Monday, 2 November 2015

खामोशी के चंद आँसू



कैसे अजीब होते है वो पल, जब एक इंसान खुद को इतना मजबूर पाता है 
कि खुल के रो भी नहीं पाता।  
तब, जब अंधेरी रात में बिस्तर पर पड़े-पड़े निरर्थक प्रयास करता है 
उस क्रोध के आवेग को अपने अंदर समा लेने का 
तब और अधिक तीव्रता से ज़ोर मारते है 
वह आँसू जिनका अक्सर गले में ही दम घोट दिया जाता है। 
कैसा होता है वो पल जब हम अपने ही आंसुओं को 
अपने ही गले में घोटकर मार देने के लिए विवश हो जाते है।
कितनी बेबसी, कितनी विवशता होती है उन पलों में   
कि लगता है जैसे सांस घुट जायेगी अभी  
कितना कठिन और सशक्त होता है वह विलाप 
जिसे हम किसी को दिखाना नहीं चाहते।
किन्तु जब चाहकर भी हम, 
उसके इस सशक्ति पन को अपने भीतर रोक नहीं पाते 
तब वह दबे छिपे आँसू अपने पूरे वेग के साथ, 
हम पर वार करते है।
और हम अपने उस क्रोध (अहम)पर विजय पाने हेतु
अपने पूरे बल से उस क्रोध अग्नि के 
अपने उन आंसुओं को अपने गले ही में घोट देते है 
तब आँखें तो भर आती है उस मृत क्रोध के गर्म लहू से 
जो अक्सर आँख का आँसू बन तकिया भिगो जाता है 
लेकिन उस समय जिस पीड़ा से गुज़र रहे होते है हम 
वह तो नि: शब्द :है। 
दमघोट कर मारे जाने वाले इंसान की भी कुछ ऐसी ही दशा होती होगी 
जब प्राण निकलते वक्त ढूंढते होंगे कोई मार्ग 
कि चंद साँसे और मिल जाये या 
खुली हवा मिले, तो शायद ज़िंदगी बच जाये 
मगर उस वक्त,वक्त को कहाँ दया आती है 
वह तो हमारी ही तरह क्रूर बनकर  
घोट देता है सामने वाले का दम 
और शेष रह जाते है खामोशी के चंद आँसू...         

6 comments:

  1. मन भारी कर गयी तुम्हारी रचना .... सस्नेह

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  2. खूबसूरत रचना....
    आप को दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनाएं...
    नयी पोस्ट@आओ देखें मुहब्बत का सपना(एक प्यार भरा नगमा)
    नयी पोस्ट@धीरे-धीरे से

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  3. खामोशी के चंद आंसू बेहद उत्‍कृष्‍ट रचना के रूप में प्रस्‍तुत हुई है।

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  4. गहन भावना प्रकट हुई है, बेबसी का अकेलेपन का दुख।

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  5. सच में बेबसी में आँसू के सिवा क्या निकलेगा?

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  6. सच में बेबसी में आँसू के सिवा क्या निकलेगा?

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