Tuesday, 12 March 2013

बारिश और मैं ....

आज क्या लिखूँ कि मन उलझा-उलझा सा है रास्ते पर चलते हुए जब छतरी के ऊपर गिरती पानी की बूँदें शोर मचाती है तो कभी उस शोर को सुन मन मयूर मचल उठता है और तब मेरे दिल से निकलता है बस एक यही गीत....
"रिमझिम गिरे सावन, मचल-मचल जाये मन,
 भीगे आज इस मौसम,लागि कैसी यह अगन" 


यूं तो यह बारिश का मौसम मेरा सबसे ज्यादा पसंदीदा मौसम है,
क्यूंकि मुझे बारिश में भीगना बहुत पसंद है
वह घर की बालकनी में हाथ बढ़ाकर गिरती हुई बूंदों को महसूस करना 
मुझे तो यूं लगता है 
जैसे बारिश भी अपना हाथ बढ़ा रही है मेरी ओर
कि आओ मुझे छू लो,
मेरे साथ झूम लो गा लो 
ठीक किसी हिन्दी फिल्म की नायिका की तरह 
घर के आँगन में जाकर गोल-गोल घूमना 
गड्ढों में भरे पानी में "छई छपा छई, छपाके छाई" 
की तर्ज़ पर छपाक छपाक खेलना 
कितना बचकाना सा लगता है न, अब यह सब, 
लेकिन यही तो वो यादें हैं जिनमें सभी का बचपन ज़िंदा है 
हर वो बच्चा ज़िंदा है जो हर इंसान के बूढ़ा हो जाने पर भी 
कहीं न कहीं उसके दिल के किसी कोने में छुप कर बैठा होता है 
जिसे हर कोई ज़िंदा रखना तो चाहता है 
मगर कुछ सामाजिक बंधनों के कारण उसे सामने नहीं ला पाता 
और देखते ही देखते कितना कुछ बदल जाता है 
यूं तो ज़िंदगी के हर पल में एक ध्वनि है, एक सुर है, एक संगीत है 
मगर यह ज़रूरी नहीं कि हमें हर बार वो संगीत अच्छा ही लगे 
कई बार यूं भी होता है 
जब मन उस संगीत से परेशान हो कानों पर हाथ रखकर  
उसे अनसुना कर देना चाहता है 
मगर प्रकृति ने कब किसकी सुनी है 
वो तो उस साथी की तरह है जो हमें कभी अकेला नहीं छोड़ती 
चाहे ग़म हो या खुशी, हम चाहें या ना चाहे, 
एक वही तो है जो पल-पल साथ निभाती चलती है ज़िंदगी का,
कभी महसूस किया है क्या 
अकेली सड़क पर साथ चलने वाले पेड़ों, रास्तों, पगडंडियों 
और आकाश के साथ-साथ आते जाते वाहनों की आवाजाही
 फिर भी दूर तलक फैली खामोशी 
जिसमें सिर्फ सुनाई देती है गिरती हुई बारिश की पदचाप
जैसे कोई साथ साथ चल रहा हो हमारे 
मगर जब मुड़कर देखो तो दूर तक कोई नज़र नहीं आता  
लेकिन फिर भी मुझे वो यह एहसास दिलाती है।
ज़िंदगी एक ख़मोश सफर नहीं 
क्यूंकि मैं हूँ तुम्हारे साथ अब भी और तुम्हारे बाद भी 
तुम्हारे अपनों का ख़्याल रखने के लिए.... 

Saturday, 9 March 2013

नारी मन....


यूं तो कहने को महिला दिवस है
लेकिन क्या फायदा ऐसे दिवस का जो महज़ कहने को आता है
और आकर यूं ही चला जाता है
ना नारी ही नारी का सम्मान करती है यहाँ
और न ही पुरुष ही करता है
सब भक्षण ही करना चाहते है
कोई संरक्षण करना नहीं चाहता कभी
वैसे तो मैं, अर्थात मैं नारी अपने आप में ही सम्पूर्ण हूँ
इतनी सम्पूर्ण कि मैं अगर चाहूँ तो एक ही झटके में बदल सकती हूँ
इस संसार का भूत, भविष्य और वर्तमान
मगर करती नहीं हूँ मैं ऐसा
क्या करूँ आदत से मजबूर हूँ ना,
इसलिए सदा खुद से पहले तुम्हारे बारे में सोचती हूँ
तुम खुश रहो और सफलता के साथ-साथ एक स्वस्थ एवं दीर्घ आयु जियो
बस यही एक कामना तो किया करती हूँ मैं दिन रात
मगर यह क्या
तुम ने तो मेरे इस रूप को, मेरी कमजोरी समझ लिया
हे नादान पुरुष तुम क्यूँ भूल गए जिस से तुम जन्में हो
वो अगर तुम्हें जन्म देकर तुम्हारा भरण, पोषण और रक्षण कर सकती है
तो वक्त आने पर वही तुम्हारा भक्षण भी कर सकती है
मत भूलो जो मौन है वो कमजोर नहीं
इसलिए किसी को इतना भी मत सताओ और न झुकाओ
कि विपरीत वार में वो तुम्हें कहीं का ना छोड़े
और तुम आसमान से गिरे खजूर में अटके की भांति
धरती पर पड़े क्षत विक्षत नज़र आओ
शुक्र करो कि मैंने छोड़ी नहीं है, अब तक अपनी कुछ आदतें
कि अब भी एक उम्मीद बाकी है मेरे मन में तुम्हारे प्रति
क्यूंकि जन्म से तो कोई बुरा नहीं होता 
न स्त्री, न पुरुष
यह तो वक्त और हालात हैं, जो इंसान को नासमझ बना दिया करते है
इसलिए शायद नारी भी स्वयं नारी की दुश्मन हो जाती है कभी-कभी  
लेकिन नादानी तो सभी से हो सकती है 
क्यूंकि हम इंसान तो है ही
गलतियों का पुतला
मगर वो कहते हैं न गलतियाँ माफ की जा सकती है
मगर गुनाह नहीं,
इसलिए मेरे चेहरे की सोम्यता और शांति की परीक्षा न लो  
क्यूंकि शांति हमेशा संतोष नहीं देती
कई बार वही शांति तूफान से पहले की शांति का रूप भी हो सकती है...

Tuesday, 29 January 2013

न जाने माँ इतनी हिम्मत हर रोज़ कहाँ से लाती है....

न जाने माँ इतनी हिम्मत रोज़ कहाँ से लाती है
के हों कितने ही गम पर वो सदा मुसकुराती है
हर रोज़ कड़ी धूप के बाद चूल्हे की आग में तपती  है
मगर सुबह खिले गुलाब सी नज़र आती है
न जाने माँ इतनी हिम्मत हर रोज़ कहाँ से लाती है

खुद पानी पीकर गुज़र करती है, मगर हमें खिला के सुलाती है
अगर न हो घर में कुछ तो रुई के फ़ाहे को घी का नाम दे बच्चों को बहलाती है
खुद भूखे पेट सोकर भी वो हमे खिलाती है
न जाने माँ इतनी हिम्मत हर रोज़ कहाँ से लाती है

अंदर ही अंदर कोयले सी सुलगती-जलती है
मगर हर बार ठंडी फुहार सी नज़र आती है
जो हमेशा केवल प्यार बरसाती है
जो गम और खुशी में सदा ही मुसकाती है
न जाने माँ इतनी हिम्मत हर रोज़ कहाँ से लाती है

यूं  तो रोज़ देती है हौंसला मगर खुद अंदर ही अंदर घुली जाती है
मगर पिता और परिवार के समीप एक सशक्त ढाल सी नज़र आती है
आज भी थामकर उंगली वो सही राह दिखा जाती है
इसलिए शायद जीवन की पाठशाला का पहला सबक केवल माँ ही पढ़ती है
न जाने माँ इतनी हिम्मत हर रोज़ कहाँ से लाती है....      

Sunday, 20 January 2013

लो बीत गया फिर, एक और साल ....

लो हर बार की तरह बीत गया एक और साल,
फिर एक बार आया है नया साल 
मगर 
कुछ भी तो नहीं बदला मेरी ज़िंदगी में, नया जैसा तो कुछ हुआ ही नहीं कभी,
यूं लगता है जैसे 
बस एक वही साल आकर ठहर सा गया है, मेरी ज़िंदगी में कहीं
कि जिसमें हम मिले थे कभी
तब से अटकी हूँ मैं बस उसी एक साल में, पता है क्यूँ ?
क्यूंकि उस एक साल में ही कुदरत ने जैसे मुझे
ज़िंदगी के सारे मौसम एक साथ ही दे दिये थे, ताउम्र गुज़ारने के लिए,
लेकिन देखो न, केवल पतझड़ को छोड़कर
मेरा साथ किसी मौसम ने दिया ही नहीं कि आज भी
हम राही बन साथ है वो मेरे,
साथी मेरे 
प्यार का भी क्या कमाल मौसम होता है न,
कि गुलाब ही नहीं, बल्कि जंगली फूल तक खूबसूरत नज़र आने लगते है
अधरों पर नित नये गीत स्वतः ही सजने लगते है
ज़िंदगी इतनी खूबसूरत सी नज़र आती है कि जैसे 'जन्नत' अगर कहीं है
तो बस वह यहीं है 
मगर किसे पता होता है कि ज़िंदगी के यह चार पल 
किसी जादुई फरेब से कम नहीं होते 
जैसे किसी जादूगर ने अपने जादू से एक खूबसूरत दुनिया का निर्माण किया  
और हकीकत से सामना होते ही जैसे प्यार का सारा जादू छू सा हो जाता है
और हम अचानक ही आ गिरते हैं हकीकत के धरातल पर
जैसे मुझ संग तुम्हारा प्यार
और बस गुनगुनाते रह जाते यह गीत के
प्यार के लिए, चार पल कम नहीं थे, कभी तुम नहीं थे कभी हम नहीं थे .....:)
     

Saturday, 5 January 2013

रेत सा रिश्ता ...


क्यूँ रिश्ता मुझसे अपना तुमने रेत सा बनाया 
क्यूँ आते हो तुम लौट-लौटकर मेरी ज़िंदगी में गये मौसम की तरह 
जानते हो ना, कभी-कभी खुश गवार मौसम भी जब लौटकर आता है 
तो कुछ शुष्क हवायें भी अपने साथ लाता है 
जो लहू लुहान कर दिया करती है न सिर्फ तन बल्कि मन भी  
और तब तो तुम्हारे प्यार की यादों का 
कोमल एहसास भी भर नहीं पाता उन ज़ख़्मों को 
 तब ऐसा महसूस होता है मुझे, जैसे तुमने ही ठग लिया है मुझे
मानो  
 मैं स्तब्ध सी खड़ी हूँ और कोई आकर मेरा सब कुछ लिये जा रहा है मेरे हाथों से 
खुदको इतना जड़ हताश और निराश आज से पहले कभी नहीं पाया मैंने
शायद इसलिए तुमसे बिछड्ने के ग़म ने ही मुझे बेजान सा कर दिया है
की एक खामोशी सी पसरा गयी है मेरे अंतस में
मगर यह कैसी विडम्बना है हमारे प्यार की
कि मुझे इतना भी अधिकार नहीं  
 कि मैं रोक सकूँ उसे   
यह कहकर कि रुको यह तुम्हारा नहीं, जिसे तुम लिये जा रहे हो अपने साथ  
क्यूंकि सच तो यह है कि अब तो मुझसे पहले उसका अधिकार है तुम पर
तुम तो अब मेरी यादों में भी उसकी अमानत बनकर आते हो 
तो किस हक से कुछ भी कहूँ उससे    
इसलिए खड़ी हूँ पत्थर की मूरत बन यूँ ही, अपने हाथों की हथेलियों को खोले 
और वो लिये जा रहा है मेरा सर्वस्व,
यूँ लग रहा है मुझे, जैसे तुम रेत बनकर फिसल रहे हो मेरे हाथों से 
और वो मुझे चिढ़ाता हुआ सा लिए जा रहा है तुमको अपने साथ  
मुझ से दूर बहुत दूर....
फिर कभी न मिलने के लिये   
यह कहते हुए कि मेरे रहते भला तुमने ऐसा सोच भी कैसे
 कि यह तुम्हारा हो सकता है  
तुम से पहले अब  
यह तो मेरा है, मेरा था, और मेरा ही रहेगा हमेशा.... 

Friday, 14 December 2012

एहसास


कभी कभी यह ज़िंदगी इतनी तन्हा लगती है की जैसे इसे किसी की आरज़ू ही नहीं
यूं लगता है कि जैसे किसी को मेरी जरूरत ही नहीं
न दोस्तों के पास समय है ना अपनों के पास कोई विषय, बात करने के लिए
सब अपनी ही दुनिया में मस्त है किसी को किसी की जरूरत ही नहीं
ढलते हुए सूरज की लालिमा के साथ तन्हा होने का एक अंधकार सा पसर जाता है
मन के किसी कोने में कहीं, और यकायक यह एहसास होने लगता है
जैसे समय का चक्र पल-पल कोई न कोई परीक्षा ले रहा हो मेरी
जिसमें न कोई आस है, ना प्यास है,गर कुछ है तो वो है मैं और मेरी तनहाई
यूं तो इस भागती दौड़ती ज़िंदगी में कभी-कभी तनहाई भी अपनी सी लगती है
मगर कभी-कभी खुद को इस कदर तन्हा पाती हूँ मैं 
कि यूं लगता है कि किसी को मेरी जरूरत ही नहीं,
यूं तो तुम्हारे साथ होते हुए भी कई बार खुद को तन्हा महसूस किया है मैंने
क्यूंकि न जाने क्यूँ एक औपचारिक सा भाव है या स्वभाव है तुम्हारी बातों में 
मगर अपने पन का वो खिचाव नहीं,
जिसकी तलाश में शायद ना जाने कितने ही घुमावदार रस्तों पर भटकता है मन
आतित की परछाइयों का पीछा करते हुए वापस 
उस दौर में लौट जाने को व्याकुल हो उठता है मन 
जहां तनहाई के लिए वक्त ही नहीं था मेरे पास, कि यह सोच भी सकूँ मैं, 
कि क्या होता है तन्हा होना लेकिन फिर तालश वही आकर ख़त्म होती है मेरी, 
जहां से चले थे हम कदम दर कदम एक-एक करके सात वादों के साथ
शायद इसलिए तुम्हारे आने का इंतज़ार रहा करता है मेरी रूह में कहीं,
क्यूंकि जब साथ होते हो तुम तो गुज़र ही जाती है इस ज़िंदगी की हर एक श्याम
लेकिन जब साथ नहीं होते तुम तो खुद को और भी तन्हा पाती हूँ मैं,
और धीमे-धीमें सुलगा करता है मेरा मन, एक जलती हुई अगरबत्ती की तरह
क्यूंकि यूं तो साथ होते हुए भी तन्हा हुआ जा सकता है मेरे हमदम, मगर  
बशर्ते कि जिसके साथ आप हैं उसे तनहाई की हिफाजत करने का हुनर आता हो
तो क्या हुआ अगर तुम्हें अपनेपन का एहसास दिलाना 
या मेरे प्रति अपना प्यार जताना नहीं आता
बहुत से ऐसे लोग हैं इस दुनिया में जिन्हें प्यार तो है मगर प्यार जताना नहीं आता   
बावजूद इसके, बहुत अच्छे से जानती हूँ मैं,कि प्यार तुमको भी है, प्यार हमको भी है,
और सोचो तो ज़रा वो प्यार ही क्या जिसे महसूस करवाना पड़े,या जताना पड़े
वो भला प्यार कहाँ रहा, वो तो दिखावा हुआ प्यार नहीं,
प्यार तो बिन कहे, बिन बोले ही समझने वाला और रूह से महसूस करने वाला एहसास है ना
इसलिए शायद अब भी, नदी के दो किनारे से स्वभाव के बावजूद भी,
एक ही छत के नीचे जी पा रहे हैं हम क्यूंकि स्वभाव भले ही न मिले हों कभी हमारे एक दूजे से
मगर प्यार होने का एक एहसास ही काफी है, ज़िंदगी गुज़ार देने के लिए ....  

Friday, 16 November 2012

कसक ....

यूं तो हूँ मैं तुमसे जन्मी हूँ माँ 
मगर तुमने मुझे कभी अपना समझा ही नहीं माँ 
क्या सिर्फ इसलिए कि मैं एक लड़की थी 
या मेरा रंग ज़रा काला था
या फिर  
मेरी त्वचा ज़रा जरूरत से ज्यादा ही रूखी सुखी सी थी 
दिखने में शायद बहुत कुरूप थी मैं उस वक्त 
लेकिन क्या यह सब कारण एक माँ की ममता को 
अपने ही बच्चे के प्रति जो लगाव रहा करता है 
उसे कम करने में सक्षम है?
जो तुमने मेरा पल पल तिरस्कार किया 
मुझे अपनी बेटी कहने से इंकार किया 
यहाँ तक कि तुमने तो अपने पति, यानि मेरे पिता तक को 
जाने अंजाने अपमानित किया 
यह कह -कहकर कि यह मेरी बेटी नहीं 
यह तो अपने पिता की संतान है
इसलिए उन्हीं पर गया है, इसका रंग रूप

मेरा तो सिर्फ बेटा है 
जो मेरे जैसा दिखता है गोरा चिट्टा  
बल्कि मुझे जैसा ही सोचता भी है
लेकिन इस सब के बावजूद भी मुझे गर्व है माँ 
इस बात पर कि मैं अपने पिता की बेटी हूँ
 जो देखने में भले ही एक साधारण से आम इंसान है  
मगर वासत्व में एक बेहद नेक दिल इंसान भी हैं
जो इस दुनिया में बहुत कम पाये जाते हैं  
तो क्या हुआ जो उनका रंग काला है और मेरा भी 
तो क्या हुआ अगर उनकी त्वचा भी 
मेरी त्वचा कि तरह खराब है 
तो क्या हुआ जो वह एक फिल्मी हीरो कि तरह 
 अपने मन की बातें आपसे कभी जाहिर नहीं कर पाते
मगर इतने सालों में साथ रहते 
एहसास तो हुआ होगा आपको भी, कि वो कहें भले ही नहीं 

लेकिन कदर ही नहीं बल्कि प्यार भी करते हैं वो आपको 
मगर आपने मेरी तरह शायद उन्हें भी कभी अपना समझा ही नहीं 
इसलिए शायद आपने दुनिया की रीत के आगे 
 सिर्फ अपना फर्ज़ निभाय हैं 
प्यार नहीं किया कभी उनसे 
और न ही मुझसे 
क्यूँ माँ क्यूँ 
क्या दिखावा ही ज़िंदगी में सब कुछ है 
क्या वास्तविकता के कोई मायने नहीं ?
नहीं!!! कम से कम मेरी ज़िंदगी में तो यह बात सच नहीं 
क्यूंकि मेरे जीवन की वास्तविकता तो यह है कि  
इतना कुछ होने के बावजूद भी मुझे आज भी बहुत बुरा लगता है 
जब तुम किसी भी बात पर मुझे खुद से अलग करते हुए भईया का पक्ष लेती हो 
और यह कहती हो कि वो मेरे जैसा है 
और मैं अपने पिता जैसी हूँ 
फिर भले ही वो कोई हंसी मज़ाक कि ही बात क्यूँ न हो 
सच तो यह है माँ कि मैं और पापा आज भी आप से बहुत प्यार करते है 
और आपसे जुड़े रहना चाहते हैं 
बातों में भी और वास्तव में भी 
इसलिए कम से कम अब तो इस रंग भेद और बेटे बेटी के भेद को छोड़ो माँ 
और एक बार कह दो कि हाँ हमारी बेटी भी मेरे जैसी ही है। 
तो मेरे दिल को भी एक बार सूकून आजाये .....          

Monday, 5 November 2012

सफर ज़िंदगी का ....


एक लंबी सड़क सी ज़िंदगी 
एक ऐसी सड़क 
जिसे तलाश है अपनी मंज़िल की 
वो सड़क जिसे अपने आप में ऐसा लगता है कि 
कभी तो खत्म होगा यह सफर ज़िंदगी का 
कभी तो मिलेगी मंज़िल 
मगर वक्त का पहिया हरपल यह एहसास दिलाया करता है कि 
एक बार जो चला जाऊन मैं  
तो लौटकर फिर कभी वापस नहीं आता 
पर क्या यही सच्चाई है ? 
नहीं मुझे तो ऐसा नहीं लगता 
ज़िंदगी की सड़कें भले ही कितनी भी लम्बी क्यूँ न हो 
मगर उस सफर के रास्ते में 
उस एक ज़िंदगी के न जाने कितने चक्र 
वक्त के साथ गतिमान रहते हुए घूमते रहते है 
और 
उन चक्रों में गया वक्त भी लौट-लौटकर आता रहता है 
क्यूंकि शायद ज़िंदगी कुछ भी अधूरा नहीं छोड़ती  
उस अंतिम वक्त में भी नहीं  
भले ही यह एहसास क्यूँ न हो सभी के मन के अंदर 
कि अभी तो बहुत से काम बाकी है 
बहुत सी जिम्मेदारियाँ निभाना बाकी है 
अभी अपने लिए तो जिया ही नहीं हमने 
अभी तो उस विषय में सोचना तक बाकी है  
मगर वास्तविकता तो कुछ और ही होती है 
जीवन का लालची इंसान 
जीवन पाने के चाह में ही पूरी ज़िंदगी बिता दिया करता है 
मगर यह नहीं सोच पाता कभी 
की ज़िंदगी अपना चक्र किसी न किसी रूप में पूरा कर ही लेती है 
कुछ अधूरा नहीं छूटता कभी, 
शायद इसी के आधार पर 
ऊपर वाला तय करता है सभी की मृत्यु 
क्यूंकि उसने तो पहले से ही सब तय कर रखा है 
कब, कहाँ, कैसे क्यूँ और किसका इस रंगमंच रूपी संसार से पर्दा उठेगा
और  
एक बार फिर पूरा होगा सफर ज़िंदगी का ......

Friday, 5 October 2012

बदलाव


कभी कहीं पढ़ा था कि बारिश में इन्द्र धनुष के रंग ही तो बरसते है
वरना यूं तो सारी धरती रंग हीन ही नज़र आती है
सच ही तो है,
ज़िंदगी का भी तो कुछ ऐसा ही फलसफ़ा है
आखिर बदलाव ही तो दूसरा नाम है ज़िंदगी का
जो कभी एक सी ना रहकर, हर पल बदलती रहती है
कभी बहा करती है किसी नदी की तरह
तो कभी बहती हवा सी ज़िंदगी,
शायद इसलिए
आज ज़िंदगी के जिस मोड पर मैं खड़ी हूँ
वहाँ से देखो तो सब कुछ बदल चुका है
यहाँ तक के ज़िंदगी के पहले पड़ाव का मंज़र भी,
जिसमें बेटी बनकर जन्म लिया तो
बड़े होते ही मेरे घर के साथ-साथ,
मेरा परिवार ही नहीं,
मेरा नाम तक बदल दिया,
मगर शायद यही काफी न था किस्मत को मेरी
की समय ने फिर करवट ली
पहले तो सिर्फ मेरा शहर ही बदला था
मगर अब तो मेरा देश भी बदल गया
आगे और भी नजाने क्या-क्या बदलना बाकी है
न जाने कितनी शह और मात बाकी हैं
जाने कितनी बारिशों में अब भी मेरे कुछ जज़्बात धुलने बाकी है
गुजरते वक़्त के साथ ऐसा लगा
जैसे ज़िंदगी के चलचित्र पर कोई दृश्य बदल गया
अपना तो अब भी यह आलम है ए खुदा गुज़र रही यूं ज़िंदगी कुछ इस तरह
की तेरे मिलने की आस और तेरे मिलने की प्यास मुझ में अब भी बाकी है ...
.
पल्लवी....          

Wednesday, 26 September 2012

यादों की इमारत

यूं तो आज तुमसे मिले बिछड़े कई साल होने को आए 
मगर आज भी ऐसा लगता है 
जैसे आज की ही बात हो 
यूं होने को तो बात तुमसे आज भी होती है, रोज़ 
जब कभी भी मैं तन्हा होती हूँ 
उस वक्त तुमसे बात क्या 
मैं तो तुम्हें देख भी सकती हूँ और छू भी सकती हूँ 
क्यूंकि तुम कोई मेरा गुज़रा हुआ कल नहीं हो  
बल्कि मेरे अंदर का एहसास हो
जिसे सिर्फ मैं ही महसूस कर सकती हूँ
क्यूंकि एहसास कभी मरा नहीं करते  
लेकिन फिर भी नजाने क्यूँ
तुम्हारे इतने करीब होते हुए भी 
मेरे मन के अंदर तुमसे कहने वाली बहुत सी बातें है 
जो परत-दर-परत मेरी दिल की दीवारों पर हर रोज़ 
किसी रंग की भांति चढ़ती जाती हैं 
शायद यह सोचकर की कभी तो मिलोगे तुम, 
तब सब कहूँगी तुमसे 
एक-एक बात बताऊँगी तुम्हें 
और तब तुम्हें दिखाऊँगी मैं अपने दिल के वो बात रूपी सारे रंग 
जो शायद मैं तुम से मिलने की आस में, 
अपने दिल पर बस चढ़ती गयी थी  
जो आज एक दीवार पर पड़ी किसी रंग की एक पपड़ी के रूप में 
तुम्हारे सामने गिरने को आतुर है 
मगर सुनो डर भी बहुत लगता है मुझे, कहीं ऐसा न हो 
की तुम लौटकर वापस ही ना आओ, या हम अब कभी मिल ही ना पायें 
तो फिर क्या होगा, तब कहीं ऐसा न हो की  
यह दीवार पर पड़ी कई परतों से बनी एक पपड़ी दीवार समेत ही गिर जाये
और शेष रह जाये महज़ वो खाली खंडहर 
जो कभी तुम्हारी यादों से सजी एक खूबसूरत इमारत हुआ करती था ....  
   
  

Friday, 14 September 2012

चाहत


यूं तो ज़िंदगी ने बहुत कुछ दिया है हमें 
इसलिए तो आज सभी ने दिलोजान से चाहा है हमें  
यह मेरी ज़िंदगी का दिया हुआ कोई तौहफा ही है जो आज   
 तूने भी अपने गले से लगाया है हमें,
यही काफी न था शायद चाहत के लिए उनकी 
इसलिए उन्होने अपने सपनों में बसाया है हमें  
वरना यूं तो ना जाने कितनी आँखों ने ख्वाबों में देखा है हमें 
यह और बात है कि हम ही न कर सके मुहब्बत 
किसी ओर से तुझे चाहने के बाद
वरना इस मुहब्बत में अपने कदमो तले तो बहुतों को झुकया है हमने 
हैं नतीजा शायद इस बात का यही के 
उनके पहलू में है आज प्यार तो क्या, हमारे भी दामन में आज आग सही
कि अब तो बस गुज़र रही है ज़िंदगी यूं ही 
ए-खुदा की चाहतों का हुजूम होते हुए भी अब इस दिल को 
किसी की कोई,ख्वाइश ही नहीं 
क्यूंकि बस एक तेरी याद ही काफी है 
हमें एहसास ए मुहब्बत याद दिलाने के लिए कि जिसमें
तेरे होते हुए भी बस एक तेरी चाहत ही नहीं 
अगर कुछ है तो वो   
सौ दर्द हैं....सौ राहतें....सब मिला....हम नशीन..एक तू ही नहीं ..... 

Monday, 3 September 2012

प्यार का एक गीत...


सागर किनारे साहिल की रेत पर 
न जाने कितनी बार लिखा मैंने तुम्हारा नाम 
मगर हर बार उसे कोई न कोई सगार की लहर आकर मिटा गयी 
मगर मैंने हार ना मानी कभी, मैं हर बार लिखती गयी और वो हर बार मिटाती गयी 
उसी तरह तुमने भी शायद मेरे नाम को 
अपने ज़ेहन से मिटाने की एक नाकाम कोशिश की है 
मगर यह कोई उस साहिल की रेत पर लिखे नाम की  तरह  
 लिखा गया प्यार का पैगाम नहीं कि   
जिसे समंदर की कोई भी लेहर ,जब चाहे आकर अपने आग़ोश में लेले 
बल्कि यह तो तुम्हारे दिल के कागज़ पर वक्त की कलम से लिखा गया
 मेरी मुहब्बत का पैगाम है जिसे इस ज़माने के सागर की 
कोई भी बगावत रूपी लेहर आकर 
यूं हीं नहीं मिटा सकती कभी 
जानते हो क्यूँ ,क्यूंकि हर लेहर का साहिल से एक नाता होता है 
इसलिए तो लेहरें भी गए वक्त की तरह  लौट-लौट कर वापस आती है 
उसी साहिल को छूकर बार-बार महसूस करने के लिए
हाँ मैंने खुद भी महसूस किया है 
उन लहरों के आवेग में भी छिपा हुआ संगीत
तेरे मेरे प्यार का एक गीत की   
 तेरा मुझसे है, पहले का नाता कोई 
यूं हीं नहीं दिल लुभाता कोई 
जाने तू ....या ....जाने ना .....माने तू ...या ...माने ना .....       

Wednesday, 22 August 2012

सूर्यास्त और मेरा मन...


कभी यूं भी होता है कि 
अक्सर किसी नदी किनारे शाम के वक्त
उस नदी के निर्मल जल में पैरों को डालकर बैठना
मुझे बहुत अच्छा लगता है
न सिर्फ बैठना बल्कि
घर लौटते हुए परिंदो के करलव के साथ   
 देखना उस सूर्य को अस्त होते हुए,
ना जाने क्यूँ उस अस्त हुए सूर्य को देख  
अठखेलियाँ करता है मेरा मन
बिलकुल उसी सूर्य की आठखेलियों की भांति 
 जैसे वह सूर्य बदलता है अपना रंग 
उस आकाश गंगा में नहा कर 
खुद को शीतल करने के लिए,
..................................................................................................................................
उस वक्त बिखर जाते हैं
उस विशाल आकाश गंगा में भी नजाने कितने ही रंग 
कभी सिलेटी, तो कभी नीला, तो कभी गुलाबी सा मोहक रंग 
तब उन रंगों को देखकर  
मेरे मन के अंदर भी बिखर जाते है   
भांति-भांति के रंग,
कभी एक मुस्कुराहट, तो कभी आँखों में नमी
कभी क्रोध की ज्वाला, तो कभी आत्म संतुष्टि का भाव  
ठीक वैसे ही 
जैसे आकाश गंगा में अस्त होता हुआ सूर्य कई रंग बदलता  है,
उस वक्त ऐसा प्रतीत होता है मानो ,
जैसे यह आकाशा गंगा का रंग नही,
यह रंग है हमारी ज़िंदगी का,
क्यूंकि हमारी ज़िंदगी भी तो,
एक नदी के प्रवाह की तरह ही बहती चलती है,
शुरुआत में एक अबोध शिशु जैसी 
निर्मल, कोमल, निश्छल
लेकिन समय की एक हलचल    
हमारी ज़िंदगी की नदी को 
एक नयी दिशा देने में सक्षम सिद्ध होती है 
और उस हलचल में हिचकोले खाता हमारा अस्तित्व  
कभी वियोग, कभी मिलाप, या कभी विछोह का संताप 
सहते हुए बस डूबता उभरता रहता है 
और एक दिन यह ज़िंदगी की नदी भी  
जा मिलती है उस सागर में 
जहां से फिर कभी कोई वापस नहीं आता....

Thursday, 12 July 2012

ख़्यालों की दुनियाँ ...


दिन भर की भागा दौड़ी और किसी न किसी काम में उलझे रहने के कारण 
जब रात को थक कर जा लेटता है यह शरीर 
तब अक्सर वो मन के जागने का समय होता है 
उस वक्त जाने कैसे सारा दिन की थकान के बाद भी 
शरीर भले ही शिथिल सा निढाल हो जाये 
मगर मन, उसको तो जैसे उसी वक्त रात का आकाश मिलता है 
खुल कर ख़्यालों में उड़ने के लिए 
उनींदी सी आंखे जब अंधेरे कमरे में सफ़ेद छत को निहाराते हुए 
 सारे दिन का लेखा जोखा सोच रही होती है
तब बीच-बीच में उसी छत पर पड़ता बाहरी वाहनों का प्रकाश 
सहसा ऐसा महसूस होने लगता है 
जैसे सूने पड़े मरुस्थल से जीवन रूपी पौधे पर ऊर्जा के कुछ छींटे 
जो सूने जीवन के पौधे को थोड़ी ऊर्जा दे जाते है 
कि कहीं वो मर ही न जाये 
तब एक वक्त ऐसा भी आता है 
जब उस सोच का भार उठाती पलकें बंद होने को मजबूर हो जाती है
और तब जैसे अचानक वक्त एक बच्चे की तरह 
भागकर इस सुबह से रात तक के सफर की यह दौड़ जीत लेता है
और झट से सुबह हो जाती है  
जैसे न जाने कब से उसे बस इस ही एक पल का इंतज़ार हो 
कि कब यह पलकें बंद हो
और कब वो दौड़कर रोज़ की भांति यह रात से सुबह तक की होड़ जीत ले  
वास्तव में होता भी यही है, 
हर रोज़ घड़ी के अलार्म सी बजती घंटी
 जब सुबह-सवरे मुझे हड़बड़ाहट से जगाती है 
तब अक्सर मन में यह ख़्याल आता है
कि स्मृतियाँ रात भर नींद को धुनती रहती है 
और सुबह तक तैयार कर देती है नए सिरे से इंतज़ार की एक नयी रेशमी चादर 
शायद जीना इसी का नाम है ....  

Tuesday, 3 July 2012

क्या है पहचान एक औरत की "सागर या धरती"....?

कब तक तुम अपनी चाहत का वास्ता दे-देकर
अपने प्यार का यह रंग चढ़ाते रहोगे मुझ पर...कब तक ?
आखिर क्यूँ, किस लिए दिखाते हो तुम मुझे अपने प्यार का यह रंग, यह हक 
क्या सिर्फ इसलिए कि हमने प्यार किया है 
क्या सिर्फ इसलिए हक की बात किया करते हो तुम हर रात
मगर सच तो यह है कि प्यार में कोई शर्त नहीं होती.....
लेकिन बावजूद इसके शायद यह प्यार ही है,
कि तुम्हारी कही हर बात का कितना अक्षरसः पालन करती हूँ मैं 
यह तो तुम्हें भी पता होगा, लेकिन अवहेलना ना कर पाना भी उस ही हक का परिणाम है    
जिसके कारण जाने कैसे मेरी रूह तक, सागर किनारे पड़ी रेत की तरह
सब कुछ अपने अंतस में सोखती चली जाती है।
  
जाने क्यूँ लोग नारी जीवन की तुलना धरती से किया करते है
मैं तो इस जीवन की तुलना सागर से करना चाहूंगी
जो बिना कोई उफ़्फ़ तक किए सब कुछ अपने अंदर सोखता चला जाता है
न जाने कितनी जिन्दगानियाँ समा चुकी है अब तक इस सागर में
मगर सागर तब भी ऊपर से कितना शांत नज़र आता है...
जबकि उसके अंतस में न जाने कितनी अतृप्त आत्माओं की आवाज़ें शोर मचाती होंगी
तब भी ऐसी दिल चीर देने वाली आवाज़ों को अपने अंदर समेटे हुए भी 
वह ऊपर से कितना शांत दिखाई देता है  
और क्यूँ ना देखे जिसके पास खारे पानी की कमी नहीं
उसके आँसू या उसके संतापों की पराकाष्ठा भला किसी साधारण से इंसान को कैसे नज़र आयेगी...

देखना एक दिन उसी सागर की तरह मैं भी शांत नज़र आऊँगी
जिस दिन अति हो जाएगी उस सागर के धैर्य की
उस दिन तुम देखना, उस सागर के अंदर का कोलाहल एक ऐसा तूफान ले आयेगा
की सारी धरती जल मग्न हो जाएगी, उस दिन ही शायद प्रलय आयेगी
तब न यह धारती, धरती नहीं रहेगी, वह खुद सागर कह लाएगी.....     

Tuesday, 26 June 2012

ज़रा सोच ओ बंदे ...


यूं तो ज़िंदगी हर लम्हा, हर पल करवटें बदलती ही रहती है  
जिसकी एक करवट कभी रातों का जागरण दे जाती है 
तो कभी उस ही ज़िंदगी की दूसरी करवट पर सुकून की नींद आ जाती है 
और तब उस मीठी नींद से जागने का कभी मन नहीं होता
बिलकुल किसी हसीन ख़्वाब की तरह.....

तो कभी सागर की लहरों सी मुसकुराती है ज़िंदगी
किसी बच्चे के जन्म की तरह 
किसी बंजर ज़मीन पर फूटे किसी बीज की तरह 
एक लंबे अंधकार के बाद मिली किसी रोशनी की तरह 
किसी थके हुए मुसाफिर को मिली ऊर्जा की तरह.....

जैसे किसी समंदर की कोई ठंडी सी लहर    
तपती हुई धूप में जल रहे किसी मुसाफिर को 
अचानक से आकर ठंडक दे जाती है
बेटियाँ भी तो वही ठंडी सी लहर की तरह ही होती है। है ना !!! 
जो संतान पाने के ताप में जल रहे अपने अभिभावकों को 
मातृ-पितृ के अनुपम रिश्ते से भिगो देती है  
यानि कहीं न कहीं प्रकृति अपने आप में संतुलित और संतुष्ट नज़र आती है।
.....................................................................................................................................
तो हम क्यूँ उस लहर की ठंडक का आनंद नहीं ले पाते 
क्यूँ उस लहर को आने से पहले ही रोक दिया जाता है,  
उस सागर पर बांध बनाकर, जिस बांध के कारण कमजोर होता सागर 
फिर कभी दे ही नहीं पाता कोई ठंडी लहर रूपी बेटी, न बेटे नुमा तूफान  
तो फिर क्यूँ.....
 हे मनुष्य तू इतना व्याकुल रहा करता है तू सदा 
क्यूँ तुझे स्वीकार नहीं उस ईश्वर के आशीर्वाद रूप में मिली एक सुंदर कन्या 
तुझे तो गर्वान्वित होना चाहिए 
कि तेरे घर एक स्वस्थ बेटी ने जन्म लिया और तुझे पिता कहलाने का सम्मान दिया
ज़रा सोच अगर तुझे बेटा न बेटी,जो कुछ भी ना होता 
जो होता भी, मगर यदि कोई विकृति साथ होती उसके, 
तो क्या तब भी तू खुश होता? 
नहीं क्यूंकि खुश होना तेरी फितरत में ही नहीं
तू तब भी था रोता, तू अब भी है रोता
ज़रा सोच ओ बंदे जो यह भी न होता और वो भी न होता 
तो तेरा क्या होता 
इसलिए जो मिला है उसे ईश्वर का आशीर्वाद और अनुकंपा मान 
और आभार प्रकट कर, कि तुझे एक स्वस्थ संतान तो मिली।
वरना आज भी बहुतों को प्यास है उस एक ठंडी सी लहर के जरिये खुद को भिगो देने की ....    
  

       

Wednesday, 20 June 2012

उम्मीद...


सुबह की पहली किरण के मेरे कक्ष में पदार्पण के साथ ही उदय होता है 
मेरी उम्मीदों का सूरज भी मेरे मन के किसी कोने में कहीं 
उस पर दूर मंदिर से आती शंख नाद और मंत्र उच्चारण की सुमधुर ध्वनि
जिन्हें सुनते ही ही मेरे कदम स्वतः ही चल पड़ते है 
एक आस और उम्मीद का दामन थामे उस मंदिर की ओर 
कि शायद आज कोई चमत्कार हो जाये  
शायद आज मेरी तुम से मुलाक़ात हो जाये
मगर यूं कहाँ होते हैं चमत्कार किसी के साथ जो मेरे साथ होंगे
मगर यह मन है कि उम्मीद का दामन छोड़ता ही नहीं 
कि अब तो उस ईश्वर के सामने भी 
तुम से मिलवाने कि मन्नते करते-करते थक चुका है मेरा मन,
अब तो उस परम पिता परमेश्वर से भी 
पिया मिलन की आस को कहने में मुझे शर्म से आने लगी है
कहाँ हो तुम ?
हर रोज़ बस एक यही प्रश्न मन में लिए 
बोझल कदमों से चलकर लौटकर चली आती हूँ मैं अपने घर,
जो अभी घर बना नहीं, अभी तो बस मकान ही है
क्यूंकि घर शब्द में तो जैसे आत्मा बस्ती है 
और मकान एक बेजान मृत शरीर सा सुनाई देता है 
इसलिए शायद उसे भी मेरी तरह इंतज़ार है
नहीं उम्मीद है शायद  
एक दिन मकान से घर बन जाने का ....        

Wednesday, 13 June 2012

इश्क़ बनाम दिमाग का लोचा ...

कितना कुछ छुपा है न इस एक शब्द में, नहीं ? कहने को नफरत को भी प्यार से जीता जा सकता है इसलिए शायद यह कहावत बनी होगी कि, "प्यार और जंग में सब जाएज़ है" अर्थात जब कोई इंसान प्यार में होता है, तो वो सही या गलत नहीं होता सिर्फ प्यार होता है मगर कमाल की बात तो यह है कि एक तरफ जहां उपरोक्त कहवात का प्रयोग किया जाता है वहीं दूसरी ओर यह भी कहा जाता है, कि प्यार हमेशा उसे करो जो तुमको प्यार करे न कि उससे जिसे तुम प्यार करो,..तो कहीं कुछ लोग यह भी कहते हैं की "ज़िंदगी में हर इंसान को एक बार प्यार ज़रूर करना चाहिए क्यूंकि प्यार इंसान को बहुत अच्छा बना देता है" अर्थात बेचारा कोई इंसान यदि गलती से भी इन सब कहावतों पर ध्यान देकर प्यार करना चाहे तो वो कभी प्यार कर ही नहीं सकता।  पूछिये क्यूँ ? :-)अरे भई सीधी सी बात है दिमाग जो घूम जायेगा बेचारे का....और क्या करे ,क्या ना करे की भूल भुलाइयाँ में भटकते-भटकते उसकी पूरी उम्र गुज़र जाएगी। मगर वह बेचारा चाह कर भी कभी किसी से प्यार ना कर पाएगा। मगर जब कोई इंसान प्यार में होता है, तो उसे समझ ही कहाँ आता है, क्या सही क्या गलत उसे तो कभी उत्तर सही लगता है, तो कभी दक्षिण, कभी पूरब सही लगता है, तो कभी पश्चिम कभी-कभी तो यह सारी दिशाएँ ही एक साथ गलत नज़र आने लगती है ,बड़ा लोचा है भई कसम से....न दिल काम करता है, न दिमाग, यह समझना ही मुश्किल हो जाता है कि क्या सही क्या गलत पता है....ऐसे में ना !!! दिल से एक आवाज़ आती है।  
"एक मासूम सी नाव है ज़िंदगी, जो माझी की आँखों में झांक कर किनार ढूँढने की कोशिश किया करती है" 
मगर अफसोस कि उस नाव को कभी किनारा नहीं मिलता और लोग कहते हैं..... 
"हर किसी को मुकम्बल जहां नहीं मिलता 
किसी को ज़मीन ,तो किसी को आसमा नहीं मिलता"
ऐसे हालातों के चलते कभी लगता है और के लिए जीते हुए तो आधी ज़िंदगी गुज़र गयी तो क्यूँ ना अब दो पल ज़िंदगी के अपने लिए भी जी लिए जाए मगर उन दो पलों को जी भर जी लेने के बाद भी..... मन में कहीं एक कांटा सा अटक जाता है और उन गुजरे हुए लम्हों के प्रति मन में एक ग्लानि का भाव आजाता है, जैसे नींद से जागकर हकीकत से समाना होने पर महसूस होता है ना ... कुछ वैसा ही। उस वक्त, अपने प्यार में गुजरे उन हसीन लम्हों को लेकर ही इंसान खुद को अपराध बोध से ग्रसित पाता है क्यूँ ? कहते है प्यार की आखिरी मंज़िल प्यार को पा लेना होता है। मगर अपने प्यार को पा लेने के बाद भी, प्यार करने वाले सभी लोगों के मन में अपने ही परिवार के लोगों के प्रति एक ग्लानि क्यूँ रहा करती है क्यूँ ? उस वक्त अपनो के द्वारा मिल रहे निश्चल प्रेम और विश्वास के प्रति रह-रह कर यह खयाल आता है कि हम उस प्यार और विश्वास के काबिल नहीं फिर चाहे उनकी प्रेम कहानी सफल हुई हो या विफल कभी दिल गाता है "यह इश्क हाय बैठे-बिठाये जनत दिखाये हाँ हो रामा"....तो दूजे ही पल दिल से आवाज आने लगती "रहने दो छोड़ो भी जाने दो यार हम न करेंगे प्यार" .... सब कुछ इतना  कॉन्फ्युजनिंग सा हो जाता है कि दिमाग का लोचा हो जाता है कोई यह बताए कि भई आखिर यह प्यार इतना कोंपलीकेटेड क्यूँ होता है ....   

Friday, 25 May 2012

चाँद से बातें ....

मन में बसे समंदर के साहिल की रेत पर
जब कुछ बातें कुछ यादें दस्तक दे जाती है
तो अक्सर मन उदास हो जाता है
और क्यूँ न हो 
आखिर उदासी भी
तो कभी-कभी बहुत खूबसूरत हुआ करती हैं
रोज़ की भागदौड़ से परे
जब ज़िंदगी अक्सर तन्हाइयों में मिला करती है
एक ऐसी तन्हाई जहां 
दूर-दूर तक फैला एकांत का विस्तार 
 जहाँ एकांत का हर हिस्सा अंधकार मे डूबा हुआ हो  
इतना घना अंधेरा हो कि सब कुछ एकदम साफ नजर आने लगे 
 वो कहते है न कि,अंधेरे में चीजें साफ नजर आने लगती है 
 तब शायद हर एक इंसान को अपनी जिंदगी का 
हर लम्हा बिखरा हुआ सा लगता है
तभी तो पहचान होती है इंसान की, खुद की खुद से  
और जब अँधेरों में बातें होती है खुद से,
तो नज़र आता है खुद के साथ-साथ
ज़िंदगी का भी असली चेहरा की असल ज़िंदगी है क्या
वरना जीने को तो सभी रोज़ ही जिया करते हैं
मगर कभी किसी की खुद से मुलाक़ात नहीं होती
तब अक्सर जब रातों को चाँद
सबके सो जाने के बाद चुपके से खिड़की से झाक कर पूछता है 
सो गयी क्या ओरों की तरह तुम भी
तो मन करता है बढ़कर गले लगा लूँ उसे
और पूछूं कहाँ थे अब तक पता है
कितनी देर से राह देख रही थी
मैं तुम्हारी और एक तुम हो की बादलों से
लुका छुपी खेलने में मस्त हो ,
और हो भी क्यूँ ना तुम्हारा तो बहुत पुराना याराना है ना
इन आवारा बादलों से
तुम्हें भला मेरी उदासी और मेरे अकेले पन से क्या मतलब
कोई अकेले पन की आग में जलता है
तो जला करे तुम्हारी बला से
क्यूंकि और के लिए तुम ठंडक का पैगाम लेकर आते हो  
दिन भर की थकन से चूर 
लोगों को चैन की नींद जो सुलाते हो तुम,
मगर मेरा क्या, मेरे लिए तो तुम्हारा आना 
यानि 
मेरी यादों की बारात मेरे बीते हुए दिन का पूरा लेखा जोखा
फिर चाहे वो अच्छा रहा हो या बुरा
क्यूंकि एक तुम ही तो जिसके साथ में बांटती हूँ
अपनी ज़िंदगी का हर एक अनुभव हर एक ख़्वाब
और एक तुम हो, कि उसको सुनेने के लिए भाव खाते हो
रहरह कर इंतज़ार करवाते हो
और जब इंतेहा होने लगती है मेरे इंतज़ार की
और मेरी आंखे किसी बहुत देर तलक
जल रही मोमबत्ती की तरह बुझने ही वाली होती है  
कि तुम अचानक से आकर पूछ लेते हो 
सो गयी क्या 
और में चौंक कर उठ जाती हूँ 
कि कहीं तुम मुझे सोता समझ कर 
मुझसे मिले बिना ही ना लौट जाओ 
क्यूंकि मुझे दुनिया में सारे पल गवा देना मंजूर है 
लेकिन तुम्हारे साथ बिताए वो चंद लम्हे खो देना 
मुझे ज़रा भी मंजूर नहीं 
जिसमें तुम अपनी गौद में मेरा सर रखकर 
अपनी ठंडी चाँदनी से मेरा सर सहलाते हो  
मेरी सारी बातों को पूरी तन्मयता से बिना किसी शिकायत के सुनते हो, 
कि जब तक मैं अपनी बातों से तुम्हें भी बौर कर-करके ऊंगा सा न करदू 
तुम बस चुप-चाप सुना करते हो मुझे 
कभी-कभी तो मेरी खामोशी को भी सुन लिया करते हो तुम 
तुम्हारी एक यही बात तो  है, जो मुझे अंदर से छु जाती है 
 कि तुम कभी मुझसे बोर नहीं होते 
न ही कभी मेरी बोरिंग और उबाऊ बातों को सुनकर  
तुम्हें नींद आती है  
कम से कम तब तक तो नहीं 
जब तक मैं खुद नहीं सो जाती 
पर तुमसे दूर जाऊँ भी तो कैसे तुम तो वो एहसास हो 
मेरे प्यार का, मेरे इंतज़ार का, मेरी यादों का, 
जिसके आने का कोई पल नहीं 
कोई क्रम नहीं ..... 

Sunday, 29 April 2012

ज़िंदगी


ज़िंदगी एक ऐसा शब्द जिसके हर नज़र में एक अलग ही मायने है 
कोई कहता है ज़िंदगी एक किताब है 
तो कोई कहता है बारिश का पानी 
कोई कहता है आग का दरिया
तो कोई कहता है सागर का पानी 
कोई सागर की लहरें तो कोई तेरी मेरी कहानी 
जैसे इस ज़िंदगी को देखने के लिए 
परखने के लिए जितनी आँखें उतने ही दृष्टिकोण 
मगर आज तक कोई न समझ सका है 
इस ज़िंदगी का फलसफा
आखिर यह ज़िंदगी है क्या एक सवाल ?
जिसके न जाने कितने जवाब 
मुझे लगता है ज़िंदगी एक मकान की तरह है
जिसमें आतित की यादों के कई सारे झरोखे हैं 
किसी भी एक खिड़की या झरोखे में खड़े होकर देख लो 
एक अलग ही दुनिया नज़र आती है 
कभी उस दुनिया में लौट जाने को मन करता है 
तो कभी-कभी उस ही खिड़की के दरवाजे 
हमेशा के लिए बंद कर देने को भी मन करता है
कभी यूं भी होता है कि  
उसी झरोखे के बंद किवाड़ के नीचे से बहती हुई हवा सी 
कोई मीठी सी याद छुपके से आकर आपके होंठों पर 
एक मोहक सी मुस्कान बिखेर जाती है 
तब अक्सर उस मोहक सी यादों के बीच हम सुन
नहीं पाते उस ज़िंदगीनुमा मकान के दरवाजे के बाहर दस्तक देती
भविष्यवाणियाँ को ,
जो उस वक्त निर्धारित कर रही होती है हमारा भविष्य   
तो कभी यूं भी होता है कि उस ज़िंदगी के मकान के बाहर ही 
उमड़ रहे होते है कुछ अंधड़ जिनकी आवाज़ 
हमें झँझोड़ कर वर्तमान में ला खड़ा करती है
लेकिन तब भी वो हिला नहीं पाती उस ज़िंदगी के मकान को कभी 
जिसकी नींव होती है खुद ज़िंदगी
उम्मीद, आस्था और विश्वास 
जिसके आधार पर खड़ा होता है
एक नहीं कई ज़िंदगीयों का एक मकान.....