और वो श्वेत चाँदी की मीन सहसा  
बदल जाती है सोने की मीन मे 
कितना अदबुद्ध होता है यह मंज़र जैसे यह लहरे लहर न रहकर 
मीन नज़र आने लगती है जैसे इंसान का मन पल में 
परिस्थिति के मुताबिक खुद को बदल ही लेता है  
ठीक वैसे ही यह लहरे रात दिन एक नया आवरण ओढ़
बहलालीय करती है अपना मन 
या शायद उन चाँद और सूरज का मन  
और देखा देती है एक ही पल में वो सारा नज़ारा वो सारे मंज़र 
इंसानी ज़िंदगी के, कभी आवेग 
तो कभी अलहड़ जवानी यह पानी की रवानी
कुछ गहरे अहसास तो कुछ छोड़े हुए अनमोल पल 
समंदर की गोद से निकाला हुआ कोई सच्चा मोती 
हो जैसे सच्चा प्यार का कोई अंश कभी चाँदी तो कभी 
सोना कभी मोती ,तो कभी लहरों की गूंज में 
गूँजता सन्नाटा हो जैसे किसी के मन को अंतमर्थन 
और भी नजाने क्या-क्या छुपा है सागर किनारे  
जिसे ढूँढने और समझ ने 
में ही गुज़र जाती है तमाम ज़िंदगी 
और फिर भी समझ नहीं पाते लोग फलसफा जिंदगी का....     

Thursday, 16 February 2012

इंतज़ार ....

कभी दोस्ती का दिन, तो कभी आलिंगन का दिन,
तो कभी प्यार के इज़हार का दिन  
रोज़ कोई नया दिन आता है और आकर चला भी जाता है 
मगर,यदि कोई नहीं आता तो वह हो केवल तुम
जैसे एक कभी न ख़त्म होने वाला इंतज़ार,
जिसमें दिन रात जला करता है मेरा मन,कभी सोचा है 
घंटों समंदर के किनारे खड़े होकर जब आती-जाती हर लहर 
को देखकर मन ही मन उठती है कोई कसक तब कैसा लगता होगा मुझे 
शायद तुमने कभी महसूस ही न किया हो, 
ईर्ष्या होने लगती है, इन सागर की लहरों से मुझे और ऐसा लगता है    
मुझसे तो कहीं ज्यादा अच्छी है इस साहिल की किस्मत  
जिसे समंदर के प्यार की लहरों में भीगने के 
लिए कभी नहीं गुजरना पड़ता इस "इंतज़ार" की पीड़ा से 
मगर इस दर्द और जलन के बावजूद भी   
मुझे गुरूर है अपने प्यार पर 
कि मैंने जिससे भी प्यार किया पूरी शिद्दत से प्यार किया। 
क्यूंकि प्यार खुदा की वो नेमत है, जो हर किसी को नहीं मिलती 
बहुत किस्मत से लोगों को प्यार मिलता है।  
मुझे भी मिला, मगर इंतज़ार के रूप में क्या पता यही मेरे प्यार की  परीक्षा हो शायद 
इसलिए मैंने अपने प्यार का नाम ही रख दिया है "इंतज़ार"     
जानते हो, तुम्हारे इंतज़ार में मेरी क्या हालत होती है,
कैसे जानोगे, तुमने तो किया ही नहीं कभी किसी का इंतज़ार
तुम्हें तो बिन मांगे सब मिला है कुदरत से, तुम क्या जानोगे 
कि इंतज़ार का यदि, अपना ही एक अलग मज़ा है 
तो अपने आप में एक पीड़ा भी है इंतज़ार
खैर जाने दो तुम नहीं समझोगे     
कैसा लगता है जब किसी का जानो दिल से हो "इंतज़ार"  
ओर वो संगदिल ही संग न हो, तो कैसा लगता है, तब    
आँखों मे नींद नहीं होती और शून्यता का गहरा समुंदर 
मन मे उतर ज्वारभाटे की तरह प्रेम की दीवारों से टकरा कर 
मेरे गुरूर को चूर-चूर कर देने का पुरजोर प्रयास करता रहता है ,
पता है क्यूँ ,क्यूंकि मेरे मन के अंतस में उठती हुई 
भावनाओं की लहरों को भी पाता है, कि मुझे कितना गुरु है अपने प्यार पर
तभी तो कहीं न कहीं भरोसा भी है मुझे खुद के प्यार पर 
वो भी इस भावना के साथ, कि बिना आग में तपाये 
तो सोने की भी परख नहीं होती 
तो मैं क्या चीज़ हूँ,और फिर आग तो आग ही है 
फिर चाहे वो सोने को तापये या मन को 
तपने पर तो जलन होगी ही न !!! फिर भी 
मुझे विश्वास है एक न एक दिन तुम ज़रूर आओगे 
और तब ख़त्म हो जाएगा मेरा यह इंतज़ार 
कहती तो मैं आज भी कुछ नहीं तुम से मगर हमेशा ही जला है, मेरा मन 
मेरा अस्तित्व, मेरा वजूद तुम्हारी प्रतिक्षा की इस अग्नि में सदा ही
इसलिए अपने इस इंतज़ार को ही मानकर तस्वीर तुम्हारी
अपने मन की बातें कर लिया करती हूँ क्या करूँ हूँ तो 
आखिर मैं भी एक इंसान ही इसलिए डर भी लगता है 
कभी-कभी कि कहीं ऐसा न हो   
कि मेरे इस इंतज़ार में केवल मौन ही शेष रह जाये     
इसलिए अब तो बस एक ही गुजारिश है तुमसे 
कि हो सके, तो इतना ख्याल रखना 
इतनी भी देर ना कर देना आने में
की मेरा इंतज़ार तुम्हारा इंतज़ार बन जाये  
और मन के अंदर के ज्वारभाटे के साथ-साथ 
यह शरीर रूपी समंदर भी शांत हो जाए 
जिसमें भावनाओं की लहरें उठा करती थी कभी 
वो खुद समंदर में मिल विलीन हो जाये 
और फिर शेष रह जाये वही मौन ,निशब्द ,स्तब्ध 
इंतज़ार !!!! 

Monday, 13 February 2012

Happy Valentine's Day Friends....

फरवरी यानि प्यार का मौसम    
गुलाबों की गुलबियत लिए
गुलाबी-गुलाबी सा प्यार,
लाल-पीले गुलाबों के रंग सा रंगीन प्यार   
फूलों की खुशबों से महकता प्यार 
चौकलेट की मिठास सा मीठा-मीठा प्यार 
भोले से दिखने वाले "टेडी बीयर" सा मासूम प्यार 
तोहफों के आकर्षण सा आकर्षित करता हुआ सा प्यार 
यानि प्यार एक रूप अनेक,
तो कौन कहता है
प्यार सिर्फ रूहानी होता है,
कौन कहता है कि, प्यार सिर्फ जिस्मानी होता है 
अरे दोस्तों प्यार तो बस सिर्फ प्यार होता है 
फिर चाहे वो क्षणिक हो या अनंत अपार 
है तो वह भी प्यार,
फिर उसे चाहे कोई ख़ुशबू कहे, 
या 
खामोशी  
जो की सुनती है, कहा करती है,
जितनी नज़रें उतने प्यार के रूप 
और उसके पीछे केवल एक ही शब्द
एक ही एहसास,एक ही जज़्बात
प्यार,
तो कर दो आज सभी अपने प्यार का इज़हार,
क्यूंकि आगया है प्यार का त्यौहार
जो कि आज है  
क्या पता, कल हो न हो,
इसलिए   
happy valentine's day friends.... :)      

Thursday, 9 February 2012

दर्द...


दिल के ज़ख़्मों से बूंद-बूंद रिस्ता दर्द 
जब कभी,जज़्ब होता चला जाता हैं कहीं 
 जैसे सुखी मिट्टी में पानी 
और परत दर परत जमता चला जाता है वो दिल का दर्द, 
जैसे किसी चीज़ पर चढ़ाई 
गई मिट्टी के लेप की कई परतें जो एक दिन 
कई परतों के चढ़ाये जाने कारण आ गिरती हैं नीचे
वैसे ही एक दिन जब दिल के दर्द की परतें 
छोड़ती हैं अपनी जड़ें और गिरती हैं 
मन के धरातल पर कहीं
तब आता है एक सैलाब और फूटता है एक ज्वालामुखी 
और उसमें से निकलती हैं, मरी हुई भावनाओं की 
कुछ लाशें, कुछ कुचले हुए जज़्बात 
और तड़पता,सिसकता हुआ सा खुद का वजूद...     

Monday, 6 February 2012

मिर्च मसाला ...


क्या कहूँ लग रहा है आप सब मुझ पर पढ़कर शायद हसेंगे कि यह क्या कुछ भी लिख दिया है। मगर क्या करूँ जो महसूस किया उसे लिखे बिना रह भी नहीं सकती।

लाल मिर्च और नमक आपस में 
मिल कर बने एक मसाला 
कभी इस मसाले को खाया है 
संतरे या मौसमी के साथ 
या फिर सूखे हुए बेर या इमली के साथ 
कितना मज़ा आता है ना चटपटा स्वाद 
जैसे अंदर तक एक स्फूर्ति सी भर देता है 
फलों के साथ फलों का रस बढ़ाता सा मसाला 
खाने मे स्वाद भी लाता है यही एक मसाला 
कभी-कभी बहुत सी बातों में भी जान डाल देता है 
यही एक मसाला  
कभी सोचा है यदि सारे मसालों में 
यह दोनों ही ना हों तो भला 
क्या स्वाद रह जायेगा किसी भी खाने में
सब कुछ फीका बेस्वाद, बेजान सा खाना 
और तब न उस खाने में होगा 
कोई रूप, न रंगत, न निखार 
जैसे हो कोई मरीजों का खाना
 फिर एक पल एक खयाल आया 
ज़िंदगी भी तो एक पकवान की तरह ही है न 
अगर इसमें भी न हों सुख-दुख के खट्टे मीठे 
अनुभव या संघर्ष और सफलता या असफलता का  कोई स्वाद 
तो भला कितने बेस्वाद सी होगी न
 यह ज़िंदगी, उसमें भी किसी बेजान 
से खाने की तरह न कोई रंग होगा
न स्वाद ,न रंगत ,न निखार
बस एक मरीज के खाने सी 
बेस्वाद सी बिना नमक मिर्च की ज़िंदगी  
जैसे ज़िंदगी-ज़िंदगी नहीं मजबूरी हो कोई  
जिसे बस जीने के लिए जीना हो एक बार ..... 
    

Friday, 3 February 2012

सत्यम शिवम सुंदरम ...


कहते है प्यार अमर होता है
प्यार करने वाले खुद मिट जाते है
मगर उनका प्यार कभी नहीं मिटता
हो सकता है यही सच भी हो
वरना क्यूँ जपते लोग नाम
हीर राँझा ,या सोनी मिहिवाल का
अगले पिछले जन्म का तो पता नहीं
हमे तो आज में जीना है
क्यूंकि आज जो है वही सत्य है
और सत्य ही शिव है
लेकिन अगर सत्य ही शिव है
तो फिर वो शिव कि तरह
सुंदर क्यूँ नहीं होता
शिव जिनका न कोई आदि है ना अंत
बिलकुल प्रेम कि तरह
तो फिर सत्य क्यूँ
प्रेम की तरह कोमल नहीं होता...जैसे मेरे और तुम्हारे जीवन का यह एक कड़वा सच
....................................................................................................
क्या हुआ जो, आज हम तुम साथ नहीं है
कभी तो साथ थे न हम
आज भी उन्हीं यादों के सहारे
गुजार जाएगी यह ज़िंदगी
न कभी मैं अकेली हो सकती हूँ
तुम्हारे बिना भी, और
न तुम ही कभी तन्हा हो सकते
हो मेरे बिना फिर हम चाहें न चाहें ....
मैं नहीं कहती की तुम बेवफा हो
और आज तुम जहां हो
उसके जिम्मेदार तो तुम खुद हो ,
क्यूंकि वक्त के हाथों फर्ज़ का हाथ
थमकर तो मैंने खुद बेफाई की तुमसे
और अब जब हम दोनों
की ज़िंदगी की राहें ही
अलग हो चुकी है
तो किसी को कोई हक ही कहा
रह जाता एक दूसरे को बेवफा कहने का
माना कि फर्ज़ की रहा में
मेरा कुछ फर्ज़ तुम्हारे लिए भी था
मगर शायद वो फर्ज़ उस
फर्ज़ से कम ही था जिसे निभाने के लिए
मैंने छोड़ दिया उसे
जो मुझे दिल से अज़्ज़िज़ था
जानते हो क्यूँ
क्यूंकि तुम से पहले अधिकार है
मुझ पर उनका जिन्होंने मुझे दिया
मेरा अस्तित्व तुम्हारी ज़िंदगी में आने के लिए .....
   
 

Wednesday, 1 February 2012

क्या यही प्यार है


कभी सोचा है कि एक सितारों भरी रात से
कहीं ज्यादा रोशनी होती है एक चाँदनी रात में
क्यूँ हजारों की भीड़ में से
केवल एक चेहरा उतर जाता है
अंतस: मैं हमेशा के लिए फिर उसके बाद
भले ही कितने भी खूबसूरत चेहरे क्यूँ ना आए
ज़िंदगी में मगर उस एक चेहरे की परछाईं
जैसे छप कर रह जाती है
कागज़ से कोरे मन पर सदा के लिए
जैसे कोरे कागज़ पर
लिखावट के रूप मे स्याही
जज़्ब होती चली जाती है निरंतर
वैसे ही यह पागल मन
सारी ज़िंदगी बस उस एक
एहसास को नग्मा बना गुनगुनाया
करता है मन
"यूँ हीं कोई मिल गया था सारे राह चलते-चलते"
क्यूँ कोई भी चीज़ चाहे हो कोई मनमोहक गीत
या फिर किसी नाटक या कथा का कोई पात्र
जिसे देखकर, सुनकर या पढ़कर ऐसा लगता है
जैसे बस एक यही वह इंसान था जो इस पात्र
को इतनी शिद्दत से निभा सकता था
अगर कोई दूसरा होता,तो शायद इस पात्र के
साथ वैसा इंसाफ नहीं कर सकता था
या फिर हो असल ज़िंदगी में
आने वाला पहले प्यार का वह शौख झोंका
जो हर दिल को छू जाता है कभी न कभी
और उस एक झोंके के बाद कोई और हवा रास नहीं आती
भले ही वो कितनी भी सुहानी क्यूँ न हो
और हम उस मीठी सी याद में खोकर
अक्सर मौन से हो जाते है
क्या मौन ही एकमात्र जवाब है
दिल में उठते हुए एहसासों का
क्या अकेले में याद कर उन हसीन लम्हों को
यूँ मौन रहकर मुस्कराना प्यार है
या फिर उन एहसासों को ना चाहते हुए भी मारकर
वक्त की सूली पर टांग, फर्ज़ का नाम देकर मुकर जाना
प्यार है, या फिर एहसास ही नाम है इस प्यार का....
  

    

Friday, 27 January 2012

दुआ ना मांगते लोग ....

देखा है कभी खुद के नज़रिये से आसमान को 
देखने में एक सुंदर नारी के काले दुपट्टे में टंके  
सितारों सी रात जिसके चेहरे पर लगी है चंद्र बिंदी 
जिसने छुपा रखा है अपना चेहरा 
उस सितारे जड़े दुपट्टे से
ताकि कोई भूल से भी देखना ले उस रात का दर्द 
जो सागर की तरह गहरा है देखने में ऊपर से शांत 
मगर अंदर से हलचल मचाते होंगे उसके भी जज़्बात 
क्यूंकि इस इंसानी बेहरहम दुनिया में 
मतलब परस्तों कि कमी जो नहीं है, कहीं 
जहां एक इंसान दूसरे इंसान की मजबूरी और लाचारी 
का फायदा उठाने से नहीं चुकता 
वो लालची और खुदगर्ज़ इंसान भला क्या समझेगा 
उस सजी हुई रात के पीछे बिखरे सन्नाटे और दर्द कि पराकाष्ठा को  
क्यूँकि दर्द को समझने के लिए दिल में एहसासों और जज़्बातों
कि जरूरत होती है, जो अब ढूँढने से भी कहाँ मिलती है 
अगर ना होता ऐसा तो टूटते हुए सितारे से भी 
दुआ ना मांगते लोग......
पल्लवी 

Wednesday, 25 January 2012

अस्तित्व ज़िंदगी का ....


ज़िंदगी एक रूप अनेक 
बचपन के रंगों से सजी झरने सी ज़िंदगी 
जवानी के रंग लिए नदिया सी मदमाती ज़िंदगी
तो कभी सागर की तरह ठेहराव लिए शांत सी ज़िंदगी
जब कोशिश की समझने की यह फलसफा ज़िंदगी का तो पाया की  
अस्तित्व कभी ख़त्म नहीं होता ज़िंदगी का 
लेकिन जिस तरह पानी एक झील और सागर के रूप में 
ठहरा होते भी बहता दिखाई देता है
जिससे पता चलता है ज़िंदा है अभी अस्तित्व 
पानी के बहाव का, वैसे ही ज़िंदगी कभी मिटती नहीं    
चाहे हो पौधों का जीवन जो बीज या जड़ों के रूप रूप में 
भी ज़िंदा रहा करता है बरसों जैसे 
माता-पिता का अस्तित्व रहता है 
सदा अपने बच्चों के संस्कारों में 
और प्यार का अस्तित्व 
सदा रहा करता है स्म्रतियों में कहीं 
जैसे किसी इत्र की महक जो 
ज़ेहन में बस जाये एक बार
तो फिर कभी भुलाई नहीं जाती
जैसे रात का अस्तित्व जिंदा रहा करता है 
दिन की रोशनी में कहीं
रात के अंधेर को मिटाने के लिए  
नींदों को रोशना किया करते है ख़ाब
देखो ना बिना रोशनी कुछ भी तो नहीं  
कौन कहता है जाने वाले चले जाते है 
और सिर्फ यादें रह जाती है 
कोई कहीं नहीं जाता सब हमारे आस पास ही 
होते हैं जिन्हें देख भले ही न पाये हम 
मगर उन्हें हर पल ज़रूर महसूस किया जा सकता है उनके अंशों में कहीं .....      
पल्लवी 

Saturday, 21 January 2012

जीवन रूपी अग्नि ...


गीली मिट्टी के बर्तन सी ज़िंदगी
जैसे हो हमारा बचपन
जिसे कुम्हार अपने हाथों से 
सहेज कर बनाता है एक घड़ा और एक सुराही  
दोनों को ही डाल देता है आग मे
तपाकर पक्का करने के लिए 
बिना किसी भेद के क्यूंकि 
उसे अपने दोनों ही बर्तन प्यारे है
वह तो दोनों को ही 
आग में तपा कर पक्का करना चाहता है   
चाहे वो सुराही हो या घड़ा 
और ना ही आग ही भेद करती है दोनों को 
पक्का कर मजबूती प्रदान करने में 
तो फिर क्यूँ हम भेद करने 
लगते है जीवन रूपी आग में 
एक स्त्री को ज्यादा पक्का करने के लिए
क्या एक पुरुष को भी
उस ही जीवन अग्नि में तपकर 
उतना ही पक्का होना ज़रूरी नहीं 
जितना की एक स्त्री के लिए है
तो फिर क्यूँ भूल जाते हैं हम 
जब वही आग जरूरत से ज़्यादा हो जाये 
तो जला भी सकती है उन्हीं बर्तनो को
मगर एक स्त्री को जीवन रूपी आग में
एक बेटी के रूप में, तो कभी एक बहु के रूप में  
छोड़कर जैसे भूल ही जाते हैं हम
और छोड़ देते हैं उसे सदा के लिए 
उस आग में जलने को 
जिसमें वह चुप रहकर भी जलती है 
और यदि बोलना चाहे कुछ 
तो जला दी जाती
क्यूँ नारी जीवन बचपन से लेकर 
अतिम सांस तक एक अग्नि परीक्षा 
ही बना रहता है और जब तक 
एहसास हो हमें उस तपिश का 
तब तक शेष रह जाता है
केवल धुआँ और राख़
कभी भावनाओं के रूप मे,
तो कभी मिटे हुए अस्तित्व को याद करने के लिए ....      

Thursday, 19 January 2012

वक्त साथ दे तो कुछ बात बने ....

 बहुत देर तक चाँद को देखा है कभी
ऐसा लगता है जैसे एक सफ़ेद
चीनी की प्लेट हो और उस 
सफ़ेद चाँद की प्लेट 
पर ऊपर खड़े 
होकर ऊपर से   
जब देखा मैंनेधरती को 
तो मुझे ऐसा लगा वो चाँद 
जिस पर हम खड़े है
वह हमारा वर्तमान है 
और वो जो दूर कहीं नीला 
सा एक बिन्दु नज़र आरहा है 
वह है हमारा अपना अतीत 
बहुत ध्यान से नज़रें गाड़ा कर 
देखा तो ऐसा लगा 
जैसे मन खो गया है 
उस अतीत की गहराइयों में कहीं 
जब उस अतीत की ऊंची नीची पहाड़ियों 
नदियों और झरनो की तरह 
पानी बन बह रहे जज़्बातों को देखा 
तो उस पानी में 
प्यार के सच्चे मोती के 
कुछ कण से मिले
जो समय के बहाव के कारण 
शायद मेरे हाथों से 
फिसल कर वहीं गिर गए थे
मगर शायद हमारी भावनाओं के 
समंदर ने उन प्यार के कणों की रक्षा की
तभी वक्त का दरिया भी उन्हे 
अपने साथ बहाकर ना लेजा सका
शायद इसलिए
आज इतने बरसों बाद भी मुझे मिले 
मेरे सच्चे प्यार के कुछ बिखरे हुए से कण
जिन्हें देखकर एक बार फिर
मेरे दिल से आवाज आई की 
प्यार तब भी था, प्यार अब अभी है
क्यूंकि यह वक्त ही है 
जिसने हमें जुदा किया था 
और आज भी यह वक्त ही है 
जिसने यह एहसास जगाया 
प्यार कभी नहीं मिटता 
और आज भी यह वक्त ही है     
जो हमें फिर मिलाएगा  
तो अब 
अगर वक्त साथ दे तो कुछ बात बने....

Monday, 16 January 2012

किताब ज़िंदगी की ...


ज़िंदगी की किताब में 
एहसासों के पन्ने होते है  
जिन पन्नो पर कभी लिखी 
होती है मन की अभिव्यक्ति
तो कभी कुछ
कहे अनकहे से जज़्बात 
खुद से ही करी हुई हजारों बातें 
सागर से गहरे एहसास 
जिनसे समय के साथ बने 
न जाने कितने अनुभव लिखे होते हैं  
कभी कुछ अच्छे, तो कुछ बुरे भी 
और हर एक पन्ने पर लगा होता है एक बूक मार्क 
कभी एक मुस्कान का, तो कभी आँसुओं का  
जिनसे निर्माण हुआ कुछ भूली बिसरी यादों का 
इरादों का, कुछ सपनों का,कुछ अपनों का  
हर एक पन्ने पर बुना हुआ एक सपना 
जो था कभी अपना 
मगर अब देखो तो लगता है 
जैसे किसी मकड़ी का टूटा हुआ सा जाल 
जिसके टूट जाने पर भी उसमें जकड़ी हुई है एक मकड़ी 
क्यूंकि सपनों का मोह कभी छूटता ही नहीं 
और इसे पहले कोई छुड़ा सके अपना मोह 
अपने ही किसी सपने से 
पलट जाता है ज़िंदगी की किताब का एक और पन्ना 
फिर कोई नई उम्मीद और नाय सपना लिए 
कोशिश करने लगते है हम
हर एक नए पन्ने पर नए सिरे से 
ज़िंदगी की किताब का एक और नया पन्ना
लिखने के लिए 
मगर कितनी अजीब किताब है यह ज़िंदगी 
जिसे केवल खुद ही पढ़ा जा सकता है 
यदि दो भी किसी को पढ़ने के लिए यह किताब   
तो जाने क्यूँ उस पढ़ने वाले को हर एक पन्ना 
जैसे कोरा कागज़ ही नज़र आता है 
और हम यह आस लिए तांकते
रह जाते की शायद
यही हो वो जो समझ सके हमें
हमारी इस किताब के जरिये ही सही
मगर इसी नाकाम कोशिश में
एक दिन भर जाती है यह पूरी किताब
ज़िंदगी की ......
पल्लवी