Thursday, 12 July 2012

ख़्यालों की दुनियाँ ...


दिन भर की भागा दौड़ी और किसी न किसी काम में उलझे रहने के कारण 
जब रात को थक कर जा लेटता है यह शरीर 
तब अक्सर वो मन के जागने का समय होता है 
उस वक्त जाने कैसे सारा दिन की थकान के बाद भी 
शरीर भले ही शिथिल सा निढाल हो जाये 
मगर मन, उसको तो जैसे उसी वक्त रात का आकाश मिलता है 
खुल कर ख़्यालों में उड़ने के लिए 
उनींदी सी आंखे जब अंधेरे कमरे में सफ़ेद छत को निहाराते हुए 
 सारे दिन का लेखा जोखा सोच रही होती है
तब बीच-बीच में उसी छत पर पड़ता बाहरी वाहनों का प्रकाश 
सहसा ऐसा महसूस होने लगता है 
जैसे सूने पड़े मरुस्थल से जीवन रूपी पौधे पर ऊर्जा के कुछ छींटे 
जो सूने जीवन के पौधे को थोड़ी ऊर्जा दे जाते है 
कि कहीं वो मर ही न जाये 
तब एक वक्त ऐसा भी आता है 
जब उस सोच का भार उठाती पलकें बंद होने को मजबूर हो जाती है
और तब जैसे अचानक वक्त एक बच्चे की तरह 
भागकर इस सुबह से रात तक के सफर की यह दौड़ जीत लेता है
और झट से सुबह हो जाती है  
जैसे न जाने कब से उसे बस इस ही एक पल का इंतज़ार हो 
कि कब यह पलकें बंद हो
और कब वो दौड़कर रोज़ की भांति यह रात से सुबह तक की होड़ जीत ले  
वास्तव में होता भी यही है, 
हर रोज़ घड़ी के अलार्म सी बजती घंटी
 जब सुबह-सवरे मुझे हड़बड़ाहट से जगाती है 
तब अक्सर मन में यह ख़्याल आता है
कि स्मृतियाँ रात भर नींद को धुनती रहती है 
और सुबह तक तैयार कर देती है नए सिरे से इंतज़ार की एक नयी रेशमी चादर 
शायद जीना इसी का नाम है ....  

Tuesday, 3 July 2012

क्या है पहचान एक औरत की "सागर या धरती"....?

कब तक तुम अपनी चाहत का वास्ता दे-देकर
अपने प्यार का यह रंग चढ़ाते रहोगे मुझ पर...कब तक ?
आखिर क्यूँ, किस लिए दिखाते हो तुम मुझे अपने प्यार का यह रंग, यह हक 
क्या सिर्फ इसलिए कि हमने प्यार किया है 
क्या सिर्फ इसलिए हक की बात किया करते हो तुम हर रात
मगर सच तो यह है कि प्यार में कोई शर्त नहीं होती.....
लेकिन बावजूद इसके शायद यह प्यार ही है,
कि तुम्हारी कही हर बात का कितना अक्षरसः पालन करती हूँ मैं 
यह तो तुम्हें भी पता होगा, लेकिन अवहेलना ना कर पाना भी उस ही हक का परिणाम है    
जिसके कारण जाने कैसे मेरी रूह तक, सागर किनारे पड़ी रेत की तरह
सब कुछ अपने अंतस में सोखती चली जाती है।
  
जाने क्यूँ लोग नारी जीवन की तुलना धरती से किया करते है
मैं तो इस जीवन की तुलना सागर से करना चाहूंगी
जो बिना कोई उफ़्फ़ तक किए सब कुछ अपने अंदर सोखता चला जाता है
न जाने कितनी जिन्दगानियाँ समा चुकी है अब तक इस सागर में
मगर सागर तब भी ऊपर से कितना शांत नज़र आता है...
जबकि उसके अंतस में न जाने कितनी अतृप्त आत्माओं की आवाज़ें शोर मचाती होंगी
तब भी ऐसी दिल चीर देने वाली आवाज़ों को अपने अंदर समेटे हुए भी 
वह ऊपर से कितना शांत दिखाई देता है  
और क्यूँ ना देखे जिसके पास खारे पानी की कमी नहीं
उसके आँसू या उसके संतापों की पराकाष्ठा भला किसी साधारण से इंसान को कैसे नज़र आयेगी...

देखना एक दिन उसी सागर की तरह मैं भी शांत नज़र आऊँगी
जिस दिन अति हो जाएगी उस सागर के धैर्य की
उस दिन तुम देखना, उस सागर के अंदर का कोलाहल एक ऐसा तूफान ले आयेगा
की सारी धरती जल मग्न हो जाएगी, उस दिन ही शायद प्रलय आयेगी
तब न यह धारती, धरती नहीं रहेगी, वह खुद सागर कह लाएगी.....     

Tuesday, 26 June 2012

ज़रा सोच ओ बंदे ...


यूं तो ज़िंदगी हर लम्हा, हर पल करवटें बदलती ही रहती है  
जिसकी एक करवट कभी रातों का जागरण दे जाती है 
तो कभी उस ही ज़िंदगी की दूसरी करवट पर सुकून की नींद आ जाती है 
और तब उस मीठी नींद से जागने का कभी मन नहीं होता
बिलकुल किसी हसीन ख़्वाब की तरह.....

तो कभी सागर की लहरों सी मुसकुराती है ज़िंदगी
किसी बच्चे के जन्म की तरह 
किसी बंजर ज़मीन पर फूटे किसी बीज की तरह 
एक लंबे अंधकार के बाद मिली किसी रोशनी की तरह 
किसी थके हुए मुसाफिर को मिली ऊर्जा की तरह.....

जैसे किसी समंदर की कोई ठंडी सी लहर    
तपती हुई धूप में जल रहे किसी मुसाफिर को 
अचानक से आकर ठंडक दे जाती है
बेटियाँ भी तो वही ठंडी सी लहर की तरह ही होती है। है ना !!! 
जो संतान पाने के ताप में जल रहे अपने अभिभावकों को 
मातृ-पितृ के अनुपम रिश्ते से भिगो देती है  
यानि कहीं न कहीं प्रकृति अपने आप में संतुलित और संतुष्ट नज़र आती है।
.....................................................................................................................................
तो हम क्यूँ उस लहर की ठंडक का आनंद नहीं ले पाते 
क्यूँ उस लहर को आने से पहले ही रोक दिया जाता है,  
उस सागर पर बांध बनाकर, जिस बांध के कारण कमजोर होता सागर 
फिर कभी दे ही नहीं पाता कोई ठंडी लहर रूपी बेटी, न बेटे नुमा तूफान  
तो फिर क्यूँ.....
 हे मनुष्य तू इतना व्याकुल रहा करता है तू सदा 
क्यूँ तुझे स्वीकार नहीं उस ईश्वर के आशीर्वाद रूप में मिली एक सुंदर कन्या 
तुझे तो गर्वान्वित होना चाहिए 
कि तेरे घर एक स्वस्थ बेटी ने जन्म लिया और तुझे पिता कहलाने का सम्मान दिया
ज़रा सोच अगर तुझे बेटा न बेटी,जो कुछ भी ना होता 
जो होता भी, मगर यदि कोई विकृति साथ होती उसके, 
तो क्या तब भी तू खुश होता? 
नहीं क्यूंकि खुश होना तेरी फितरत में ही नहीं
तू तब भी था रोता, तू अब भी है रोता
ज़रा सोच ओ बंदे जो यह भी न होता और वो भी न होता 
तो तेरा क्या होता 
इसलिए जो मिला है उसे ईश्वर का आशीर्वाद और अनुकंपा मान 
और आभार प्रकट कर, कि तुझे एक स्वस्थ संतान तो मिली।
वरना आज भी बहुतों को प्यास है उस एक ठंडी सी लहर के जरिये खुद को भिगो देने की ....    
  

       

Wednesday, 20 June 2012

उम्मीद...


सुबह की पहली किरण के मेरे कक्ष में पदार्पण के साथ ही उदय होता है 
मेरी उम्मीदों का सूरज भी मेरे मन के किसी कोने में कहीं 
उस पर दूर मंदिर से आती शंख नाद और मंत्र उच्चारण की सुमधुर ध्वनि
जिन्हें सुनते ही ही मेरे कदम स्वतः ही चल पड़ते है 
एक आस और उम्मीद का दामन थामे उस मंदिर की ओर 
कि शायद आज कोई चमत्कार हो जाये  
शायद आज मेरी तुम से मुलाक़ात हो जाये
मगर यूं कहाँ होते हैं चमत्कार किसी के साथ जो मेरे साथ होंगे
मगर यह मन है कि उम्मीद का दामन छोड़ता ही नहीं 
कि अब तो उस ईश्वर के सामने भी 
तुम से मिलवाने कि मन्नते करते-करते थक चुका है मेरा मन,
अब तो उस परम पिता परमेश्वर से भी 
पिया मिलन की आस को कहने में मुझे शर्म से आने लगी है
कहाँ हो तुम ?
हर रोज़ बस एक यही प्रश्न मन में लिए 
बोझल कदमों से चलकर लौटकर चली आती हूँ मैं अपने घर,
जो अभी घर बना नहीं, अभी तो बस मकान ही है
क्यूंकि घर शब्द में तो जैसे आत्मा बस्ती है 
और मकान एक बेजान मृत शरीर सा सुनाई देता है 
इसलिए शायद उसे भी मेरी तरह इंतज़ार है
नहीं उम्मीद है शायद  
एक दिन मकान से घर बन जाने का ....        

Wednesday, 13 June 2012

इश्क़ बनाम दिमाग का लोचा ...

कितना कुछ छुपा है न इस एक शब्द में, नहीं ? कहने को नफरत को भी प्यार से जीता जा सकता है इसलिए शायद यह कहावत बनी होगी कि, "प्यार और जंग में सब जाएज़ है" अर्थात जब कोई इंसान प्यार में होता है, तो वो सही या गलत नहीं होता सिर्फ प्यार होता है मगर कमाल की बात तो यह है कि एक तरफ जहां उपरोक्त कहवात का प्रयोग किया जाता है वहीं दूसरी ओर यह भी कहा जाता है, कि प्यार हमेशा उसे करो जो तुमको प्यार करे न कि उससे जिसे तुम प्यार करो,..तो कहीं कुछ लोग यह भी कहते हैं की "ज़िंदगी में हर इंसान को एक बार प्यार ज़रूर करना चाहिए क्यूंकि प्यार इंसान को बहुत अच्छा बना देता है" अर्थात बेचारा कोई इंसान यदि गलती से भी इन सब कहावतों पर ध्यान देकर प्यार करना चाहे तो वो कभी प्यार कर ही नहीं सकता।  पूछिये क्यूँ ? :-)अरे भई सीधी सी बात है दिमाग जो घूम जायेगा बेचारे का....और क्या करे ,क्या ना करे की भूल भुलाइयाँ में भटकते-भटकते उसकी पूरी उम्र गुज़र जाएगी। मगर वह बेचारा चाह कर भी कभी किसी से प्यार ना कर पाएगा। मगर जब कोई इंसान प्यार में होता है, तो उसे समझ ही कहाँ आता है, क्या सही क्या गलत उसे तो कभी उत्तर सही लगता है, तो कभी दक्षिण, कभी पूरब सही लगता है, तो कभी पश्चिम कभी-कभी तो यह सारी दिशाएँ ही एक साथ गलत नज़र आने लगती है ,बड़ा लोचा है भई कसम से....न दिल काम करता है, न दिमाग, यह समझना ही मुश्किल हो जाता है कि क्या सही क्या गलत पता है....ऐसे में ना !!! दिल से एक आवाज़ आती है।  
"एक मासूम सी नाव है ज़िंदगी, जो माझी की आँखों में झांक कर किनार ढूँढने की कोशिश किया करती है" 
मगर अफसोस कि उस नाव को कभी किनारा नहीं मिलता और लोग कहते हैं..... 
"हर किसी को मुकम्बल जहां नहीं मिलता 
किसी को ज़मीन ,तो किसी को आसमा नहीं मिलता"
ऐसे हालातों के चलते कभी लगता है और के लिए जीते हुए तो आधी ज़िंदगी गुज़र गयी तो क्यूँ ना अब दो पल ज़िंदगी के अपने लिए भी जी लिए जाए मगर उन दो पलों को जी भर जी लेने के बाद भी..... मन में कहीं एक कांटा सा अटक जाता है और उन गुजरे हुए लम्हों के प्रति मन में एक ग्लानि का भाव आजाता है, जैसे नींद से जागकर हकीकत से समाना होने पर महसूस होता है ना ... कुछ वैसा ही। उस वक्त, अपने प्यार में गुजरे उन हसीन लम्हों को लेकर ही इंसान खुद को अपराध बोध से ग्रसित पाता है क्यूँ ? कहते है प्यार की आखिरी मंज़िल प्यार को पा लेना होता है। मगर अपने प्यार को पा लेने के बाद भी, प्यार करने वाले सभी लोगों के मन में अपने ही परिवार के लोगों के प्रति एक ग्लानि क्यूँ रहा करती है क्यूँ ? उस वक्त अपनो के द्वारा मिल रहे निश्चल प्रेम और विश्वास के प्रति रह-रह कर यह खयाल आता है कि हम उस प्यार और विश्वास के काबिल नहीं फिर चाहे उनकी प्रेम कहानी सफल हुई हो या विफल कभी दिल गाता है "यह इश्क हाय बैठे-बिठाये जनत दिखाये हाँ हो रामा"....तो दूजे ही पल दिल से आवाज आने लगती "रहने दो छोड़ो भी जाने दो यार हम न करेंगे प्यार" .... सब कुछ इतना  कॉन्फ्युजनिंग सा हो जाता है कि दिमाग का लोचा हो जाता है कोई यह बताए कि भई आखिर यह प्यार इतना कोंपलीकेटेड क्यूँ होता है ....   

Friday, 25 May 2012

चाँद से बातें ....

मन में बसे समंदर के साहिल की रेत पर
जब कुछ बातें कुछ यादें दस्तक दे जाती है
तो अक्सर मन उदास हो जाता है
और क्यूँ न हो 
आखिर उदासी भी
तो कभी-कभी बहुत खूबसूरत हुआ करती हैं
रोज़ की भागदौड़ से परे
जब ज़िंदगी अक्सर तन्हाइयों में मिला करती है
एक ऐसी तन्हाई जहां 
दूर-दूर तक फैला एकांत का विस्तार 
 जहाँ एकांत का हर हिस्सा अंधकार मे डूबा हुआ हो  
इतना घना अंधेरा हो कि सब कुछ एकदम साफ नजर आने लगे 
 वो कहते है न कि,अंधेरे में चीजें साफ नजर आने लगती है 
 तब शायद हर एक इंसान को अपनी जिंदगी का 
हर लम्हा बिखरा हुआ सा लगता है
तभी तो पहचान होती है इंसान की, खुद की खुद से  
और जब अँधेरों में बातें होती है खुद से,
तो नज़र आता है खुद के साथ-साथ
ज़िंदगी का भी असली चेहरा की असल ज़िंदगी है क्या
वरना जीने को तो सभी रोज़ ही जिया करते हैं
मगर कभी किसी की खुद से मुलाक़ात नहीं होती
तब अक्सर जब रातों को चाँद
सबके सो जाने के बाद चुपके से खिड़की से झाक कर पूछता है 
सो गयी क्या ओरों की तरह तुम भी
तो मन करता है बढ़कर गले लगा लूँ उसे
और पूछूं कहाँ थे अब तक पता है
कितनी देर से राह देख रही थी
मैं तुम्हारी और एक तुम हो की बादलों से
लुका छुपी खेलने में मस्त हो ,
और हो भी क्यूँ ना तुम्हारा तो बहुत पुराना याराना है ना
इन आवारा बादलों से
तुम्हें भला मेरी उदासी और मेरे अकेले पन से क्या मतलब
कोई अकेले पन की आग में जलता है
तो जला करे तुम्हारी बला से
क्यूंकि और के लिए तुम ठंडक का पैगाम लेकर आते हो  
दिन भर की थकन से चूर 
लोगों को चैन की नींद जो सुलाते हो तुम,
मगर मेरा क्या, मेरे लिए तो तुम्हारा आना 
यानि 
मेरी यादों की बारात मेरे बीते हुए दिन का पूरा लेखा जोखा
फिर चाहे वो अच्छा रहा हो या बुरा
क्यूंकि एक तुम ही तो जिसके साथ में बांटती हूँ
अपनी ज़िंदगी का हर एक अनुभव हर एक ख़्वाब
और एक तुम हो, कि उसको सुनेने के लिए भाव खाते हो
रहरह कर इंतज़ार करवाते हो
और जब इंतेहा होने लगती है मेरे इंतज़ार की
और मेरी आंखे किसी बहुत देर तलक
जल रही मोमबत्ती की तरह बुझने ही वाली होती है  
कि तुम अचानक से आकर पूछ लेते हो 
सो गयी क्या 
और में चौंक कर उठ जाती हूँ 
कि कहीं तुम मुझे सोता समझ कर 
मुझसे मिले बिना ही ना लौट जाओ 
क्यूंकि मुझे दुनिया में सारे पल गवा देना मंजूर है 
लेकिन तुम्हारे साथ बिताए वो चंद लम्हे खो देना 
मुझे ज़रा भी मंजूर नहीं 
जिसमें तुम अपनी गौद में मेरा सर रखकर 
अपनी ठंडी चाँदनी से मेरा सर सहलाते हो  
मेरी सारी बातों को पूरी तन्मयता से बिना किसी शिकायत के सुनते हो, 
कि जब तक मैं अपनी बातों से तुम्हें भी बौर कर-करके ऊंगा सा न करदू 
तुम बस चुप-चाप सुना करते हो मुझे 
कभी-कभी तो मेरी खामोशी को भी सुन लिया करते हो तुम 
तुम्हारी एक यही बात तो  है, जो मुझे अंदर से छु जाती है 
 कि तुम कभी मुझसे बोर नहीं होते 
न ही कभी मेरी बोरिंग और उबाऊ बातों को सुनकर  
तुम्हें नींद आती है  
कम से कम तब तक तो नहीं 
जब तक मैं खुद नहीं सो जाती 
पर तुमसे दूर जाऊँ भी तो कैसे तुम तो वो एहसास हो 
मेरे प्यार का, मेरे इंतज़ार का, मेरी यादों का, 
जिसके आने का कोई पल नहीं 
कोई क्रम नहीं ..... 

Sunday, 29 April 2012

ज़िंदगी


ज़िंदगी एक ऐसा शब्द जिसके हर नज़र में एक अलग ही मायने है 
कोई कहता है ज़िंदगी एक किताब है 
तो कोई कहता है बारिश का पानी 
कोई कहता है आग का दरिया
तो कोई कहता है सागर का पानी 
कोई सागर की लहरें तो कोई तेरी मेरी कहानी 
जैसे इस ज़िंदगी को देखने के लिए 
परखने के लिए जितनी आँखें उतने ही दृष्टिकोण 
मगर आज तक कोई न समझ सका है 
इस ज़िंदगी का फलसफा
आखिर यह ज़िंदगी है क्या एक सवाल ?
जिसके न जाने कितने जवाब 
मुझे लगता है ज़िंदगी एक मकान की तरह है
जिसमें आतित की यादों के कई सारे झरोखे हैं 
किसी भी एक खिड़की या झरोखे में खड़े होकर देख लो 
एक अलग ही दुनिया नज़र आती है 
कभी उस दुनिया में लौट जाने को मन करता है 
तो कभी-कभी उस ही खिड़की के दरवाजे 
हमेशा के लिए बंद कर देने को भी मन करता है
कभी यूं भी होता है कि  
उसी झरोखे के बंद किवाड़ के नीचे से बहती हुई हवा सी 
कोई मीठी सी याद छुपके से आकर आपके होंठों पर 
एक मोहक सी मुस्कान बिखेर जाती है 
तब अक्सर उस मोहक सी यादों के बीच हम सुन
नहीं पाते उस ज़िंदगीनुमा मकान के दरवाजे के बाहर दस्तक देती
भविष्यवाणियाँ को ,
जो उस वक्त निर्धारित कर रही होती है हमारा भविष्य   
तो कभी यूं भी होता है कि उस ज़िंदगी के मकान के बाहर ही 
उमड़ रहे होते है कुछ अंधड़ जिनकी आवाज़ 
हमें झँझोड़ कर वर्तमान में ला खड़ा करती है
लेकिन तब भी वो हिला नहीं पाती उस ज़िंदगी के मकान को कभी 
जिसकी नींव होती है खुद ज़िंदगी
उम्मीद, आस्था और विश्वास 
जिसके आधार पर खड़ा होता है
एक नहीं कई ज़िंदगीयों का एक मकान.....      

Friday, 30 March 2012

प्रकृति और साथ ज़िंदगी का ....


कभी सोचा है प्रकृति और इंसान के साथ के गहरे रहस्य को
जैसे एक ही सिक्के के दो पहलुओं सा साथ 
एक के बिना दूजा अधूरा
जैसे मन के भाव वैसा प्रकृति का स्वभाव  
क्यूंकि एक प्रकृति ही तो है 
जो इंसान के साथ सदा होती है
वो कहते हैं ना 
"ज़िंदगी के साथ भी, ज़िंदगी के बाद भी"    
कभी महसूस किया है तुमने प्रकृति को बात करते  
जब खुश होता है हमारा मन या उदास होता है 
तब अक्सर प्रकर्ति का ही तो हमेशा साथ होता है
कभी एक हमसफर का रूप तो कभी माँ का स्वरूप  
अक्सर बातें करते हैं तब यह नदिया, यह पहाड़, यह झरने 
वो नदी का किनारा, वो पेड़, वो फूल, वो पत्तियाँ भी कभी-कभी 
वो चाँद वो तारे ज्यों दोस्त हो हमारे फिर क्या यह धरती और क्या आकाशा 
सारी कायनात जैसे हमारों ही इशरों पर चल, देने लगती है हमारा ही साथ 
अक्सर प्यार में पागल मन गुंगनाने लगता है वो गीत 
पंछी ,बादल प्रेमी के पागल हम कौन है साथिया....
और मन कहता है याद नहीं भूल गया हो याद नहीं भूल गया 
और जब मन उदास होता है तो
जैसे यही खूबसूरत नज़ारे अचानक दिल की चुभन बन जाते है एक सुलगती हुई 
मन में दबी आग मगर संगीत तो संगीत ही होता है चाहे गम का हो, या खुशी का 
और उदास होने पर भी मन गाता है 
यह रात खुशनसीब है जो अपने चाँद को 
कलेजे से लगाए सो रही है यहाँ तो ग़म की सेज पर हमारी आरज़ू अकेली मुंह छुपाये रो रही है 
इंसानी मन और उसके मानोभाव तो आज तक खुद इंसान नहीं समझ सका है 
तो कोई और क्या समझेगा भला  
क्यूंकि जब भी की है कोशिश किसी ने 
इस राज़ को समझ पाने की 
तब तब पलटा है ज़िंदगी और प्रकृति दोनों ही ने 
मिलकर इंसानी ज़िंदगी की किताब का एक पन्ना
जिसे नए सिरे से लिखने और समझने के लिए  
 फिर एक बार हो इंसान प्रकृति और साथ ज़िंदगी का....    


Tuesday, 27 March 2012

अपना घर


जानते हो तुम्हारे घर से जाने के बाद 
मुझे घर कितना सुना और खाली-खाली सा लगने लगता है  
यूं तो मैं कहने को अक्सर कह दिया करती हूँ
 कि यही तो वो समय है मेरा 
जब सबके स्कूल ऑफिस जाने के बाद 
मैं दो घड़ी चैन से बैठकर चाय पी पाती हूँ 
और मन ही मन यह सोच लेती हूँ 
कि चलो अब सारा दिन केवल मेरा है मेरे लिए है 
चाहे जो मन करे करू, अब तो तुम्हारे घर वापस आने तक यहाँ मेरा ही एक क्षत्र राज है,
मगर यह सब कहने की बाते हैं वास्तविकता तो कुछ ओर ही है। 
वास्तव में घर वो स्थान है जहां यदि काम ढूँढने जाओ 
तो शायद एक पूरा दिन भी कम पड़ जाये 
और यदि न चाहो, तो कोई काम ही नहीं होता 
मगर यह सब मैं तुमसे कोई शिकायत करने के लिए नहीं कह रही हूँ 
बल्कि मुझे तो बहुत अच्छा लगता है 
यूं घर का काम करना 
और बाकी घर के सदस्यों कि तरह 
अपने इस घर कि भी देख भाल करना
जानते हो क्यूँ, क्यूंकि जब मैं तुमसे जुड़कर यहाँ आई थी ना  
तब इसी घर ने मेरे पाओं कि मिट्टी को अपने अंदर जजब करके 
मुझे सदा के लिए अपना बना लिया था अपना मान लिया था
तभी से एक अनदेखा अंजान
मगर जो अब बहुत ही जाना पहचाना सा रिश्ता सा बन गया है मेरा इस घर से 
यहाँ की दीवारों से, यहाँ रखी हर चीज़ से मेरा एक रिश्ता सा बना हुआ है  
 यहाँ कि हर चीज़ मुझसे बातें किया करती है 
अपनी भावनाओ को मेरे साथ सांझा किया करती है
और उन सब से यूं बाते करते कराते 
कब शाम ढाल जाती है और तुम्हारे घर वापस लौटने का समय हो जाता है 
पता ही नहीं चलता जानते हो क्यूँ, क्यूंकि      
अपना घर अपना ही होता है 
चाहे महल हो या फिर छोटे से घर की चार दीवारी  
यहाँ तक की झोपड़ी ही क्यूँ ना हो अपना घर अपना ही होता है, 
चाहे जहां भी रहलो 
अपने घर का सा सुकून, शांति या आराम किसी को कहीं और मिल ही नहीं सकता 
फिर चाहे कोई भी जगह कितनी भी सुंदर हो या 
फिर कितने भी ऐश और आराम की वस्तुओं से ही क्यूँ न भरी पड़ी हो,
किन्तु तब भी जो सुख और सुरक्षित होने की भावना 
का आभास जैसा अपने घर की चार दीवारी में 
प्रवेश करने के बाद मिलता है 
मेरा दावा है, वो सुख किसी को भी और कहीं मिल ही नहीं सकता 
पर क्या खुद कभी महसूस की है एक बात तुमने  
या फिर सोचा है क्या कभी
यूं तो कहने को पूरा घर ही अपना होता है 
लेकिन तब भी हर घर के कोने में, 
कोई न कोई एक ऐसी जगह भी ज़रूर होती है 
जहां मन एक असीम शांति और अपने पन का अनुभव करता है, 
जहां वक्त के ठहराव को महसूस किया जा सकता है 
जो अपने घर के अलावा पूरी दुनिया में और कहीं मिल पाना संभव नहीं, 
वो जगह किसी भी व्यक्ति के लिए, उसके घर में बनी कोई भी जगह हो सकती है 
जैसे किसी के लिए पूजा घर, तो किसी के लिए महज़ कोई खिड़की,
 कोई बालकनी,बागीचा, छत या फिर आपका अपना कमरा 
या किचन घर की कोई भी जगह हो सकती है वो   
जहां आप अपने आप से बात करते हैं
वह एक स्थान अपने आप में आपके लिए बहुत खास होता है,
जहां ज़िंदगी की उलझनों और मन में चल रहे 
किसी भी प्रकार के विचारों को आप अपने आप से बांटते है,
फिर चाहे वो, आपके अंदर चल रहा किसी प्रकार का अंतर द्वंद हो,
किसी बात का दुख हो, कोई समस्या ही ,परेशानी हो 
या फिर चाहे कोई बेहद खुशी की बात ही क्यूँ ना हो
मुझे भी बहुत अच्छा लगता है
अपने इस घर की हर एक चीज़ से बाते करना   
यूं ही कभी बागीचे में या घर के आँगन में टहलते-टहलते 
पेड़ पौधों से बाते करना या उनसे अपने मन की बातों को कहना,
 कभी-कभी खिड़की में घंटों खड़े रहकर 
बाहर के नज़रों को देखते हुए अपने आपसे बाते करना 
कभी-कभी तो यूं भी होता है की अपने कमरे में किसी एक जगह बैठकर 
तकिये को हाथों में लिए घंटो मन ही मन कुछ सोचते रहना 
अपने आप खुद से ही सवाल भी पूछना और खुद ही जवाब भी देना 
या फिर छत की मुडेर पर खड़े होकर वहाँ लगे गमलों से बाते करना
प्रकृति के साथ अपनी बातों को अनुभवों को अहसासों को बटना 
अपने आप में एक ऐसा सुकून देता है 
जिसका कोई पर्याय नहीं
वाकई ऐसा महसूस होने लगता है 
जैसे सच मुछ कुदरत आपकी बातें सुन रही हो
और आपसे वो कह रही हो जो आप और से सुने की आपेक्षा रखते हो 
मगर कभी सुन नहीं पाते उस वक्त प्रकृति एक ऐसे दोस्त के रूप में सामने होती है 
जो आपकी हर बात सुनने समझने को तैयार है बिना किसी शर्त के 
बिना किसी शिकायत के जो हर नज़रिये से आपके साथ है
यदि आप खुश हो तो वो खुश है और यदि आप दुखी हो तो दुखी भी है 
बस यह सब देखने की नज़र चाहिए     
कुछ लोग अपने घर की साफ सफाई के दौरान भी लगभग घर 
की हर एक वस्तु से बातें करते हुए 
अपने मनोभावों को बाँट लिया करते है। 
यह सब सिर्फ ओर सिर्फ केवल अपने ही घर में संभव हो पाता है 
किसी और के घर में यह सुख कहाँ ,
इसलिए मुझे प्यार है अपने इस छोटे से मगर मेर इस अपने आशियाँने से
क्यूंकि कुछ बातें खामोशी के साथ ही और खामोशी के बाद भी बहुत अच्छी लगती है.....  






Friday, 23 March 2012

रिश्तों में नाम ज़रूरी है क्या ?


माना के रिश्ता था कभी हमारे बीच प्यार का मगर क्या सच में वो प्यार ही था 
या हम उसे प्यार समझ बैठे थे  
मगर आज ज़िंदगी के जिस मोड पर खड़े हम 
तुम ही बताओ क्या वो सच में प्यार था।  
दो अंजान लोग विचारों के माध्यम से मिले,मिलकर साथ चले 
विचारों के मिलन से ही नज़दीकियाँ बढ़ी तो क्या विचारों का मिलाप ही प्यार है ??? 
न.... मुझे तो नहीं लगता कि एक सी सोच और भावना का होना ही प्यार कहलाता है 
क्यूंकि ऐसे तो न जाने कितने लोग होंगे इस जहां में जिनसे मेरी तुम्हारी सोच मिलती होगी 
तो क्या हमे उन सब से प्यार हो जाएगा 
गर ऐसा होता तो शायद आज इस दुनिया का नक्शा ही कुछ ओर होता, !!!
नहीं, तुम्हें नहीं लगता ना ऐसा.....मैं जानती हूँ, तुम मन ही मन मुस्कुरा रहे हो, 
शायद हंस भी रहे हो सोच-सोच कर कि कैसे पागल लड़की है यह  
 कुछ भी सोचती है कुछ भी कहती है 
भला प्यार का सोच से क्या वासस्ता है ना !!! यही सोच रहे हो न तुम ? 
शायद तुम ही सही हो मुझे भी यही लगता है 
प्यार का सोच से कोई वास्ता हो ही नहीं सकता 
क्यूंकि प्यार तो उनके बीच में भी देखा है मैंने 
जिनकी सोच नदी के दो किनारों कि तरहा होती है ,
मगर तब भी प्यार सांस लेता है, उनकी रूह में कहीं न कहीं, 
तो फिर हमारे बीच जो कुछ था, वो प्यार था या जो आज है वो प्यार है 
हमारी सोच और भावनायें तो कल भी मिलती थी और आज भी मिलती है। 
मगर मैं इस रिश्ते को कोई नाम देना नहीं चाहती। न प्यार का और न ही दोस्ती का, 
जाने क्यूँ मैं आज तक समझ ही नहीं सकी कि लोग जब प्यार में बिछड़ जाते है, 
तो आगे जाकर वो इस रिश्ते को दोस्ती का नाम देकर क्यूँ चलाया करते है 
क्यूँकि प्यार दोस्ती में नहीं बदल सकता है। हाँ दोस्ती ज़रूर प्यार में बदल जाती है। 
इसलिए में अपने इस रिश्ते को इन नामों के माया जाल से बचाकर रखना चाहती हूँ। 
मेरी नज़र में हमारे बीच जो भी है वो ना तो प्यार है, न दोस्ती 
सिर्फ विचारों और भावनाओं का रिश्ता है हमारा 
तो क्या ज़रूरी है इसे कोई न कोई नाम दिया ही जाये 
क्या बिना किसी रिश्ते का नाम दिये, दो लोग आपस में अपने सुख दुख नहीं बाँट सकते।
क्या ज़रूर है दो इन्सानों के बीच बने आपसी समझ के रिश्ते को कोई नाम देना 
क्या बिना किसी रिश्ते कि मोहौर लगे दो 
इन्सानों को उनकी आपसी समझ के बल पर जो कि हर रिश्ते कि नीव होती है  
उन्हे जीने का अधिकार नहीं दिया जा सकता
यूं भी मकान बन जाने के बाद तो लोग सिर्फ मकान को देखते है 
क्यूंकि नीव को कोई नहीं नाम नहीं होता
तो फिर रिश्तों में नाम क्यूँ ....         

Wednesday, 21 March 2012

है कोई जवाब ?


कहते हैं खुशी बांटने से बढ़ती है और ग़म बाटने से घटता है
यह भी कहा जाता है कि अति हर चीज़ कि बुरी होती है
फिर चाहे वो प्यार ही क्यूँ न हो
कितना कुछ कहा जाता है न इस प्यार के बारे में
लेकिन यदि कभी यही प्यार बेवफाई कि वजह बन जाये तो,
तुम मुझे पूरी शिद्दत से चाहो और मैं तुम्हे धोखा दे जाऊन तो
तो क्या तब मुझे माफ कर सकोगे तुम क्यूंकि प्यार में तो कोई शर्त नहीं होती
प्यार तो नाम है त्याग का,प्यार में सिर्फ पाना प्यार नहीं होता
बल्कि प्यार में अपना सर्वस्व देदेना प्यार कहलाता है

जैसे की तुमने मुझे दिया
लेकिन यदि फिर भी बहक जाये मेरे कदम तो क्या माफ कर सकोगे तुम
नियति के खिलाफ जाकर मेरे साथ इंसाफ कर सकोगे तुम
यूं तो बिना किसी अपराध के अग्नि परीक्षा सदियों से सदा औरत ही देती आई है
लेकिन यदि आज में अपना अपराध मानकर, लूँ तुम्हारे प्यार की परीक्षा
तो क्या सब कुछ भुला कर मुझे माफ कर सकोगे तुम
यूं तो आज ज़माना बराबरी का है, मगर क्या तुम मेरा यह सच जानकर भी
मुझे वैसे ही चाह सकोगे जैसे कभी पहले चाहा था तुमने

मैं जानती हूँ कहना बहुत आसान होता है मगर निभा पाना उतना ही मुश्किल
क्यूंकि हो तो तुम भी आखिर एक इंसान ही कोई भगवान नहीं हो ,
तुम्हारे अंदर भी एक दिल है जो धड़कता है, दिमाग है, जो सोचता है जज़्बात हैं जो मचलते है
मगर क्या इन सब को परे रखकर केवल प्यार का दामन थाम
क्या तुम दे पाओगे मेरा साथ मेरे सच के साथ
क्या निभा पाओगे शादी के फेरों में दिया गया अपना वो वचन
कि हर पल हर स्थिति में तुम दोगे मेरा साथ,

शायद नहीं क्यूंकि दुनिया का हर पुरुष प्यार करना तो बहुत अच्छे से जानता है
मगर प्यार निभाना केवल स्त्रियॉं को आता है
यकीन न हो मेरी बात का यदि तो इतिहास उठाकर देखलों
प्यार में समझौता और सहनशीलता कि मूरत केवल स्त्री को ही कहा जाता है
मगर जब यही बात किसी पुरुष पर आती है तो मात्र एक धोबी के कहने भर से
एक पतिवृता स्त्री को घर से बेघर कर दिया जाता है जंगलों में भटकने के लिए
आखिर कब तक कृष्ण बहलाते रहेगे यह कहकर राधा का मन
कि मैं इसलिए विवाह किया रुक्मणी से प्रिय
क्यूंकि विवाह में दो लोगों कि जरूरत होती है, और हम तो एक ही है ना

आखिर क्यूँ और कब तक चलेगा
यह प्यार में समर्पण, सहनशीलता, और त्याग का यह एक तरफा खेल
अरे वह तो फिर भी भगवान थे, रही होगी उनकी कोई मजबूरी
जिसके चलते उठाना पड़े होंगे उनको यह कदम शायद...मगर मैं तो इंसान हूँ,
और इस नाते मुझे शिकायत है सदियों से चले आरहे इस एक तरफा खेल से
मानती हूँ भूल मेरी है गुनहगार भी मैं ही हूँ मगर तभी प्यार है मुझे तुमसे
अब तुम्हारी बारी है जवाब तुमको देना है।
क्या अब भी मेरे सच के साथ तुम्हें कुबूल है मेरा प्यार

रही बात मेरी तो मेरे दिल के अंदर बने तुमसे कि गई बेवफाई
के जख्मो से खून का रिसना तो बादस्तूर अब भी जारी है
भले ही वो एक भूल थी मेरी,जिसके चलते
भावनाओं ने ही भावनाओं के तूफानों में झोंक दिया मेरा अस्तित्व को  
मगर मुझे तुम से प्यार तब भी था और अब भी है
इसलिए शायद कदम बढ़ना तो चाहते है मेरे, मगर बढ़ नहीं पा रहे,

जाने क्यूँ अंजाने में ही सही जख्म भी मैंने ही दिया है तुमको,
मगर तब भी दर्द मुझे ही हो रहा है
फिर भी ना जाने मुझे ऐसा क्यूँ लगता है, कि मैं मर चुकी हूं
मगर मुरदों को तो दर्द नहीं हुआ करता न फिर मुझे क्यूँ हो रहा है
क्यूंकि शायद यूं तो मेरी आत्मा मर ही चुकी है
मगर उसी आत्मा कि शांति के लिए शरीर का मिट्टी में मिलना अभी शेष है......  

Sunday, 18 March 2012

जीवन क्या है ? जीवन या एक पहेली....


 एक बेहतरीन लेखिका के एक ब्लॉग को पढ़कर मेरे मन में उठे कुछ विचार 

गहराइयों मे जाकर भी सोचा है कभी कि यह जीवन क्या है ? समझ ही नहीं आता कि जीवन क्या है एक पहेली या एक हकीकत, जिसे समझते सुलझाते ही इंसान की तमाम उम्र गुज़र जाती है। मगर ज़िंदगी के अंतिम पड़ाव तक समझ नहीं आता कि यह जीवन आखिर था क्या? शून्य में निहारते हुए इंसान को अकेले में अक्सर कुछ प्रश्न आ घेरते है जैसे हम क्या चाहते हैं, क्यों चाहते हैं...जीवन हमें कैसा चाहिए जैसे सवाल। यूं तो हर इंसान दौहरी ज़िंदगी जिया करता है। हमेशा दो मुखौटों के साथ एक वो जो समाज और दुनिया को दिखाने के लिए होता है और एक वो जो खुद के लिए सच्चाई के आईने से कम नहीं होता। समाज और दुनिया के लिए लगाया गया मुखौटा अक्सर हम सभी रोज़ ही सुबह से अपने चहरे पर लगा लिया करते है, एक औपचारिकता भरी मुस्कान और जीवन के दो औपचारिक शब्द माफ़ करना और धन्यवाद के साथ और जब रात को अकेले में दिन भर की भागदौड़ के बाद जैसे ही सुकून के कुछ पल मिला करते है, तन्हाइयों के साथ तब अपने आप ही उतर जाता है,यह दिन भर से चढ़ा दिखावे का मुखौटा जैसे हटा हो कोई नकाब किसी अजनबी के चेहरे से,

तो तब अक्सर मन करता है निकल जाने को एक ऐसी सुनसान राह पर जहां तेज रोशनी उगलते ख़ाबों के बीच से गुज़रता कोई अपने आप सा खाली सा रास्ता तालाशता हुआ मन जहां हवा की सरसराहट से यहाँ वहाँ उड़ते सूखे पत्ते और बेवजह इक्का दुक्का निकलती गाडियाँ जिन्हें देखकर ऐसा महसूस होता है जैसे इनमें बैठे लोग भी बस भागे चले जारहे हैं अपनी दिन बार की ऊब को ख़त्म करने के लिए और उस अनदेखी अनजानी मंज़िल की तलाश में जिसका सफर है यह ज़िंदगी, ऐसे में जब हम दूर कहीं कोई पार्क में या बागीचे में ऐसे ही एक अधजले से टिमटिमाते बिजली के खंबे के नीचे पड़ी किसी बेंच पर जाकर झींगुरों और मच्छरों के शोर तले कुछ देर बैठे हुए जब अपने आप से मिलते हैं तब अकसर किसी एक पल का कोई टुकड़ा हमारा हाथ पकड़ के हमको ख्यालों की उस दूसरी दुनिया में लेजाता है और हम उसमें गुम हो जाते हैं। जहां हम तन्हा होकर भी खुद को कभी तन्हा महसूस नहीं किया करते और तभी अचानक जैसे  कहीं से कोई आवाज का सूरज उगता है यह कहते हुए कि इतनी रात गए यहाँ क्या कर रहे हो, चलो जाओ अपने घर और हम उस आवाज के साथ उन ख्यालों की दुनिया से बाहर आजाते हैं । तब अक्सर घर लौटे वक्त दिमाग में फिर एक खयाल दस्तक देता है।

एक दुनिया हमारे अंदर भी है, जो बिकुल बाहरी दुनिया की तरह है। जहां रास्ते भी हैं, मंज़िले भी, जहां पहाड़ भी है,नदियाँ भी,जहां मौसम के रूप में बहार भी है, तो पतझड़ भी, प्यार भी है, तो नफरत भी, वो सब कुछ है जो हमें बाहर दिखाता है। जबकि दरअसल वह सब हमारे अंदर ही होता है। इन्हीं सब ख़यालों के बीच चलते हुए रात का अंचल पसरता जाता है और उस बागीचे से घर को लौटता वह रास्ता जिस पर चलकर हम खुद से मिलने गए थे छोटा होता चला जाता है और अंत में हम फिर वहीं आखड़े होते हैं जहां से चले थे कभी....शायद किसी ने ठीक ही कहा है "दुनिया गोल है"। लेकिन इन सब के बीच एक बात तो तय है, कि किसी भी इंसान को अकेले होने के लिए किसी सुनसान बियाबान जगह पर जाने की कोई जरूरत नहीं होती। हम इंसानों से, रिश्ते नातों से, भरे जंगल में भी अकेले हो सकते हैं। कभी भी, कहीं भी...जैसे वो गीतहै ना
"हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी 
फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी"

सोचते-सोचते लगता है उफ़्फ़ कितनी उलझन भरी है यह ज़िंदगी जिसका सफर है मगर मंज़िल कोई नहीं, शायद मंज़िल नाम की कोई चीज़ होती ही नहीं, सिर्फ सफर ही हुआ करता है। हाँ जब भी ऐसा लगता है, कि  हमको हमारी मंज़िल मिल गई, किन्तु तब वास्तव में वो मंज़िल नहीं जीवन के सफर का एक पड़ाव होता है।  जहां हम कुछ देर रुकते है और यह गुमान हो जाता है। कि यही तो है हमारी मंज़िल, मगर फिर थोड़े ही दिनों में यह अहसास भी हो जाता है, कि अभी कहाँ अभी तो दिल्ली बहुत दूर है। अभी तो बहुत कुछ है जीवन में जिसे अभी पाना है। अभी हम रुक नहीं सकते अभी तो बस चलते ही चले जाना है और हम फिर निकल पड़ते हैं उस अनजानी सी अनदेखी मंज़िल की ओर जीवन के इस पथ पर चलते-चलते कुछ हमसफर मिलते हैं ऐसा आभास सा होता है, लेकिन उनके बिछड़ते ही हम और अकेले हो जाते हैं। यानी शाश्वत है अकेला होना ही। तो क्यूँ न यह जीवन भी अकेले ही जिया जाये। क्या जरूरत है किसी के साथ की, यूं भी तो अब तक का सफर हमने अकेले ही तय किया है। क्यूंकि हमसफर भले साथ हो आपके मगर उसके बावजूद भी आपकी अपनी एक अलग दुनिया होती है जहां सिर्फ और सिर्फ आप होते हैं। आपके अंदर कि दुनिया बिना मुखौटे की दुनिया,जहां आप खुद से मिला करते हैं।  

तब कभी महसूस किया है, किसी नदी के किनारे बने 
किसी मरघट के दृश्य को
कहीं किसी के स्मृतिचिन्ह किसी पत्थर के रूप में दर्जहोते हैं 
तो कहीं थोड़ी थोड़ी दूरी पर आग भी होती है।   
जीवन भर की थकी हुई देहों को विश्राम देती आग. 
कहीं आग बस बुझने को हुआ करती है 
तो कहीं धू-धूकर जल रही होती है।   
तो कहीं मंथर गति से जल रही होती है  
मानो अपनी ही गति पर मुग्ध हो.
हर एक आग का अपना एक अलग ही दृश्य नज़र आता है
मगर उन चिताओं का भी 
अंत समय आनेतक वहाँ कोई नहीं रुकता
और रहजाता है वहाँ भी फिर एक बार वही अकेलापन.....
प्रतिभा कटियार 

यह जीवन का कैसा सत्य है। जहां इंसान का रिश्ता केवल उसकी साँसों पर टीका होता है। जहां साँसे ख़त्म वहाँ सब कुछ जैसे अचानक से कहीं विलीन हो जाता है। सासों के रुकते ही शरीर अपवित्र हो जाता है। अपने ही घर में अपनी ही लाश छूत पाक का करण बन जाती है और जल्द से जल्द उसे अग्नि के सुपुद्र करने कि कोशिशें शुरू हो जाती है और शायद तब उस अग्नि में आहुति हम खुद ही रूह रूप में दूर खड़े हो देदीया करते हैं। अपने अंदर उन बरसों से चल रहे प्रश्नो को, कि हम कौन है, हमारी मंज़िल क्या है कोई मंज़िल भी है या यह सफर ही है बस जो न रुकता है न थमता है बस केवल चला करता है। क्या पता इन जलती हुई चिताओं में इन सवालों कि आहुतियों के बाद भी इंसान को सुकून मिल भी पाता है या नहीं, इस अतिम सफर के बाद भी यह जीवन पहली सुलझ भी पाती है या नहीं ????              

Tuesday, 6 March 2012

ज़िंदगी के रंग...

कुछ भी शुरू करने से पहले आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनायें दोस्तों 

होली के रंग अपनों के संग
बस रंग ही रंग कभी सोचा है 
अगर ज़िंदगी में यह रंग 
न होते तो कितनी 
उदास निराश और फीकी सी लगती यह ज़िंदगी 
सच सभी तरह के रंगों का भी बहुत महत्व होता है 
इस एक ज़िंदगी में 
फिर चाहे वो होली के रंग हों 
या ज़िंदगी में हुए अनुभवों के रंग 
रंग तो रंग ही है
जीवन के रंग 
कभी खुशी कभी ग़म 
कुछ रंग ज़िंदगी में स्वतः ही बिखर
हमारी ज़िंदगी को रंगीन बना जाते है
जैसे सच्चे प्यार क्या कोई ठहरा हुआ सागर जो छलके
पर न बिखरे यही तो चाहता है हर दिल    
मगर कुछ रंग ऐसी भी होते है 
जो ना चाहते हुए भी हमारी ज़िंदगी में 
 भर दिये जाते हैं 
जैसे यह ज़िंदगी नहीं, किसी चित्रकार 
की कोई चित्रकारी हो 
और 
उसमें कोई रंग कम पड़ जाये तो 
 वो चित्रकार वहाँ काम चलाने के लिए 
जबरन ही किसी और रंग को भर दिया करता हो
ज़िंदगी भी तो एक चित्रकारी की तरह ही है 
जिसमें शायद चित्र तो हम बनाते है 
मगर उन चित्रों में रंग कोई और भरा करता है ..... 



Monday, 27 February 2012

क्या इसको ही कहते हैं प्यार ....


जब भी कभी किसी को प्यार होता है 
तब हमेशा ही कोई अनदेखा, अंजाना 
सा चेहरा बिन बांधे कोई डोर ऐसे खींचता है अपनी ओर 
जैसे जन्मो जन्मांतर का रिश्ता हो उससे 
जो अनेदेखा अंजाना होते हुए भी 
बहुत ही अपना सा नज़र आता है।   

जिसके जीवन मे आने के बाद
खेतों में लहराई सरसों कल परसों में बीते बरसों
सी हो जाती है ज़िंदगी चारों और बस खुशबू ही खुशबू 
हुआ करती है मन महका-महका सा रहा करता है 
बेवजह होंटों पर मुस्कान खिली रहती है 
चेहरे और स्वभाव पर एक अनोखी आभा दमकती है।
  
हर मौसम खुश गवार सा नज़र आता है 
प्रकृति के कण-कण से प्यार हो जाता है
प्रकर्ति ही नहीं बेजान आईने से भी प्यार हो जाता है 
खुद को ही बार-बार देख मन बाग-बाग हो जाता है  
आखिर ऐसा भी क्या छुपता होता है 
उस अनदेखे अंजाने से चहरे में, 
जिसके गुम हो जाने के बाद....

ज़िंदगी रेगिस्तान सी नज़र आती है 
इतनी मायूस हो जाती है ज़िंदगी कि 
फिर जीने की कोई चाह ही बाकी नहीं रह जाती है  
जीने के लिए खुशियों में भी ग़म दिखाई देता है 
मंदिर में भी भगवान नहीं पत्थर दिखाई देता है
कल तक जो हवा का एक झोंका किसी के गालों को छूकर 
अपने नसीब पर इतराया करता था। 
  
आज वही हवा थेपडा बन कर थप्पड़ मारती है 
यह कैसी नदी बस गई है अब आँखों में 
जिसे अपना सागर ही नहीं मिलता कहीं 
बिखरते तो अब भी है, फूल कई किसी के चहरे पर कहीं 
मगर अफसोस की उन फूलों की जगह अब मोतीयों ने ले ली है।
ऐसा क्यूँ होता है बार-बार क्या इसको ही कहते है प्यार ?

जिसके बारे में कहा जाता है कि 

"हर इंसान को अपनी ज़िंदगी में 
एक बार प्यार ज़रूर करना चाहिए 
क्यूंकि प्यार इंसान को बहुत अच्छा बना देता है।"            

Tuesday, 21 February 2012

फलसफ़ा ज़िंदगी का


यूं तो शायद आज आपको मेरी यह रचना पढ़कर 
ऐसा लगे जैसे यह तो वही बात हुई "ढ़ाक के तीन पात" 
मगर क्या करू यही सच है, समंदर की लहरों 
और साहिल से शुरू हुआ यह अभिव्यक्ति का कारवां 
आज फिर समंदर पर ही आ गया है 
कोशिश तो बहुत की मैंने ,की इस समंदर से निकल कर
कुछ लिखूँ मगर मेरे मन को मेरे आँखों को शायद 
और कोई नज़ारा रास ही नहीं आया कहीं इसलिए 
आज एक बार फिर 
समंदर और इंसानी भावनाओं से जुड़ी 
कुछ अपने आप से की हुई बात, कुछ मूलाकाते...
पूर्णिमा की रात जब चाँद आपने पूरे शबाब पर होता है 
तब इस समंदर की लहरे भी धारण कर लिया करती है
आवरण श्वेत चाँदी की मीन का जो मचल-मचल कर 
स्वागत कर रही होती हैं उस पूनम के चाँद का  
क्यूंकि उस चाँद की चंद किरणों ने दिया है नव जीवन उन लहरों को 
खुलके जश्न मनाने का, के तभी बिना किसी आहट  के 
धीरे से रात के आँचल से निकल 
जब सूर्य फैला देता है अपनी स्वर्णिम किरणे उन्हीं 
मतवाली लहर नुमा मीनो पर तो जैसा अचानक की बदल 
जाता है सारा नज़ारा और वो श्वेत चाँदी की मीन सहसा  
बदल जाती है सोने की मीन मे 
कितना अदबुद्ध होता है यह मंज़र जैसे यह लहरे लहर न रहकर 
मीन नज़र आने लगती है जैसे इंसान का मन पल में 
परिस्थिति के मुताबिक खुद को बदल ही लेता है  
ठीक वैसे ही यह लहरे रात दिन एक नया आवरण ओढ़
बहलालीय करती है अपना मन 
या शायद उन चाँद और सूरज का मन  
और देखा देती है एक ही पल में वो सारा नज़ारा वो सारे मंज़र 
इंसानी ज़िंदगी के, कभी आवेग 
तो कभी अलहड़ जवानी यह पानी की रवानी
कुछ गहरे अहसास तो कुछ छोड़े हुए अनमोल पल 
समंदर की गोद से निकाला हुआ कोई सच्चा मोती 
हो जैसे सच्चा प्यार का कोई अंश कभी चाँदी तो कभी 
सोना कभी मोती ,तो कभी लहरों की गूंज में 
गूँजता सन्नाटा हो जैसे किसी के मन को अंतमर्थन 
और भी नजाने क्या-क्या छुपा है सागर किनारे  
जिसे ढूँढने और समझ ने 
में ही गुज़र जाती है तमाम ज़िंदगी 
और फिर भी समझ नहीं पाते लोग फलसफा जिंदगी का....     

Thursday, 16 February 2012

इंतज़ार ....

कभी दोस्ती का दिन, तो कभी आलिंगन का दिन,
तो कभी प्यार के इज़हार का दिन  
रोज़ कोई नया दिन आता है और आकर चला भी जाता है 
मगर,यदि कोई नहीं आता तो वह हो केवल तुम
जैसे एक कभी न ख़त्म होने वाला इंतज़ार,
जिसमें दिन रात जला करता है मेरा मन,कभी सोचा है 
घंटों समंदर के किनारे खड़े होकर जब आती-जाती हर लहर 
को देखकर मन ही मन उठती है कोई कसक तब कैसा लगता होगा मुझे 
शायद तुमने कभी महसूस ही न किया हो, 
ईर्ष्या होने लगती है, इन सागर की लहरों से मुझे और ऐसा लगता है    
मुझसे तो कहीं ज्यादा अच्छी है इस साहिल की किस्मत  
जिसे समंदर के प्यार की लहरों में भीगने के 
लिए कभी नहीं गुजरना पड़ता इस "इंतज़ार" की पीड़ा से 
मगर इस दर्द और जलन के बावजूद भी   
मुझे गुरूर है अपने प्यार पर 
कि मैंने जिससे भी प्यार किया पूरी शिद्दत से प्यार किया। 
क्यूंकि प्यार खुदा की वो नेमत है, जो हर किसी को नहीं मिलती 
बहुत किस्मत से लोगों को प्यार मिलता है।  
मुझे भी मिला, मगर इंतज़ार के रूप में क्या पता यही मेरे प्यार की  परीक्षा हो शायद 
इसलिए मैंने अपने प्यार का नाम ही रख दिया है "इंतज़ार"     
जानते हो, तुम्हारे इंतज़ार में मेरी क्या हालत होती है,
कैसे जानोगे, तुमने तो किया ही नहीं कभी किसी का इंतज़ार
तुम्हें तो बिन मांगे सब मिला है कुदरत से, तुम क्या जानोगे 
कि इंतज़ार का यदि, अपना ही एक अलग मज़ा है 
तो अपने आप में एक पीड़ा भी है इंतज़ार
खैर जाने दो तुम नहीं समझोगे     
कैसा लगता है जब किसी का जानो दिल से हो "इंतज़ार"  
ओर वो संगदिल ही संग न हो, तो कैसा लगता है, तब    
आँखों मे नींद नहीं होती और शून्यता का गहरा समुंदर 
मन मे उतर ज्वारभाटे की तरह प्रेम की दीवारों से टकरा कर 
मेरे गुरूर को चूर-चूर कर देने का पुरजोर प्रयास करता रहता है ,
पता है क्यूँ ,क्यूंकि मेरे मन के अंतस में उठती हुई 
भावनाओं की लहरों को भी पाता है, कि मुझे कितना गुरु है अपने प्यार पर
तभी तो कहीं न कहीं भरोसा भी है मुझे खुद के प्यार पर 
वो भी इस भावना के साथ, कि बिना आग में तपाये 
तो सोने की भी परख नहीं होती 
तो मैं क्या चीज़ हूँ,और फिर आग तो आग ही है 
फिर चाहे वो सोने को तापये या मन को 
तपने पर तो जलन होगी ही न !!! फिर भी 
मुझे विश्वास है एक न एक दिन तुम ज़रूर आओगे 
और तब ख़त्म हो जाएगा मेरा यह इंतज़ार 
कहती तो मैं आज भी कुछ नहीं तुम से मगर हमेशा ही जला है, मेरा मन 
मेरा अस्तित्व, मेरा वजूद तुम्हारी प्रतिक्षा की इस अग्नि में सदा ही
इसलिए अपने इस इंतज़ार को ही मानकर तस्वीर तुम्हारी
अपने मन की बातें कर लिया करती हूँ क्या करूँ हूँ तो 
आखिर मैं भी एक इंसान ही इसलिए डर भी लगता है 
कभी-कभी कि कहीं ऐसा न हो   
कि मेरे इस इंतज़ार में केवल मौन ही शेष रह जाये     
इसलिए अब तो बस एक ही गुजारिश है तुमसे 
कि हो सके, तो इतना ख्याल रखना 
इतनी भी देर ना कर देना आने में
की मेरा इंतज़ार तुम्हारा इंतज़ार बन जाये  
और मन के अंदर के ज्वारभाटे के साथ-साथ 
यह शरीर रूपी समंदर भी शांत हो जाए 
जिसमें भावनाओं की लहरें उठा करती थी कभी 
वो खुद समंदर में मिल विलीन हो जाये 
और फिर शेष रह जाये वही मौन ,निशब्द ,स्तब्ध 
इंतज़ार !!!! 

Monday, 13 February 2012

Happy Valentine's Day Friends....

फरवरी यानि प्यार का मौसम    
गुलाबों की गुलबियत लिए
गुलाबी-गुलाबी सा प्यार,
लाल-पीले गुलाबों के रंग सा रंगीन प्यार   
फूलों की खुशबों से महकता प्यार 
चौकलेट की मिठास सा मीठा-मीठा प्यार 
भोले से दिखने वाले "टेडी बीयर" सा मासूम प्यार 
तोहफों के आकर्षण सा आकर्षित करता हुआ सा प्यार 
यानि प्यार एक रूप अनेक,
तो कौन कहता है
प्यार सिर्फ रूहानी होता है,
कौन कहता है कि, प्यार सिर्फ जिस्मानी होता है 
अरे दोस्तों प्यार तो बस सिर्फ प्यार होता है 
फिर चाहे वो क्षणिक हो या अनंत अपार 
है तो वह भी प्यार,
फिर उसे चाहे कोई ख़ुशबू कहे, 
या 
खामोशी  
जो की सुनती है, कहा करती है,
जितनी नज़रें उतने प्यार के रूप 
और उसके पीछे केवल एक ही शब्द
एक ही एहसास,एक ही जज़्बात
प्यार,
तो कर दो आज सभी अपने प्यार का इज़हार,
क्यूंकि आगया है प्यार का त्यौहार
जो कि आज है  
क्या पता, कल हो न हो,
इसलिए   
happy valentine's day friends.... :)      

Thursday, 9 February 2012

दर्द...


दिल के ज़ख़्मों से बूंद-बूंद रिस्ता दर्द 
जब कभी,जज़्ब होता चला जाता हैं कहीं 
 जैसे सुखी मिट्टी में पानी 
और परत दर परत जमता चला जाता है वो दिल का दर्द, 
जैसे किसी चीज़ पर चढ़ाई 
गई मिट्टी के लेप की कई परतें जो एक दिन 
कई परतों के चढ़ाये जाने कारण आ गिरती हैं नीचे
वैसे ही एक दिन जब दिल के दर्द की परतें 
छोड़ती हैं अपनी जड़ें और गिरती हैं 
मन के धरातल पर कहीं
तब आता है एक सैलाब और फूटता है एक ज्वालामुखी 
और उसमें से निकलती हैं, मरी हुई भावनाओं की 
कुछ लाशें, कुछ कुचले हुए जज़्बात 
और तड़पता,सिसकता हुआ सा खुद का वजूद...     

Monday, 6 February 2012

मिर्च मसाला ...


क्या कहूँ लग रहा है आप सब मुझ पर पढ़कर शायद हसेंगे कि यह क्या कुछ भी लिख दिया है। मगर क्या करूँ जो महसूस किया उसे लिखे बिना रह भी नहीं सकती।

लाल मिर्च और नमक आपस में 
मिल कर बने एक मसाला 
कभी इस मसाले को खाया है 
संतरे या मौसमी के साथ 
या फिर सूखे हुए बेर या इमली के साथ 
कितना मज़ा आता है ना चटपटा स्वाद 
जैसे अंदर तक एक स्फूर्ति सी भर देता है 
फलों के साथ फलों का रस बढ़ाता सा मसाला 
खाने मे स्वाद भी लाता है यही एक मसाला 
कभी-कभी बहुत सी बातों में भी जान डाल देता है 
यही एक मसाला  
कभी सोचा है यदि सारे मसालों में 
यह दोनों ही ना हों तो भला 
क्या स्वाद रह जायेगा किसी भी खाने में
सब कुछ फीका बेस्वाद, बेजान सा खाना 
और तब न उस खाने में होगा 
कोई रूप, न रंगत, न निखार 
जैसे हो कोई मरीजों का खाना
 फिर एक पल एक खयाल आया 
ज़िंदगी भी तो एक पकवान की तरह ही है न 
अगर इसमें भी न हों सुख-दुख के खट्टे मीठे 
अनुभव या संघर्ष और सफलता या असफलता का  कोई स्वाद 
तो भला कितने बेस्वाद सी होगी न
 यह ज़िंदगी, उसमें भी किसी बेजान 
से खाने की तरह न कोई रंग होगा
न स्वाद ,न रंगत ,न निखार
बस एक मरीज के खाने सी 
बेस्वाद सी बिना नमक मिर्च की ज़िंदगी  
जैसे ज़िंदगी-ज़िंदगी नहीं मजबूरी हो कोई  
जिसे बस जीने के लिए जीना हो एक बार .....