Monday, 5 August 2013

चित लागे न कहूँ ओर ....

निंद्रा में खोई थी मोहन
स्वप्न सजीले देख रही थी
भटक रही थी उन गलियों में
चित चोर रहे तुम वहीं
कितना मोहक था सब कुछ
जहां नाच रहा था मोर

हरियाली ही हरियाली थी
सब थे भाव बिहोर
न कोई दुख था, न कोई पीड़ा
न वियोग का छोर,
अब देखो तो कुछ न बाकी
विरह पसरे चहुं ओर

नहीं रहे अब नदिया सागर
बिखरा पड़ा है कुढ़ा कर्कट
जित देखो चहुं ओर
पेड़ बचे न पगडंडी
अब जाऊँ में किस और मोहना
चित लागे न कहूँ ओर....
   

19 comments:

  1. एक प्यारी रचना जो कवियत्री के हृदय में बसे प्रकृति,उसके सौन्दर्य और भावनाओं को बहुत सहज और सरल शब्दों में अभिव्यक्त कर रही। इस कविता में मोहन तो माध्यम मात्र हैं--उनके माध्यम से पल्लवि जी ने बहुत कुछ कह डाला जो कि आज के लिये बहुत प्रासंगिक है।

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर..आपने कहा की आपने पहली बार ऐसा कुछ लिखने का प्रयत्न किया है...किया तो सही और वो भी अच्छा प्रयत्न...हम तो चाह कर भी नहीं लिख पाते! :)

    ReplyDelete
  3. Voow...good one pallavi...acchi kavita hai

    ReplyDelete
  4. वाह बहुत सुंदर

    ReplyDelete
  5. आपने लिखा....
    हमने पढ़ा....और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए बुधवार 07/08/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in ....पर लिंक की जाएगी.
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    लिंक में आपका स्वागत है .
    धन्यवाद!

    ReplyDelete
  6. बहुत प्रवाहमयी और भावमयी. लेकिन यह विरह और उदासी क्यों? आधुनिक मनीषा विरह को अधिमान नहीं देती. मुझे रचना के तौर पर यह अच्छी लगी.

    ReplyDelete
  7. अच्छी रचना ... पर मेरा मानना है जब चितचोर से मन लग जाता है तो ये सब दिखाई कहां देता है ... उससे एकाकार हो जाता है ...

    ReplyDelete
  8. तब से अब तक……… बहुत सुन्दर

    ReplyDelete
  9. वाह ... बेहतरीन

    ReplyDelete
  10. बहुत सुन्दर और सार्थक कविता....

    ReplyDelete
  11. मोह और बैराग में डोलता मन बहुत सुन्दर चित्रण

    ReplyDelete
  12. कितनी गहरी निराशा है, सब जगह कूड़ा-करकट, कहां जाए मोहना यह पल्‍लवी बेचारी!! सुन्‍दर।

    ReplyDelete
  13. सन्देशवाहक कविता का प्रवाह अच्छा है.... नई कोशिश में सफल हो पल्लवी

    ReplyDelete
  14. बेहद सुंदर .....एक सफल प्रयास

    ReplyDelete